जो लुटा, वह राम नहीं रकम है!

प्रफुल्ल कोलख्यान
राम के कई प्रसंग हैं। राम के कई संदर्भ हैं। राम किसी के प्रसंग नहीं! राम किसी के संदर्भ नहीं। राम प्रसंगातीत हैं। राम संदर्भातीत हैं। राम गिरा-ज्ञान-गोतीत हैं! राम वर्णनातीत भी हैं, राम वर्णातीत भी हैं! दस मुंहवाले रावण ने त्रेता में सोने को निमित्त बनाकर सीता का अपहरण कर लिया था। आज दस मुंहवाली राजनीति ने सोने के लिए राम का अपहरण कर लिया है। राम ने सीता की रक्षा की थी तब, राम की रक्षा करने की बारी है अब सीता की! सीता की, सीताओं की, माताओं की, बहनों की! वैसे, जो उनके हाथ आया है वह राम नहीं रकम है।
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उनके रकम बनाम अपने राम
राम भले ही प्रसंगातीत हैं, संदर्भातीत हों, गिरा-ज्ञान-गोतीत हों, लेकिन रकम जो लुटा है वह न प्रसंगातीत है, न संदर्भातीत है और न गिरा-ज्ञान-गोतीत है। जो लुटा है, वह राम नहीं रकम है। रकम का हिसाब-किताब तो होगा ही ‘अपराध का हिसाब’ भी होगा और ‘राजनीति का हिसाब’ भी होगा। पिछले चार दशक से राम के नाम पर जो-जो कोहराम मचाया दस मुंहवाली राजनीति ने, उन सब का भी ‘हिसाब’ होगा। चार दशक में दुनिया कहां-से-कहां चली गई और भारत के नौजवानों के भविष्य को अच्छे दिनों के सपनों की चादर में लपेटकर निपटा दिया गया।
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मध्यवर्गीय धुंधलापन
भारत के मध्यवर्ग की आबादी का अधिकांश अपनी स्वार्थ-सिद्धि के तिकड़म से बाहर निकलकर देश और दुनिया की तरफ देखने के मामले में अंधा बना रहा है। यह मध्यवर्गीय दृष्टि का धुंधलापन भारत की बहुत बड़ी आबादी के बीच अंधापन के फैलने का आधार बन गया। वैसे भी, दरिद्रता और धनाढ्यता दोनों मनुष्य के विवेक को मंद कर देती है। गरीब आदमी का अपने विवेक से संवाद बंद हो जाता है और धनाढ्यों के लिए विवेक मुखौटा से अधिक कुछ नहीं रह जाता है। विवेक ही दिव्यांग हो जाए तो न धर्म की कोई शुचिता बचती है न धन की कोई सार्थकता बचती है।
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बाल्मीकि ब्रह्म समान हो गये!
दुनिया में राम की कई-कई कथाएं हैं! कितनी? पूछिए फादर कामिल बुल्के (Fr. Camille Bulcke) से! ओह ये फादर कामिल बुल्के (Fr. Camille Bulcke) कौन थे? पता कीजिए। यहां इतना बताना पर्याप्त होगा कि ’रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ नाम का उनका शोध प्रबंध आज भी दुनिया भर में रामकथा से जुड़े शोधों के लिए सबसे प्रामाणिक और सर्वश्रेष्ठ संदर्भ ग्रंथ (Reference Book) माना जाता है। फादर कामिल बुल्के ने वैश्विक स्तर पर उपलब्ध रामकथा के सैकड़ों संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह सिद्ध किया कि रामकथा केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक संस्कृति का हिस्सा है। फादर कामिल बुल्के न विश्व हिंदू परिषद से जुड़े थे, न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे — ईसाई धर्म के फादर थे! बाल्मीकि का जीवन पावन था। बाल्मीकि चित्तपावन नहीं थे। बाल्मीकि का चित्त पावन था; मरा, मरा जपते-जपते ब्रह्मसमान हो गये! जिनका चित्त पावन नहीं होता है व राम, राम जपते-जपते पिशाच हो गये! ब्रह्मपिशाच? नहीं सिर्फ पिशाच!
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राम! लोकचित्त के वासी राम
आज लोकचित्त में जो राम बसे हैं — जन-जन के जो राम हैं, वे निश्चित रूप से तुलसीदास के रामचरितमानस के राम हैं। रामचरितमानस के राम हैं। कबीरदास के राम नहीं हैं। कहने में कोई संकोच नहीं है कि कबीरदास के राम से तुलसीदास के राम में थोड़ा फर्क जरूर है। यह फर्क राम में नहीं है हमारे चित्त में बसे राम में है।
विश्व हिंदू परिषद के चित्त में भी उनके अपने राम रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद के राम का अधिकांश तुलसीदास का राम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मंडल की राजनीति से निपटने के लिए विश्व हिंदू परिषद के राम को अपने चित्त में बसा लिया। बसा ही नहीं लिया, पुरुषोत्तम को अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए हेट स्पीच के आधार पर बदलने का अपराध करना भी शुरू कर लिया। आंदोलन हुआ राम मंदिर का आंदोलन!
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रोजी-रोटी का आंदोलन दब गया! उछल गया राम मंदिर का आंदोलन! लालकृष्ण आडवाणी ने रथ निकाल लिया। रथयात्रा शुरू हो गई — सोमनाथ से शुरू हुई रथयात्रा और बिहार के समस्तीपुर में रोक ली गई! राम के लिए निकले रथ को मिथिला में रोक लिया गया। मिथिला, राम के ससुराल में ही। बिहार के मुख्यमंत्री थे मंडल की राजनीति की कमान संभाले श्री लालू प्रसाद यादव! रथ को रोककर और यहां रखकर गिरफ्तार करनेवाले जिला अधिकारी थे श्री आर के सिंह! जो बाद में नरेंद्र मोदी सरकार में सम्मानित कैबिनेट मंत्री बने!
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हिंदुत्व की राजनीति की नाक पर रुमाल और गमछा
आंदोलन सफल हो रहा था, सत्ता से संबंध बनना-बिगड़ना शुरू हो गया था! हिंदी के कवि धूमिल को आभार जताते हुए कहा जा सकता है कि हिंदुत्व की राजनीति की नाक पर रुमाल रखकर निष्ठा का तुक विष्ठा मिलाना शुरू हो गया था, तभी।
आंदोलन की अर्द्ध सफलता के दौर में हिंदुत्व की राजनीति का सुकुमार चेहरा अटल विहारी बाजपेयी थे। सो अटल विहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री के स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य उम्मीदवार थे, सो वही बने प्रधानमंत्री! भारत के राजनीतिक यथार्थ को समझकर हिंदुत्व की राजनीति के लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने अपने राजनीतिक चेहरे पर कोमलता लाने के लिए अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव कर लिया। लेकिन तब तक सत्ता चली गई।
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कांग्रेस के नेतृत्व में चुनाव के बाद आनन-फानन में बन गया संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए)। इतिहास की छाती पर कान धरिए तो फुसफुसाहट सुनाई देगी कि कैसे डॉ मनमोहन सिंह बन गये प्रधानमंत्री और श्रीमती सोनिया गांधी बन गई उस दौर की सबसे मजबूत नेता। खैर, दस साल के लंबे समय तक डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के पद पर जमे रहे! तब शुरू हुआ एक और आंदोलन और अचानक प्रकट हुए किसन बाबूराव हजारे यानी अण्णा हजारे!
लालकृष्ण आडवाणी संसदीय राजनीति के अनुभवी नेता थे। अब उन्हें एहसास हो गया कि हिंदुत्व की राजनीति की नाक पर से रुमाल हटाकर गमछा डालने की जरूरत है।
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इसलिए वे आंख-कान मूंदकर अन्ना आंदोलन और उसकी भाषा का समर्थन नहीं कर पा रहे थे! तर्क था सभी नेता और सांसद चोर नहीं हैं! सही कह रहे थे कि राजनीति और राजनेताओं के प्रति इस तरह का घृणा भाव पैदा करना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। लेकिन आडवाणी जी भी अन्ना आंदोलन को हथियार बनाकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की डॉ मनमोहन सिंह सरकार को तितर-बितर करने में पीछे नहीं थे।
लोहा तैयार लेकिन धार गायब
इस बार लालकृष्ण आडवाणी अपने सुकुमार चेहरे के साथ तैयार थे। लेकिन तब तक हिंदुत्व की राजनीति की हवा बदल चुकी थी। हिंदुत्व की राजनीति की बदली हुई हवा में कठोरता की ही नहीं क्रूरता के लिए भी जगह चौड़ी हो गई थी!
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सो लालकृष्ण आडवाणी पूरी पीढ़ी के साथ मार्गदर्शक मंडल में सम्मान के साथ पहुंच गये। हिंदुत्व की राजनीति की अर्द्ध सफलता के दौर में सुकुमार चेहरा लेकर अटल विहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बन गये और पूर्ण सफलता के दौर में क्रूर-कठोर चेहरा लेकर वज्रपुरुष नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गये।
संस्कृत के महान कवि भवभूति ने अपने विश्व प्रसिद्ध नाटक उत्तररामचरित में कहा कि असाधारण लोग अपने कर्तव्य और न्याय के लिए वज्र से भी अधिक कठोर हो जाते हैं और अपने प्रेम व संवेदना में फूल से भी अधिक कोमल हो जाते हैं। सहमति-असहमति अपनी जगह, लेकिन निश्चित रूप से लालकृष्ण आडवाणी असाधारण थे! विडंबना यह कि हिंदुत्व की राजनीति के लौहपुरुष पर हिंदुत्व की राजनीति के वज्रपुरुष भारी पड़ गये! लोहा तैयार लेकिन धार गायब!
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अर्थात जो लुटा, वह राम नहीं रकम है!
ऊपर से दिखता है लुट गये राम! 1026 के हमले से न सोमनाथ का कुछ बिगड़ा था न हजार साल बाद 2026 में हुई लूट से राम का कुछ बिगड़ा है! जी हां, जो लुटा है वह राम नहीं रकम है।
रकम, सिर्फ यहां नहीं लुटा है, जाने कहां-कहां लूट लिया गया है। सबका होता है हिसाब-किताब, इनका भी होगा। निस्संदेह होगा, हिसाब-किताब!
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प्रसंगवश, इतिहास कभी तो खलबलाकर कहेगा कि कैसे हिंदुत्व की राजनीति के लौहपुरुष प्रधानमंत्री न बन पाये और न अपने दौर की सबसे मजबूत नेता श्रीमती सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनी!
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