July 30, 2026
#Opinion

Gen-Z की गालियां और आज का समाज: शीतल पी सिंह

जेन-ज़ी की गालियों को लेकर इन दिनों जिस तरह की चिंता जताई जा रही है, उसे देखकर ऐसा लगता है मानो गालियाँ इसी पीढ़ी ने ईजाद की हों। जबकि सच्चाई बिल्कुल उलट है। गालियाँ मानव समाज जितनी पुरानी हैं। हर सभ्यता, हर भाषा और हर दौर में लोग गुस्से, अपमान, दर्द, विद्रोह, मज़ाक और तिरस्कार को व्यक्त करने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते रहे हैं। सोशल मीडिया ने केवल इतना किया है कि उसने उस भाषा को सार्वजनिक कर दिया है, जो पहले घरों, गलियों, चौराहों, दफ्तरों, कारखानों और राजनीतिक बैठकों तक सीमित रहती थी। जैसा कि सआदत हसन मंटो ने कहा था—”मैं समाज की चोली क्या उघाड़ूँगा, वह तो पहले से ही नंगा है।”

भाषाविज्ञान और मनोविज्ञान के कई अध्ययनों में गाली को केवल अशिष्ट भाषा नहीं माना गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि गाली कई बार मनुष्य की तीव्र भावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति होती है। कभी वह क्रोध होती है, कभी पीड़ा, कभी अपमान, कभी व्यंग्य और कभी प्रतिरोध। इसलिए हर गाली का अर्थ एक जैसा नहीं होता। उसका अर्थ इस बात से तय होता है कि वह कौन दे रहा है, किसे दे रहा है और किस परिस्थिति में दे रहा है।

मान लीजिए एक शक्तिशाली अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को गालियाँ देता है। उस गाली में अहंकार और प्रभुत्व की भावना है। वह जानता है कि सामने वाला उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन यदि वही दबा-कुचला व्यक्ति एक दिन डर छोड़कर उसी अधिकारी को गाली देकर चुनौती देता है, तो उस गाली का अर्थ बदल जाता है। अब वह केवल अपशब्द नहीं रह जाती, बल्कि प्रतिरोध और विद्रोह का प्रतीक बन जाती है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ हाशिए पर खड़े लोगों की भाषा शिष्ट नहीं रही, क्योंकि उनका जीवन भी शिष्ट परिस्थितियों में नहीं बीता। जब दमन बहुत गहरा होता है, तब प्रतिरोध की आवाज़ भी हमेशा मधुर नहीं होती।

दुनिया के लगभग हर बड़े जनांदोलन में ऐसी भाषा देखने को मिलती है। 1968 के फ्रांस के छात्र आंदोलन से लेकर अमेरिका के वियतनाम-विरोधी आंदोलन, ब्रिटेन के पंक आंदोलन, पूर्वी यूरोप के लोकतांत्रिक संघर्षों और अरब स्प्रिंग तक, सत्ता के विरुद्ध तीखे, व्यंग्यात्मक और कई बार अशिष्ट नारे लगाए गए। इतिहास यह बताता है कि जब लोगों को लगता है कि उनकी बात सामान्य और विनम्र भाषा में नहीं सुनी जा रही, तब उनकी भाषा भी अधिक आक्रामक हो जाती है। इसलिए किसी आंदोलन का मूल्यांकन केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ से भी किया जाना चाहिए।

साहित्य भी इस प्रश्न से हमेशा जूझता रहा है। फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की के पात्र हों, सआदत हसन मंटो की कहानियाँ हों, चार्ल्स बुकोव्स्की का लेखन हो या एलन गिन्सबर्ग की कविताएँ—इन सबने उस भाषा को भी साहित्य में जगह दी, जिसे समाज अशिष्ट मानता था। भारत में दलित साहित्य ने इस बहस को और आगे बढ़ाया। दलित लेखकों ने यह सवाल उठाया कि यदि समाज का जीवन ही अपमान, हिंसा और गालियों से भरा है तो साहित्य केवल संस्कृतनिष्ठ और शुद्ध भाषा में ही क्यों लिखा जाए? मराठी के महान कवि नामदेव ढसाल ने अपनी रचनाओं में सड़क की भाषा, वेश्याओं की बस्तियों की भाषा और दलित जीवन की भाषा को उसी रूप में प्रस्तुत किया। उनकी एक पुस्तक के शीर्षक में ही अपशब्द था, लेकिन बाद में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि साहित्य में किसी शब्द का मूल्य केवल उसकी शालीनता से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक संदर्भ से भी तय होता है।

हालाँकि इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है। भारत की अधिकांश गालियाँ स्त्री के शरीर, उसकी यौनिकता या माँ-बहन के रिश्तों को अपमानित करके बनाई गई हैं। इसलिए अनेक नारीवादी चिंतक कहते हैं कि चाहे गाली सत्ता-विरोध में ही क्यों न दी जाए, यदि वह स्त्री का अपमान करके अपना प्रभाव पैदा करती है, तो वह अनजाने में पितृसत्ता को ही मजबूत करती है। यह आलोचना गंभीर है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शायद आने वाली पीढ़ियाँ ऐसी नई राजनीतिक भाषा विकसित करें जो सत्ता पर चोट करे, लेकिन स्त्री की गरिमा को आहत न करे।

सोशल मीडिया ने गालियों को जन्म नहीं दिया है। उसने केवल उन्हें छिपे हुए कमरों से निकालकर सार्वजनिक मंच पर ला दिया है। पहले अखबार, रेडियो और टेलीविजन में संपादक तय करते थे कि कौन-सा शब्द छपेगा और कौन-सा नहीं। अब ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे मंचों पर यह नियंत्रण बहुत कम है। इसलिए समाज की वास्तविक भाषा पहले से कहीं अधिक दिखाई देने लगी है। इसी तरह सिनेमा में भी बदलाव आया है। पहले फिल्मों में खलनायक को ‘मक्कार’, ‘कमीना’ या ‘हरामज़ादा’ कह देना ही बहुत माना जाता था। आज ओटीटी पर वही भाषा सुनाई देती है जो वर्षों से समाज में बोली जाती रही है। बदला समाज नहीं, माध्यम है।

मेरा अपना अनुभव भी यही है। बचपन से लेकर आज तक मैंने गालियाँ देने वाले लोगों की कमी नहीं देखी। दिलचस्प बात यह है कि उनमें बड़ी संख्या तथाकथित सभ्य, शिक्षित और सामाजिक रूप से ऊँचे माने जाने वाले लोगों की थी। इसलिए केवल भाषा देखकर किसी मनुष्य के चरित्र का अनुमान लगाना भी ठीक नहीं है। विराट कोहली मैदान पर कई बार गालियाँ देते दिखाई देते हैं, लेकिन निजी जीवन में एक संवेदनशील पति और पिता माने जाते हैं। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर धार्मिक प्रतीकों वाली प्रोफ़ाइल तस्वीर लगाकर सबसे ज़्यादा अपमानजनक भाषा लिखने वाले लोग भी कम नहीं हैं। इसलिए भाषा और चरित्र का संबंध सीधा और सरल नहीं होता।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि गालियाँ आदर्श भाषा हैं या उन्हें सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बना देना चाहिए। न साहित्य का उद्देश्य केवल गाली है, न राजनीति का। किसी भी आंदोलन की असली ताकत उसके विचार, उसके संगठन, उसकी नैतिकता और जनता के विश्वास में होती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सड़क की भाषा और पुस्तक की भाषा हमेशा एक जैसी नहीं होती। मुक्तिबोध ने कहा था—”पोस्टर ही कविता है।” इस कथन का आशय यही था कि संघर्ष के अपने अलग व्याकरण और अपनी अलग भाषा होती है।

इसलिए जेन-ज़ी की भाषा पर बहस करते समय केवल शिष्टाचार का प्रश्न उठाना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि उनके भीतर इतना आक्रोश क्यों पैदा हुआ, वे किस व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं और उनकी भाषा उस सामाजिक बेचैनी को किस तरह व्यक्त कर रही है। यदि केवल गालियों की निंदा करके हम उन कारणों को अनदेखा कर दें जिन्होंने यह गुस्सा पैदा किया है, तो हम समस्या का समाधान नहीं, केवल उसके लक्षणों की चर्चा कर रहे होंगे।

अंततः लोकतंत्र में लक्ष्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए जहाँ लोगों को अपनी बात कहने के लिए गालियों का सहारा न लेना पड़े। लेकिन इतिहास यह भी सिखाता है कि जब दमन बढ़ता है, संवाद के रास्ते बंद होते हैं और असहमति को लगातार दबाया जाता है, तब प्रतिरोध की भाषा शायद ही कभी पूरी तरह शिष्ट, संस्कारी और कर्णप्रिय होती है। इसलिए किसी भी समाज को गालियों से पहले उन परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए जो लोगों की भाषा को इतना कड़वा बना देती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह के फ़ेसबुक से साभार

Gen-Z की गालियां और आज का समाज: शीतल पी सिंह

Access Is Not Assistance: Why India Keeps