सरकार से एक गुज़ारिश !
शिवानंद तिवारी

वैसे बिहार में सामाजिक बदलाव और आज़ादी की लड़ाई में कई ऐसे नायक हुए हैं जिनकी पहचान तक नहीं हो पाई है। लेकिन यहाँ मैं बिहार के उन दो विभूतियों के विषय में चर्चा करना चाहूंगा जो अपेक्षाकृत समाज में कम ही जाने जाते हैं। लेकिन जिस स्थान के वे हक़दार हैं वह स्थान उनको अभी तक नहीं मिल पाया है। ये इनमें पहले हैं जगलाल चौधरी जी और दूसरे हैं आर.एल. चंदापुरी जी।
इन दोनों का व्यक्तित्व अत्यंत प्रेरणादायक है।
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पहला नाम जगलाल चौधरी का। जगलाल चौधरी जी ताड़ी बेचने वाले गरीब परिवार में पैदा हुए थे। लेकिन मैट्रिक की परीक्षा में उन्होंने प्रथम श्रेणी हासिल किया और वज़ीफ़ा के हकदार बने़। उन दिनों कलकत्ता के मेडिकल कॉलेज में उनका नामांकन हुआ, जब आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी।
उनकी इस उपलब्धि से दलित समाज की छाती चौड़ी हो गई होगी। लेकिन वे सिर्फ़ प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही नहीं थे। बल्कि देशभक्ति का जज़्बा भी उनके अंदर कूट-कूट कर भरा हुआ था।
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इसलिए जब 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की घोषणा की और ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित सभी संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान किया था, उस समय जगलाल चौधरी जी मेडिकल की पढ़ाई के अंतिम वर्ष के छात्र थे।
लेकिन बग़ैर एक क्षण का देर किए उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और गांधीजी के संघर्ष में शामिल हो गए। बाद में 1942 के आंदोलन के दौरान अपने पुत्र की शहादत के बावजूद वे विचलित नहीं हुए।
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बिहार के पहले स्वास्थ्य और आबकारी मंत्री के रूप में उन्होंने 1938 में ही शराबबंदी लागू कर दलितों और गरीबों को नशा-मुक्त करने का साहसी संकल्प लिया था, जबकि उनकी अपनी बिरादरी ताड़ी के व्यवसाय से गहराई से जुड़ी हुई थी।
यह अलग बात है कि द्वितीय विश्व युद्ध में कांग्रेस सरकार से अलग हो गई और वह व्यापार यथावत चलता रहा।
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दूसरे महापुरूष आर.एल. चंदापुरीजी। आर.एल. चंदापुरीजी पिछड़ों के हक की लड़ाई का दूसरा नाम हैं। काका कालेलकर आयोग के सिफारिशों को लागू कराने के लिए वे जवाहरलाल नेहरू से लड़ गये।
उसके पूर्व पिछड़े वर्गों के आरक्षण के लिए वे बाबा साहेब अंबेडकर से लगातार संपर्क में रहे। 1951 में बाबा साहेब उनके आमंत्रण पर पटना आए थे। उनके साथ प्रतिक्रियावादियों ने धक्कामुक्की करने की कोशिश की। चंदापुरीजी दीवार की तरह उनके सामने खड़े हो गये।
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एक अफसोसजनक सच तो यह है कि यदि नेहरू सरकार ने उस समय काका कालेलकर कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर दिया होता, तो देश की दशा आज दूसरी ही होती। पिछड़ों को दशकों तक और इंतजार नहीं करना पड़ता।
उस समय कालेलकर कमीशन का लागू न होना सामाजिक न्याय की राह में एक बड़ा ‘गैप’ बन गया, जिसकी कीमत पिछड़े समाज ने 1980 की दशक तक चुकाई।
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आज हम इन महापुरुषों को नमन करते हैं, जिनके संघर्ष ने हमें यह अहसास दिलाया कि सामाजिक न्याय की लड़ाई लंबी है, और निरंतर है।
भारत सरकार एवं बिहार सरकार से हमारी गुज़ारिश है कि इन दोनों पुरखों के कर्मों और विचारों पर व्यवस्थित शोध कराये और उसे समाज शास्त्र के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
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