यह वंदे मातरम गान देश को किस दिशा की ओर धकेल देगा?
दया सिंह | राजनीतिक विश्लेषक एवं चिंतक
सुधांशु त्रिवेदी, जो भाजपा के सांसद और प्रवक्ता भी हैं, वे कांग्रेस के प्रवक्ता के साथ इस वंदे मातरम को लेकर चर्चा में ज्ञान बांटने पर उतारू थे। वे कई उदाहरणों से अपनी बात को सत्यापित करने में लगे थे और सीधे गुरु गोबिंद सिंह तक पहुंच गए। उन्होंने ‘चंडी दी वार’ और ‘रामावतार’ को उद्धृत किया। क्या उन्हें समझ है कि जिस ग्रंथ की वे बात कर रहे हैं, उसकी प्रामाणिकता और मान्यता पर ही कई सवाल हैं?
वे सिखों को इस विवाद में क्यों घसीटने पर उतारू हैं? यह किसकी रचनाएं हैं, जब वही संदिग्ध हैं, तो वे ऐसे विवादों को वंदे मातरम के पक्ष में क्यों लाना चाहते हैं? क्या वे यह बताना चाहते हैं कि गुरु गोबिंद सिंह चंडी के पुजारी थे और दशरथ-पुत्र राम को समर्पित थे?
मैं नहीं चाहता कि इस पर विवाद खड़ा करूं, पर वे सिखों को फिर से उसी हालात की ओर ले जाना चाहते हैं जिससे पंजाब गत 50 वर्षों से गुजरा है। यदि मैं कोई उदाहरण गुरु ग्रंथ साहिब से देने लगूं, तो उनके लिए जवाब देना कठिन हो जाएगा। और वे महाराजा रणजीत सिंह को उद्धृत कर क्या बताना चाहते हैं?
उनको याद दिला दूं कि बाबर से औरंगजेब तक का मुगल काल और गुरु नानक देव जी से गुरु गोबिंद सिंह जी तक का सिख काल समकालीन इतिहास है। उस मुगल काल के दौरान प्रशासन पर उच्च वर्ग- सलाहकार, सेनापति और वित्त संचालक- ही काबिज थे। यही वर्ग बहुसंख्यक समाज का शोषण करता था। गुरु साहिबान ने तो उस शोषित समाज को न केवल इज्जत से जीने का हक दिया, बल्कि उसके लिए संघर्ष भी किया। गुरु अर्जन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी की शहादत का भी यही मूल कारण था।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने जैसे ही ‘खालसा पंचायत’ का गठन कर जाति-विहीन समाज का सृजन किया, वे पहाड़ी राजा ही थे जिन्होंने गुरु साहिब पर हमले किए। इतिहास को सही तरीके से पढ़ने का प्रयास करें तो उचित होगा। महाराजा रणजीत सिंह के राज में भी प्रशासन में यही वर्ग था। उस समय उनकी मृत्यु पर रानियां सती भी हुईं, तो क्या उसे सिख परंपरा मान लिया जाए?
उन्हें यह भी ज्ञात होना चाहिए कि जब सत्ता में सब भागीदार थे, तो धर्म परिवर्तन और मंदिर-मस्जिद के विवाद कैसे खड़े हुए? जबकि कई जगहों पर सद्भाव के लिए जमीनें भी दी गईं। कभी अमृतसर स्थित श्री हरिमंदिर साहिब (दरबार साहिब) को समझने का प्रयास करें, जिसकी नींव सूफी संत साईं मियां मीर ने रखी थी। उसके चारों दिशाओं में चार दरवाजे हैं, जिसका अर्थ है कि यह हर वर्ग के लिए खुला है। वहां प्रकाश ज्ञान रूपी ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ का है, जिसमें गुरुओं की वाणी के अलावा कई संतों, भक्तों और बाबा फरीद का कलाम दर्ज है। इसी समावेशी सोच की शिकायत के कारण गुरु अर्जन देव जी की शहादत हुई।
सिख दर्शन में ईश्वर की परिभाषा स्पष्ट है। गुरु ग्रंथ साहिब में ‘राम’ घट-घट में समाया, सबमें रमण करने वाला परमात्मा है, अयोध्या नरेश नहीं। शोषित वर्ग ने सिख दर्शन को इसलिए अपनाया क्योंकि गुरु ने उन्हें बराबरी और नेतृत्व दिया। जब खालसा पंथ का गठन हुआ, तो पांच प्यारों में लाहौर, हस्तिनापुर, बीदर, द्वारका और जगन्नाथ पुरी से लोग आए। यह वही व्यवस्था है जिसमें दया, कर्तव्यपरायणता (धर्म) और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की हिम्मत हो।
संविधान के अनुच्छेद 25 में हिंदू शब्द के दायरे में बौद्ध, जैन और सिख को भी शामिल कर लिया गया, जिससे पहचान को लेकर सवाल खड़े हुए। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी कई पारंपरिक मान्यताओं का खंडन कर स्वयं को ‘आर्य’ माना, तो क्या आर्य समाज वंदे मातरम की हर पंक्ति को उसी रूप में स्वीकार करेगा? अफसोस कि इतिहास को ही बंधक बना लिया गया है।
26 नवंबर 1949 को जब संविधान पारित किया जाना था, तब सिख प्रतिनिधि सरदार हुकम सिंह और भूपेंद्र सिंह मान ने यह कहकर दस्तखत करने से इनकार कर दिया था कि यह सिखों के साथ न्याय नहीं करता और जो आश्वासन दिए गए थे, उनका जिक्र तक नहीं किया गया। अब आप उनसे वंदे मातरम को लेकर सवाल करते हैं, यह कैसा तर्क है?
मैंने 1997-98 के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रो. शेर सिंह के साथ मिलकर सिख और आर्य समाज को पांच प्रमुख मुद्दों पर एकमत किया था: पाखंड-मुक्त, जातिवाद-मुक्त, शोषण-मुक्त, नशा-मुक्त और भय-मुक्त समाज। इसके बाद पटना साहिब से आनंदपुर साहिब तक खालसा के त्रिशताब्दी वर्ष पर यात्रा निकाली गई, जिसका समापन भाई मती दास चौक (चांदनी चौक, दिल्ली) पर हुआ।
तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने गुरु गोबिंद सिंह चेयर की स्थापना हेतु एक करोड़ रुपये का कॉर्पस फंड गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय को दिया था। लेकिन अफसोस कि 6 महीने बाद उसे यह कहकर वापस कर दिया गया कि ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती। इसलिए दूसरों पर बात करने से पहले अपना इतिहास भी खंगाल लेना चाहिए।
वंदे मातरम के संदर्भ में एक और ऐतिहासिक प्रसंग याद दिला दूं। गुरु अर्जन देव जी के 400वें शहीदी वर्ष पर दयानंद महिला महाविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘हक-ए-अमन’ सेमिनार आयोजित हुआ था। इसमें राज्यपाल डॉ. ए. आर. किदवई, सुरजीत सिंह बरनाला, केंद्रीय मंत्री शीशराम ओला, साहिब सिंह वर्मा, दौलत राम सारण, मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के प्रतिनिधि मनजीत सिंह कलकत्ता व रूप सिंह शामिल हुए थे।
उस कार्यक्रम का संयोजक मैं स्वयं था। जब वंदे मातरम गान पर SGPC की ओर से सवाल उठा, तो आपसी सहमति से यह तय हुआ कि जो गाना चाहें वे गाएं, बाकी सभी सम्मानपूर्वक खड़े रहें और जो इसमें शामिल नहीं होना चाहते वे उस समय के लिए बाहर चले जाएं। वही हुआ भी और कार्यक्रम शांति से संपन्न हुआ।
पिछले कुछ वर्षों में राजनीति का रुख केवल इतिहास के नाम बदलने और ध्रुवीकरण की ओर बढ़ गया है। औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजीनगर और अहमदनगर का नाम अहिल्याबाई नगर कर दिया गया। क्या यह कदम हमें वास्तविक इतिहास से दूर नहीं कर रहा? गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना ऐतिहासिक पत्र ‘ज़फ़रनामा’ (विजय पत्र) भाई दया सिंह और भाई धर्म सिंह के हाथों औरंगाबाद और अहमदनगर छावनी में मौजूद औरंगजेब को भेजा था। उसे पढ़कर औरंगजेब को अपनी गलतियों का अहसास हुआ था और उसने दिल्ली में मिलने का संदेश भेजा था, हालांकि मुलाकात से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। ऐसे ऐतिहासिक संदर्भों को केवल नाम बदलने की राजनीति में भुला दिया गया।
सिखों का वास्तविक इतिहास अक्सर इतिहासकारों के पूर्वाग्रहों में दबकर रह गया। आजादी के संघर्ष में सिखों का योगदान अतुलनीय रहा। 1920 में जब महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली बाबा खड़क सिंह के पास पहुंचे थे, तब मोहम्मद अली जौहर ने खालसा लीग की बैठक में स्पष्ट कहा था:
“खालसा जी, हमारे पूर्वजों ने शासक रहते हुए आप पर जो ज्यादतियां कीं, उसके लिए मैं माफी मांगता हूं। मैं अपनी और अपने भाई शौकत की गर्दन पेश करता हूं, मन करे तो काट लें। पर आज जरूरत है एक होने की, तभी अंग्रेज हुकूमत से निजात पाई जा सकती है, जो आपके बिना मुमकिन नहीं।”
परंतु यहां तो बस हिंदू-मुस्लिम के बिना कुछ है ही नहीं। मेरी अपील है कि यह रास्ता देशहित में कतई नहीं है। कांग्रेस तो इंदिरा गांधी को दोषी मानती है, जबकि यह तो आडवाणी की किताब बताती है कि ब्लू स्टार ऑपरेशन का जिम्मेदार कौन था, वही पढ़ लेते; पर मैं उस बहस पर नहीं जाना चाहता।









