देश व प्रदेशों का मौजूदा नेतृत्व – राजनीति में आई सड़ांध
शिवानंद तिवारी

लेकिन विडंबना देखिए, लगभग पचास वर्ष होने को आए, बिहार का पिंड अब तक जयप्रकाश आंदोलन से निकले नेतृत्व से नहीं छूटा है. इसलिए बिहार की राजनीति में एक सड़ांध आ गई है। यह नेतृत्व अब बूढ़ा हो चुका है, थकान आ गई है इसमें। इसकी ऊर्जा क्षीण हो चुकी है।
बिहार के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व को अगर ध्यान से देखा जाए तो साफ़ दिखाई देता है कि यह नेतृत्व जयप्रकाश आंदोलन की कोख से पैदा हुआ। इसी नेतृत्व ने समाजवादी आंदोलन से निकले पुराने नेतृत्व को अपदस्थ किया और स्वयं सत्ता में आया। मुझे याद है, सत्ता परिवर्तन के शुरुआती दिनों में मैं पटना से दिल्ली जा रहा था।
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रास्ते में पुराने समाजवादी नेता मरहूम भोला प्रसाद सिंह मिले। आज की पीढ़ी शायद उन्हें न जानती हो, लेकिन पुराने लोग उनके संघर्ष और राजनीतिक भूमिका से परिचित हैं। वे मेरे बर्थ के पास आए और थोड़ी तल्खी से पूछा— “तुम लोगों को क्या मिल गया?” मैंने जवाब दिया— “और कुछ मिला हो या नहीं, आप लोगों से हमलोगों का पिंड छूट गया।”
लेकिन विडंबना देखिए, लगभग पचास वर्ष होने को आए, बिहार का पिंड अब तक जयप्रकाश आंदोलन से निकले नेतृत्व से नहीं छूटा है. इसलिए बिहार की राजनीति में एक सड़ांध आ गई है। यह नेतृत्व अब बूढ़ा हो चुका है, थकान आ गई है इसमें। इसकी ऊर्जा क्षीण हो चुकी है।
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राजनीति में नया नेतृत्व हमेशा संघर्ष की भट्ठी से पैदा होता है। संघर्ष ही राजनीति में नया खून लाता है और वही अपने भीतर एक नया सपना लेकर चलता है— समाज को बदलने का सपना, व्यवस्था को आगे ले जाने का सपना। यह अलग बात है कि सपने पूरी तरह कभी जमीन पर नहीं उतरते, लेकिन मनुष्य की यात्रा इसी कोशिश का नाम है।
जब देश गुलाम था, तब लोगों को लगता था कि हमारी सारी पीड़ा, भूख, गरीबी और अभाव की जड़ गुलामी है। यह विश्वास था कि अंग्रेज चले जाएँगे तो सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी। ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ, लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि संघर्ष व्यर्थ गया। समाज आगे बढ़ा, चेतना बदली, नए रास्ते खुले।
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इसी तरह लालू यादव और नीतीश कुमार की आलोचना चाहे जितनी की जाए, यह भी सच है कि बिहार वहीं नहीं खड़ा है, जहाँ आज से तीस-चालीस साल पहले खड़ा था। समाज कुछ आगे बढ़ा है, राजनीति का दायरा बदला है। लेकिन अब इस यात्रा को आगे ले जाने के लिए एक नए संघर्ष की ज़रूरत है— और सबसे बड़ा संकट यही है कि ऐसे किसी संघर्ष की आज तैयारी नहीं दिखाई दे रही है।
आज जो नई उम्र के लोग राजनीति में दिखाई दे रहे हैं वे मौजूदा नेतृत्व की ही दूसरी पीढ़ी है। इसमें कोई ताजगी नहीं है। उनके पास समाज को देने के लिए कुछ नया नहीं है।
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