वंदे मातरम: अंग्रेजों के ख़िलाफ़ एकता का मंत्र, आज विवाद का हथियार?
राष्ट्र गीत वंदे मातरम फिर से चर्चा और विवाद में है. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के अध्याय अभी खुले हुए हैं। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन एकार्थी था और एक ध्वन्यात्मक नहीं था। बहुस्तरीयता और बहुलात्मकता भारत की बुनियाद है। भारत के सामाजिक-समूहों में टकराव तो पहले भी होते ही थे। लेकिन अंग्रेजों के शासन काल में इन टकरावों को जानबूझकर बढ़ाने, सोद्देश्यपूर्ण तरीके से नियंत्रित करने में अंग्रेज शासकों ने शासन की उस शक्ति और शैली को अपनाया जिसे ‘बांटो और राज करो’ के नाम से हम जानते हैं।
‘बांटो और राज करो’ की हर तरकीब को बेकारगर करनेवाली मंत्र प्रभावी और सम्मोहक आवाज आई- वंदे मातरम! वंदे मातरम की आवाज पर सभी भारतीयों की बहुस्वरता और बहुध्वनीयता बिना कोई देर किये एकात्मक आवाज में बदल जाया करती थी — पूरे गीत का सम्मान अपनी जगह, लेकिन मंत्र शक्ति का स्रोत था — वंदे मातरम!
वंदे मातरम ही मंत्र प्रभावी बीज पदबंध है। इसलिए राष्ट्र गीत का नाम वंदे मातरम है। इसलिए राष्ट्र गान का समापन वंदे मातरम से होता है।
इतिहास की विडंबना ही है कि जिस वंदे मातरम की एक आवाज पर प्रत्येक भारतीय अपनी सारी विरुद्धताओं को स्थगित कर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पूरी मजबूती से एक हो जाते थे। दुर्भावनापूर्ण तरीके से स्वतंत्रता के इतने दिन बाद आज उसी ‘वंदे मातरम’ को सत्ता और सत्ताधारी दल के लोगों के द्वारा भारतीयों के बीच टकराव के लिए इस्तेमाल किये जाने की राजनीतिक तैयारी की जा रही है।
ऐतिहासिक प्रसंगों और विवादों को हमारे पुरखों ने अपने समय में अपने तरीके से हल कर लिया था। सीधी-सी बात है न किंतु, न परंतु — पुरखों की अर्जित आजादी की उत्तरजीविता का हक है तो पुरखों के दिये हल को को जीवित और जीवंत बनाये रखने की जवाबदेही को भी स्वीकार करना ही होगा! पुरखों के किये वायदों को निभाने का दायित्व लेना ही पड़ता है। लोकतंत्र को सामाजिक-समूहों के टकरावों में फंसाकर राजनीति को अंधेरी और रहस्यमयी रात की तरफ हांक ले जाना बहुत खतरनाक हो सकता है। इतना खतरनाक जितने की बात सत्ता और सत्ताधारी दल के लोगों के आकलन में नहीं है। मुसीबत यह है कि वर्तमान सत्ता और सत्ताधारी दल का कोई जीवित और जीवंत जन सरोकार ही नहीं है; याद किया जा सकता है कोविड-19 के समय अर्थात करोनाकाल में जनता के प्रति रुख और रवैया!
हालांकि राष्ट्रीय एकता की मिथ्या चेतना की राजनीतिक समझ के दुराग्रहों के सबूत भारत की स्वयंसेवी राजनीति के हालिया कारनामों में भरे पड़े हैं। इस में किसी को कोई संदेह नहीं है कि यह जेन-जी और जेन-अल्फा के उदय से निकल रही अपने राजनीतिक पतन की आशंकाओं में फंसी हुई भाजपा-आरएसएस की राजनीति अपनी सत्ता के बचाव के लिए ‘बांटो और राज करो’ के लिए अंग्रेजों के आजमाये हुए रास्तों की खोज कर रही है। लेकिन क्या जिस वंदे मातरम ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत की निःशर्त्त एकता का आधार दिया था, उसे अब ‘बांटो और राज करो’ का राजनीतिक हथियार बनाने में कामयाब हो जायेंगे! यह न मुनासिब है न मुमकिन होगा।
जब मति मारी जाती है, तब ऐसे-ऐसे विवेकहीन विचार दिमाग में आते हैं।









