September 13, 2026
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वंदे मातरम: अंग्रेजों के ख़िलाफ़ एकता का मंत्र, आज विवाद का हथियार?

Vande mataram

राष्ट्र गीत वंदे मातरम फिर से चर्चा और विवाद में है. ‎भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के अध्याय अभी खुले हुए हैं। भारत का ‎स्वतंत्रता आंदोलन एकार्थी था और एक ध्वन्यात्मक नहीं था। ‎बहुस्तरीयता और बहुलात्मकता भारत की बुनियाद है। भारत के ‎सामाजिक-समूहों में टकराव तो पहले भी होते ही थे। लेकिन अंग्रेजों के ‎शासन काल में इन टकरावों को जानबूझकर बढ़ाने, सोद्देश्यपूर्ण तरीके ‎से नियंत्रित करने में अंग्रेज शासकों ने शासन की उस शक्ति और शैली ‎को अपनाया जिसे ‘बांटो और राज करो’ के नाम से हम जानते हैं। ‎

‎‘बांटो और राज करो’ की हर तरकीब को बेकारगर करनेवाली मंत्र ‎प्रभावी और सम्मोहक आवाज आई- वंदे मातरम! वंदे मातरम की ‎आवाज पर सभी भारतीयों की बहुस्वरता और बहुध्वनीयता बिना कोई ‎देर किये एकात्मक आवाज में बदल जाया करती थी — पूरे गीत का ‎सम्मान अपनी जगह, लेकिन मंत्र शक्ति का स्रोत था — वंदे मातरम! 

‎वंदे मातरम ही मंत्र प्रभावी बीज पदबंध है। इसलिए राष्ट्र गीत का नाम ‎वंदे मातरम है। इसलिए राष्ट्र गान का समापन वंदे मातरम से होता है। ‎

इतिहास की विडंबना ही है कि जिस वंदे मातरम की एक आवाज पर ‎प्रत्येक भारतीय अपनी सारी विरुद्धताओं को स्थगित कर स्वतंत्रता ‎आंदोलन के दौरान पूरी मजबूती से एक हो जाते थे। दुर्भावनापूर्ण ‎तरीके से स्वतंत्रता के इतने दिन बाद आज उसी ‘वंदे मातरम’ को सत्ता ‎और सत्ताधारी दल के लोगों के द्वारा भारतीयों के बीच टकराव के लिए ‎इस्तेमाल किये जाने की राजनीतिक तैयारी की जा रही है।

ऐतिहासिक प्रसंगों और विवादों को हमारे पुरखों ने अपने समय में ‎अपने तरीके से हल कर लिया था। सीधी-सी बात है न किंतु, न परंतु — ‎पुरखों की अर्जित आजादी की उत्तरजीविता का हक है तो पुरखों के ‎दिये हल को को जीवित और जीवंत बनाये रखने की जवाबदेही को भी ‎स्वीकार करना ही होगा! पुरखों के किये वायदों को निभाने का दायित्व ‎लेना ही पड़ता है। लोकतंत्र को सामाजिक-समूहों के टकरावों में ‎फंसाकर राजनीति को अंधेरी और रहस्यमयी रात की तरफ हांक ले ‎जाना बहुत खतरनाक हो सकता है। इतना खतरनाक जितने की बात ‎सत्ता और सत्ताधारी दल के लोगों के आकलन में नहीं है। मुसीबत यह है ‎कि वर्तमान सत्ता और सत्ताधारी दल का कोई जीवित और जीवंत जन ‎सरोकार ही नहीं है; याद किया जा सकता है कोविड-19 के समय ‎अर्थात करोनाकाल में जनता के प्रति रुख और रवैया! ‎

हालांकि राष्ट्रीय एकता की मिथ्या चेतना की राजनीतिक समझ के ‎दुराग्रहों के सबूत भारत की स्वयंसेवी राजनीति के हालिया कारनामों ‎में भरे पड़े हैं। इस में किसी को कोई संदेह नहीं है कि यह जेन-जी और ‎जेन-अल्फा के उदय से निकल रही अपने राजनीतिक पतन की ‎आशंकाओं में फंसी हुई भाजपा-आरएसएस की राजनीति अपनी सत्ता के ‎बचाव के लिए ‘बांटो और राज करो’ के लिए अंग्रेजों के आजमाये हुए ‎रास्तों की खोज कर रही है। लेकिन क्या जिस वंदे मातरम ने अंग्रेजों के ‎खिलाफ भारत की निःशर्त्त एकता का आधार दिया था, उसे अब ‘बांटो ‎और राज करो’ का राजनीतिक हथियार बनाने में कामयाब हो जायेंगे! ‎यह न मुनासिब है न मुमकिन होगा। ‎

जब मति मारी जाती है, तब ऐसे-ऐसे विवेकहीन विचार दिमाग में आते ‎हैं। ‎

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