कभी गाड़ी पर नाव तो, कभी नाव पर गाड़ी
हिन्दू समाज नूह की नौका में क्या बचाएगा
प्रफुल्ल कोलख्यान

और तो और अयोध्या के स्थानीय बाशिंदों को भी कार्यक्रम स्थल से दूर ही रखा गया था। कार्यक्रम के लिए जिस तरह से आमंत्रण-पत्र भेजा गया, जिस ढंग से आयोजन हुआ वह अद्भुत था! जिस ढंग से यह सब-कुछ हुआ उससे ऐसा लगा जैसे कि रास्ता निर्बल के नहीं रह गये, ऐसा लगा जैसे कि राम कॉरपोरेट भगवान बना दिये गये हैं। भगवान राम पूजा से अधिक पूंजी के होकर रह गये हैं।

बहुत चूके, अब न चूके हिंदी-समाज और हिंदू-समाज! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को राम नाम के सहारे सत्ता के शिखर पर जनता ने पहुंचा दिया था। अब राम के नाम को बदनाम करने के अपराध में शामिल होने के चलते उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को सत्ता के शिखर से लोकतांत्रिक सम्मान के साथ वही जनता उतार भी लेगी!
सभ्य और शिष्ट लोकतांत्रिक प्रक्रिया फिर से बहाल होगी! वक्त, वक्त की बात! कभी गाड़ी पर नाव तो कभी नाव पर गाड़ी!
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याद किया जाये कि अयोध्या में 22 जनवरी 2024 के प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम का कई लोगों और संस्थाओं ने विरोध किया था। विरोध के अपने-अपने तर्क थे. अपने-अपने कारण थे। शंकराचार्यों ने दूरी बना ली थी। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के पास अपने कारण थे, और मजबूत कारण थे। उन्होंने उसे भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में अपनी कुशाग्र राजनीतिक दक्षताओं से चिह्नित किया था।
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और तो और अयोध्या के स्थानीय बाशिंदों को भी कार्यक्रम स्थल से दूर ही रखा गया था। कार्यक्रम के लिए जिस तरह से आमंत्रण-पत्र भेजा गया, जिस ढंग से आयोजन हुआ वह अद्भुत था! जिस ढंग से यह सब-कुछ हुआ उससे ऐसा लगा जैसे कि रास्ता निर्बल के नहीं रह गये, ऐसा लगा जैसे कि राम कॉरपोरेट भगवान बना दिये गये हैं। भगवान राम पूजा से अधिक पूंजी के होकर रह गये हैं।
चतुर्दिक विरोध के बावजूद 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम संपन्न हुआ। इरादा साफ था, और इरादा था मई 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 के पार पहुंचना। अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसी भी राजनीतिक, गैर-राजनीतिक और अनैतिक काम से कोई परहेज नहीं था। विपक्ष के नेताओं को ही नहीं, शंकराचार्यों और असहमत साधु-संन्यासियों को भी लांछित, अपेक्षित और अवहेलित होना पड़ा।
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’एक अकेला, सब पर भारी’ के दर्प में पूरे आत्म-विश्वास के साथ 400 पार के अभियान पर निकल पड़े — सब-कुछ मोदीमय हो गया और मोदी! मोदी भगवान हो गये! लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव का नतीजा आया तो काफी परेशान करनेवाला! 400 पार तो दूर सामान्य बहुमत से भी बहुत पीछे रह गये। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सौ के करीब पहुंच गई। अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी के सांसदों की संख्या भी ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गई।
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी को एक अकेले दम बहुमत हासिल नहीं हो पाया लेकिन एनडीए गठबंधन को बहुमत हासिल था! कई राजनीतिक विशेषज्ञ और विश्लेषकों को लगा कि नरेंद्र मोदी को गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव नहीं है और जैसा उनका रवैया रहा है, सरकार बहुत दिन तक न चल पायेगी! यह ठीक है कि नरेंद्र मोदी को गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव नहीं था, किंतु तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) के नेता एन. चंद्रबाबू नायडू और जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार को गठबंधन चलाने का खूब अनुभव था।
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कुल मिलाकर यह कि कॉरपोरेट भगवान के भरोसे 400 के पार पहुंचना संभव नहीं हुआ तो क्या हुआ ओडिशा विधानसभा की 147 सीटों में से 79 सीटों पर दर्ज कर सत्ता में आ गई और ऊपर से 3 निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी हासिल कर लिया। अद्भुत यह कि राजनीतिक आस्था बेझिझक ‘जय श्री राम’ से ‘जय जगन्नाथ’ पर फिसल गई! कहने में सच्चे भारतीय की साभ्यतिक शर्म आ रही है कि न सिर्फ राजनीतिक आस्था फिसल गई बल्कि जय श्रीराम के प्रति घोषित आस्था आत्मघाती अर्थनैतिक फिसलन में बदल गई। शुरू हो गई चंदा-चढ़ावा चोरी और नृपेंद्र मिश्र के अनुसार डकैती!
राजनीति धार्मिक आस्था को अपनी कुत्सित मंशा से लपेट लेती है। नैतिक और अर्थनैतिक विश्वास और आस्था को पलटकर आपराधिक फिसलन में बदल देती है! श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में चंदा-चढ़ावा-चोरी-डकैती इसका क्लासिकल उदाहरण है।
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राम मंदिर ट्रस्ट में हुए घोटाले की जांच-पड़ताल सिर्फ पैसा-कौड़ी में हेरा-फेरी की नजर में आजाद भारत का सबसे ज्यादा गंभीर मामला है। भारत की आजादी के बाद का सबसे ज्यादा गंभीर मामला इसलिए है कि यह सिर्फ पैसा-कौड़ी में हेरा-फेरी का नहीं, बल्कि राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति की मिलावट की दोहरी आपराधिकता से जुड़ा मामला है। इसलिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में हुए घोटाला, कह लें चंदा-चढ़ावा-चोरी-डकैती की जांच-पड़ताल दोहरी आपराधिकता के संदर्भों में गहरी शोध-दृष्टि से किये जाने की अनिवार्य जरूरत है।
‘हिंदू एकता’ की धूर्त संघी आवाज में छिपी चुनावी धूर्तताओं से हिंदुओं को सावधान हो जाना चाहिए — एक-दो बार की गलती को भोलापन माना जा सकता है किंतु गलतियों में दोहराव निश्चित रूप से पतनशीलताओं का भ्रम-रहित लक्षण है।
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इस भ्रम-रहित लक्षण को जल्द-से-जल्द सही तरीके से समझकर अगला जनादेश तय करने में ही बुद्धिमानी है। लाख टके का सवाल यह है कि क्या हिंदी-समाज और हिंदू-समाज राजनीति में धर्म की मिलावट से उत्पन्न भारत के समाज की त्राहि-त्राहि को समझ-बूझकर झूठ और झूठ की राजनीति से मुक्ति का रास्ता निकाल पायेगा! क्या अब भी यह बात समझने में दिक्कत है कि राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति की मिलावट लोकतंत्र के अपराधीकरण की प्रक्रिया है।
लोकतंत्र के अपराधीकरण की इस प्रक्रिया के पहले चक्र पूरा होते ही समाज के अपराधीकरण की प्रक्रिया चक्रवृद्धि गति पकड़ लेती है। कहने में कोई संकोच नहीं है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 का चुनाव नतीजा बतायेगा कि लोकतंत्र के अपराधीकरण की चाक्रिकता टूटती है या समाज के अपराधीकरण की चक्रवृद्धि प्रक्रिया ही तेज गति पकड़ लेती है।
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राजनीति में धर्म की मिलावट नहीं रुकती है, तो रामकथा में निहित भक्तों के विश्वास और आस्था पर आघात पहुंचेगा। उस विश्वास और आस्था को आत्मघात के रास्ता पर अधिक-से-अधिक ताकत से धकेल दिया जायेगा जिस विश्वास और आस्था को गोस्वामी तुलसीदास ने जनजीवन से जोड़ दिया। गंगा समान सब के हित के भरोसे का क्या होगा — “कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।”
बताया गया है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक आज होनेवाली है। राम मंदिर ट्रस्ट के ‘नेतागण’ अपने-अपने बचाव का रास्ता निकालने की जुगत भिड़ायेंगे। ट्रस्ट के प्रति विश्वास बहाल करने की कोशिश करेंगे अर्थात धर्म में राजनीति और राजनीति में धर्म की मिलावट की धूर्तताओं के लिए नये सिरे से जाल बिछाये जायेंगे — जोरशोर से गायेंगे हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय! अटल विहारी बाजपेयी के हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय! क्या यही परिचय है!
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ट्रस्ट अपने को बचाने की जुगत भिड़ाये इसका ‘हक’ है उन्हें। लेकिन अपने ‘हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय’ के विश्वास और आस्था को बचाने के लिए हिंदू-समाज को नये सिरे से राजनीतिक बुद्धिमानी से काम लेना होगा! सभ्य और शिष्ट लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हो पायेगी?
बहुत चूके, अब न चूके हिंदी-समाज और हिंदू-समाज! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को राम नाम के सहारे सत्ता के शिखर पर जनता ने पहुंचा दिया था। अब राम के नाम को बदनाम करने के अपराध में शामिल होने के चलते उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को सत्ता के शिखर से लोकतांत्रिक सम्मान के साथ वही जनता उतार भी लेगी!
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सभ्य और शिष्ट लोकतांत्रिक प्रक्रिया फिर से बहाल होगी! वक्त, वक्त की बात! कभी गाड़ी पर नाव तो कभी नाव पर गाड़ी!
हिन्दू समाज नूह की नौका में क्या बचाएगा।
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