आपातकाल की सीख
डॉ. लोहिया का यह मानना बिल्कुल अकाट्य था कि जब तक पार्टियों के अंदर लोकतंत्र नहीं रहेगा तो देश में लोकतंत्र कैसे बचेगा ! उनका नुस्खा था कि पार्टियों के कार्यकर्ता जब तक अपने नेताओं के गलत निर्णयों की आलोचना नहीं करेंगे, तब तक लोकतंत्र में सुधार नहीं हो सकता। आज के दौर में 'अंधभक्ति' और 'चाटुकारिता' की संस्कृति इतनी हावी हो चुकी है कि किसी भी कार्यकर्ता या कनिष्ठ नेता में यह साहस नहीं बचा है कि वह अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के एकाधिकारवादी रवैये या गलत नीतियों के खिलाफ एक शब्द भी बोल सके। ऐसा करने पर उन्हें तुरंत किनारे लगा दिया जाता है।
शिवानंद तिवारी

बात संभवतः 2009 की है। बिहार के कई क्षेत्रों में उपचुनाव हुए थे। उन उप चुनावों में जदयू की भारी पराजय हुई थी। इस पर विचार मंथन करने के लिए मुख्यमंत्री आवास में एक बैठक बुलायी गई थी। उन्हीं दिनों नीतीश जी ने राजनीति में परिवारवाद के ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया था। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। लेकिन पार्टी के अंदर इस मुद्दे पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई थी।
बैठक के एजेंडा पर बातचीत हो जाने के बाद मैंने नीतीश जी से सवाल किया कि राजनीति में परिवारवाद लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं है। इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना लोकतंत्र की रक्षा के लिए बहुत शुभ है। लेकिन इतना महत्वपूर्ण निर्णय पार्टी के किस फ़ोरम पर लिया गया। मैंने डॉक्टर लोहिया को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘लोकतंत्र पार्टियों से चलता है, लेकिन अगर पार्टियों के भीतर लोकतंत्र नहीं रहेगा तो देश के अंदर लोकतंत्र कैसे बचेगा !
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उन दिनों बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का जो अभियान चलाया जा रहा था मैं उसका अध्यक्ष बनाया गया था। नीतीश जी ने ही बनाया था। मेरे सवाल पूछने के परिणामस्वरूप मुझे अभियान समिति की जवाबदेही से मुक्त कर दिया गया।
तेजस्वी यादव कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए। इसके पूर्व की कमिटी में मैं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष था। उस कमिटी की अंतिम बैठक बापू सभागार में हुई थी। उस कार्यक्रम में तेजस्वी यादव का महिमा मंडन हो रहा था। मैंने वहां कहा कि यह सब उसी समय शोभा देगा जब लोकतंत्र बचेगा। लोकतंत्र को बचाने के लिए जेल जाना होगा, पुलिस की लाठी खानी होगी। अगर लोकतंत्र नहीं रहेगा तो इस महिमा मंडन का क्या अर्थ होगा ! इसका नतीजा हुआ कि अगली जो कमेटी बनी उसमें मुझे कार्यकारिणी में भी नहीं रखा गया।
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आज अधिकांश दल ‘व्यक्ति-केंद्रित’ या ‘परिवार-केंद्रित’ हो चुके हैं। चाहे वे उत्तर भारत की क्षेत्रीय पार्टियां हों (राजद, जदयू, सपा, बसपा) या दक्षिण भारत के दल।
फैसले बंद कमरों में एक नेता या उसके परिवार द्वारा लिए जाते हैं, और दल के बाकी लोग केवल उन फैसलों पर मुहर लगाते हैं।
डॉ. लोहिया का यह मानना बिल्कुल अकाट्य था कि जब तक पार्टियों के अंदर लोकतंत्र नहीं रहेगा तो देश में लोकतंत्र कैसे बचेगा ! उनका नुस्खा था कि पार्टियों के कार्यकर्ता जब तक अपने नेताओं के गलत निर्णयों की आलोचना नहीं करेंगे, तब तक लोकतंत्र में सुधार नहीं हो सकता। आज के दौर में ‘अंधभक्ति’ और ‘चाटुकारिता’ की संस्कृति इतनी हावी हो चुकी है कि किसी भी कार्यकर्ता या कनिष्ठ नेता में यह साहस नहीं बचा है कि वह अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के एकाधिकारवादी रवैये या गलत नीतियों के खिलाफ एक शब्द भी बोल सके। ऐसा करने पर उन्हें तुरंत किनारे लगा दिया जाता है।
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बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान सभा के अपने अंतिम भाषणों में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह अंततः बुरा साबित होगा।
आज आपातकाल घोषित नहीं है. लेकिन लोकतंत्र को चलाने वाली संस्थाएं जिस ढंग से सत्ता के सामने घुटने टेक रही हैं, चाहे चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो या अन्य संस्थाएं, सब के सब सत्ता के सामने झुकी हुई हैं। इसलिए आज बग़ैर घोषित आपातकाल के आपातकाल की ही स्थिति बनी हुई है।
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आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ी सीख यही है कि यदि लोकतंत्र को बचाना है, तो इसकी शुरुआत राजनीतिक दलों के भीतर से होनी चाहिए। जब तक दलों के अंदर संवाद, असहमति का सम्मान और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नहीं होंगे, तब तक देश में पूर्ण लोकतंत्र की कल्पना अधूरी है। कार्यकर्ताओं को ‘दरबारी’ बनने के बजाय जागरूक प्रहरी बनना होगा, जैसा कि 1974 के आंदोलन और जेपी आंदोलन के समय के सेनानियों ने सीख दी थी।
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