1965 का समाजवादी आंदोलन और 1967 में पहली संविद सरकार

शिवानंद तिवारी
इस अभियान में डॉ. राममनोहर लोहिया बिहार में काफी सक्रिय थे। 9 अगस्त 1965 को उन्हें पटना के सर्किट हाउस के सामने से गिरफ्तार कर लिया गया। उस दिन सारी रात उनको कोतवाली थाना में कुर्सी पर बैठाकर रखा गया था और अगले दिन हज़ारीबाग़ जेल भेजा गया। पुलिस दमन और डॉ लोहिया की गिरफ्तारी के विरोध में गांधी मैदान में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य विपक्षी दलों की एक संयुक्त सभा बुलाई गई। मैं भी उस सभा में उपस्थित था।
सन् 1965 समाजवादी आंदोलन और मेरे राजनीतिक जीवन का एक निर्णायक वर्ष था। उस समय महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ समाजवादी आंदोलन ने व्यापक जनसंघर्ष छेड़ रखा था। दूसरी ओर, समाजवादियों के प्रभाव और कर्मचारियों की एकजुटता के कारण बिहार सरकार के लगभग सभी कार्यालय ठप पड़ गए थे। पहली बार बिहार सचिवालय बंद हुआ था। विभिन्न विभागों के कर्मचारी एक मंच पर आए, महासंघ का गठन हुआ और राज्यव्यापी हड़ताल हुई।
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उन दिनों के. बी. सहाय बिहार के मुख्यमंत्री थे। वे अपने जिद्दी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। हड़ताल के दौरान उन्होंने एक बयान दे दिया कि इन कर्मचारियों के परिवारों के बाल-बच्चों से वे “चिनिया बादाम(मूंगफली)” बेचवा देंगे। स्थिति ऐसी बनी कि सचिवालय कर्मचारियों के परिवार के लोग सचिवालय के सामने सचमुच चिनिया बादाम बेचने लगे। इससे सरकार की काफी किरकिरी हुई।
इस अभियान में डॉ. राममनोहर लोहिया बिहार में काफी सक्रिय थे। 9 अगस्त 1965 को उन्हें पटना के सर्किट हाउस के सामने से गिरफ्तार कर लिया गया। उस दिन सारी रात उनको कोतवाली थाना में कुर्सी पर बैठाकर रखा गया था और अगले दिन हज़ारीबाग़ जेल भेजा गया। पुलिस दमन और डॉ लोहिया की गिरफ्तारी के विरोध में गांधी मैदान में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य विपक्षी दलों की एक संयुक्त सभा बुलाई गई। मैं भी उस सभा में उपस्थित था।
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वास्तव में वह सभा कम और आक्रोश का प्रदर्शन अधिक थी। पटना का माहौल बहुत तनावपूर्ण था। जगह-जगह लाठीचार्ज हुआ था, गिरफ्तारियाँ हुई थीं और कहीं-कहीं आँसू गैस भी चले थे। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में मुख्यतः पार्टी कार्यकर्ता ही सभा में उपस्थित थे।
सभा की अध्यक्षता संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रामानन्द तिवारी कर रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कामरेड चंद्रशेखर सिंह सहित कई प्रमुख नेता मंच पर थे। कर्पूरी ठाकुर मंच पर नहीं थे, वे नीचे कार्यकर्ताओं के बीच बैठे थे। उनके बगल में ही मैं भी बैठ गया था। पटना के तत्कालीन सांसद तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता रामावतार शास्त्री, सहदेव यादव और अनेक अन्य नेता भी नीचे बैठे थे।
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उन दिनों पटना के कलक्टर जे.एन. साहु थे। अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के पुलिस पहुँची। पहले राइफलधारी पुलिस आई और उसके पीछे लाठीधारी पुलिस। बिना कोई चेतावनी दिए पुलिस की एक टुकड़ी मंच पर चढ़ गई और दूसरी टुकड़ी ने सामने बैठे लोगों पर निर्मम ढंग से लाठी बरसाना शुरू कर दिया।
उस समय मेरी उम्र कम थी। लाठीचार्ज शुरू होते ही मैं वहां से भाग लिया। लेकिन भागते-भागते अचानक पीछे मुड़कर देखा तो बाबूजी दिखाई दिए। उसी क्षण मैंने देखा कि एक सिपाही ने पूरी ताकत से उनकी पीठ पर लाठी मारी। उनका चेहरा दर्द से विकृत हो गया।
यह देखकर मैं वापस लौटा और जाकर बाबूजी से लिपट गया। दो-तीन लाठी मेरी पीठ पर भी गिरी। तभी किसी सिपाही या हवलदार ने लाठी के मूठ वाले हिस्से से मेरी पीठ पर प्रहार किया। मेरी साँस रुक-सी गई और ऐसा लगा मानो प्राण ही निकल जाएंगे। मेरे मुँह से अनायास निकला—“जान गइल हो दादा”।
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बाबूजी ने तत्काल कहा, ‘जल्दी भाग, ना त तोरा मार दीहें सन’ पुलिसवालों से बोले, “मेरा बेटा है, इसे छोड़ दीजिए”
तभी कुछ पुलिसवाले कहने लगे, “अरे, यही शिवानंद है, यही शिवानंद है। पकड़ो इसको। लेकिन मैं झटका दे कर हवलदार के हाथ से अपने को छुड़ा कर वहां से भाग निकला।
मुझे आज भी याद है कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कामरेड चंद्रशेखर सिंह के सिर के पीछे लाठी लगी थी। वे बेहोश होकर मंच से गिर पड़े थे। पुलिसवालों ने उन्हें देखा नहीं और उन्हें उसी हालत में वहीं छोड़कर चले गए। पुलिस ने अधिकांश नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें जेल भेज दिया। कर्पूरी ठाकुरजी के हाथ की हड्डी टूट गई थी। रामानन्द तिवारी जी के मुँह से खून निकलने लगा था। अफवाह फैल गई कि तिवारी जी की मृत्यु हो गई है।
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बिहार की राजनीति में यह एक अभूतपूर्व घटना थी। विपक्ष के लगभग सभी प्रमुख नेताओं पर एक साथ ऐसा हमला न पहले कभी हुआ था और न बाद में। मैंने भी जीवन में पहली बार पुलिस की लाठी उसी कार्यक्रम में खाई थी।
बाद में सरकार ने सफाई दी कि 15 अगस्त समारोह के लिए लगाए जा रहे बाँस-बल्लों को प्रदर्शनकारी उखाड़ रहे थे और जला रहे थे, इसलिए मजबूरन लाठीचार्ज करना पड़ा। लेकिन मैं स्वयं उस घटना का प्रत्यक्षदर्शी था। ऐसा कुछ नहीं हुआ था।
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उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रणव चटर्जी हुआ करते थे। उन्होंने मेरी हवाले से एक बयान तैयार किया, जिसमें सरकार के आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया गया। वह मेरे जीवन का पहला अवसर था जब मेरा बयान समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ।
इस प्रकार, सन् 1965 समाजवादी आंदोलन के लिए जितना महत्वपूर्ण वर्ष था, उतना ही मेरे राजनीतिक जीवन के लिए भी। उस एक घटना ने मेरे राजनीतिक भविष्य की दिशा तय कर दी थी। 1965 के संघर्ष ही वह कारण बना, जिसने 1967 के संयुक्त विधायक दल(संविद सरकार) की सरकार की आधारशिला तैयार कर दी थी। और बिहार में पहली संयुक्त समाजवादी पार्टी की सरकार का गठन हुआ।
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