July 30, 2026
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शतक कब लगाएगा – 67 पैसे कमजोर होकर 95.23 प्रति डॉलर पर रुपया

पूर्व प्रधानमंत्री और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने भी नोटबंदी पर बोलते हुए एक बार कहा था इस कदम से देश का जीडीपी दो से चार प्रतिशत तक नीचे गिर सकता है। वित्तीय वर्ष 2017 में जीडीपी गिरकर 3.8 प्रतिशत हो गया। यह देखते हुए मोदी सरकार ने जीडीपी गणना के मानक में ही आमूलचूल परिवर्तन कर दिया और अगले साल 2017 में जीडीपी फिर 7.2 प्रतिशत पर आ गई।

बुधवार 01 जुलाई को भारतीय रुपया अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा डॉलर के समक्ष कमजोर होकर 95.23 रूपए हो गया और शतक के काफी करीब पहुंच गया है। अब देखना है कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कब शतकवीर बनता है सौ के आकंड़े को पार करता है।

भारत में जब 2014 में पहले पहल मोदी सरकार आई थी, तो कई गैर आर्थिक क्षेत्र के (अ)ज्ञानी बाबा लोग सामने आकर बोलने लगे कि अभी भारतीय रुपया 65-66 प्रति डॉलर है, इसे चालीस (40) रुपए प्रति डॉलर तक मोदी सरकार लेकर जाएगी। लेकिन, न तो मोदी सरकार पेट्रोल की कीमतों को चालीस रुपए पर ले जा पाई और न ही डॉलर को चालीस पार करा पाई। उल्टे कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी होने के बावजूद पिछले दस सालों से सरकार पेट्रोल-डीजल 100 रुपए के आसपास बेच रही है और भारतीय जनता का खून चूस रही है।  

भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले 12 सालों से और खासकर 10 सालों से हिचकोले खाती हुई चल रही है। 10 सालों से खासकर इसलिए कि वर्ष 2016 के नवम्बर-दिसम्बर महीने में नोटबंदी हुई थी और एक मोटे अनुमान के मुताबिक जीडीपी दो से ढाई प्रतिशत नीचे चली गई थी।

पूर्व प्रधानमंत्री और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने भी नोटबंदी पर बोलते हुए एक बार कहा था इस कदम से देश का जीडीपी दो से चार प्रतिशत तक नीचे गिर सकता है। वित्तीय वर्ष 2017 में जीडीपी गिरकर 3.8 प्रतिशत हो गया। यह देखते हुए मोदी सरकार ने जीडीपी गणना के मानक में ही आमूलचूल परिवर्तन कर दिया और अगले साल 2017 में जीडीपी फिर 7.2 प्रतिशत पर आ गई। बस फिर क्या था, सरकार अर्थव्यवस्था से लेकर हर मामले में केवल आंकड़े के फेरबदल और हेराफेरी में लग गई।

उसके तुरंत बाद मोदी सरकार, जो पहले जीएसटी की घोर विरोधी थी, ने बिना उचित तैयारी के ही जीएसटी लागू कर दिया। बिना तैयारी के इन दो – नोटबंदी और जीएसटी लागूकरण, घटनाओं के कारण भारत का असंगठित क्षेत्र जो कुल रोजगार का नब्बे प्रतिशत के आसपास था, वह तितर-बितर हो गया।

उल्लेखनीय है कि भारत के कुल कार्यबल का लगभग 90 प्रतिशत करीब का हिस्सा असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में कार्यरत है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कृषि, निर्माण, खुदरा व्यापार और छोटे विनिर्माण उद्यम आते हैं, जहां श्रमिकों को आमतौर पर कोई सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, ईपीएफ) प्राप्त नहीं होती है। इसी क्षेत्र में नकद कारोबार सबसे अधिक होता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था का एक आधार की तरह था, जिसे खतम करने की कोशिश की गई।

असंगठित क्षेत्र का देश की सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी में योगदान लगभग 50 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 75% से अधिक श्रमिक स्वर-नियोजित या स्वरोजगार या आकस्मिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के असंगठित क्षेत्र उद्यमों के नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, असंगठित गैर-कृषि प्रतिष्ठानों की संख्या 7 करोड़ से अधिक हो गई है, जिससे 15 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

   इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र में ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के असर से होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में पिछले तीन महीनों से उछाल आया हुआ था और इस कारण पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों में भारी तेजी देखने को मिली है। पिछले दस दिनों से कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में  काफी कमी हो जाने के बावजूद पेट्रोल-डीजल-गैस के ग्राहकों को सरकारी तेल कंपनियों से कोई राहत नहीं दी गई है। भारत की एक नायरा नामक तेल कंपनी, जो पहले एस्सार – रूइया की कंपनी थी, ने जरूर कल पेट्रोल में पांच रूपया और डीजल में तीन रूपए की कमी करके ग्राहकों को राहत देने का काम किया है।

उल्लेखनीय है कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया यदि एक सौ पैसे या एक रूपया गिरता है, तो विदेशी मुद्रा विनिमय डॉलर के रूप में करने के क्रम में इस मामले में भारत पर एक लाख करोड़ की देनदारी बढ़ जाती है। यह रूपए को गिरने से संभालना भारतीय रिजर्व बैंक के साथ साथ भारत के वित्त मंत्रालय का काम है। और अभी तक यह काम मुस्तैदी से नहीं किया गया है।

नहीं तो क्या कारण है कि भारत के पड़ोसी मुल्कों में डॉलर के मुकाबले उनका रूपया-टाका आदि स्थिर है। और यही नहीं, कच्चे तेल की कमतों में कटौती होते ही उन्होंने अपने देश के नागरिकों को पेट्रोल-डीजल-गैस सस्ता देना शुरू भी कर दिया है।

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