July 30, 2026
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जीवन की लौ और खरकई नदी की कलकल धारा

मुझे टीएमएच (टाटा मेन अस्पताल) में भर्ती होना पड़ा। तीन दिन अस्पताल में रहने के बाद छुट्टी मिली, लेकिन अगले ही दिन ऐसी बेचैनी हुई कि फिर भर्ती होना पड़ा। यहाँ से कहीं और जाने का प्रश्न भी कठिन है। छोटे बेटे मंटू का फोन आता है कि यहाँ आ जाइए, यहाँ बेहतर चिकित्सा सुविधा है। लेकिन चिकित्सा सुविधा किसी को अमरत्व नहीं दे सकती। जीवन का अंत तो निश्चित है। 

गाँव में बचपन के दिनों में हम लोगों की पढ़ाई लालटेन की रोशनी में होती थी। परिवार के सभी लड़के एक साथ बैठकर पढ़ते थे। बारी-बारी से लालटेन का शीशा साफ करना, उसकी बाती ठीक करना, तेल का हिसाब रखना भी हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा था। जब तेल खत्म होने के करीब होता था तो लालटेन की लौ टिमटिमाने लगती थी—कभी तेज, कभी धीमी। उसे देखकर समझ में आ जाता था कि अब तेल समाप्त होने वाला है। आज जब मैं अपने जीवन के 83वें वर्ष में हूँ, तो कभी-कभी लगता है कि जीवन की लालटेन भी कुछ वैसी ही टिमटिमा रही है। मेरा जन्म 9 दिसंबर 1943 को हुआ था और अब यह एहसास स्वाभाविक है कि जीवन का तेल समाप्ति की ओर है.

इन दिनों मैं जमशेदपुर में अपने बड़े बेटे के पास हूँ। मेरी बेटी भी यहीं रहती है। जमशेदपुर से मेरा पुराना संबंध रहा है। मेरे बड़े भाई, जो टिस्को में काम करते थे, यहीं से सेवानिवृत्त हुए, यहीं उनका निधन हुआ और यहीं उनका दाह संस्कार भी हुआ। पहले जब मैं जमशेदपुर आता था तो बेटी के घर ठहरता था, लेकिन इस बार बेटे के यहाँ हूँ और बेटे-बहू का सेवा-सुख प्राप्त कर रहा हूँ। हालांकि शरीर की स्थिति देखकर नहीं लगता कि यह सिलसिला बहुत लंबा चलेगा।

मुझे टीएमएच (टाटा मेन अस्पताल) में भर्ती होना पड़ा। तीन दिन अस्पताल में रहने के बाद छुट्टी मिली, लेकिन अगले ही दिन ऐसी बेचैनी हुई कि फिर भर्ती होना पड़ा। यहाँ से कहीं और जाने का प्रश्न भी कठिन है। छोटे बेटे मंटू का फोन आता है कि यहाँ आ जाइए, यहाँ बेहतर चिकित्सा सुविधा है। लेकिन चिकित्सा सुविधा किसी को अमरत्व नहीं दे सकती। जीवन का अंत तो निश्चित है। आदमी केवल यही चाहता है कि अंत कम से कम कष्टदायक हो। मेरी भी यही इच्छा है।

बड़े बेटे के घर की खिड़की से खरकई नदी दिखाई देती है, दूर तक फैला जंगल दिखाई देता है, सड़कों पर आते-जाते वाहन दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर जीवन की गति महसूस होती है। पटना के जिस घर में आजकल हम लोग रहते हैं, वहाँ तो मानो कैद जैसी स्थिति है। यहाँ कम से कम प्रकृति और जीवन की हलचल दिखाई देती है।

आज के समय की एक बड़ी समस्या यह भी लगती है कि घर के बुजुर्गों के लिए समय घटता जा रहा है। औपचारिकता निभा दी जाती है, लेकिन आत्मीयता कम होती जाती है। इस मामले में मेरे बेटे-बहू को देखकर संतोष होता है। दोनों ने जीवन में बहुत संघर्ष किया है। दोनों काम करते हैं। लेकिन अपनी बेटियों का बहुत अच्छे ढंग से पालन-पोषण किया है।

मेरी बड़ी पोती की शादी अगले वर्ष जनवरी में तय हुई है। उसकी शादी को लेकर उसकी दादी विमला जी बहुत चिंतित रहती थीं। उनकी इच्छा थी कि शादी उनकी आँखों के सामने हो जाए, लेकिन तब लड़की की उम्र कम थी। अब शादी तय हो चुकी है। मेरी इच्छा यही है कि अपनी पोती का विवाह देख कर ही दुनिया से प्रयाण करूँ। उसके बाद जीवन से कोई विशेष अपेक्षा भी नहीं है। जीवन तो मैंने भरपूर जिया है। परिस्थितियों से संघर्ष भी किया है। कभी किसी के सामने न सर झुकाया है न ही हाथ पसारा है। अंत तक अपने सिद्धांतों पर क़ायम रहा। लेकिन शरीर अब उस स्थिति में नहीं रहा कि किसी गतिविधि में सक्रिय हो सकूँ।

बहुत लोगों ने आग्रह किया कि मैं अपने जीवन की कहानी लिखूँ। कुछ शुरुआत भी हुई, लेकिन अब लगता है कि उसका लालच मन में रखने का कोई अर्थ नहीं है। मैं कोई इतना बड़ा व्यक्ति नहीं हूँ कि मेरी आत्मकथा से इतिहास प्रभावित हो जाएगा। चुनावी राजनीति मैंने लालू और नीतीश के साथ किया है. लालू यादव के विषय में कुछ लिखूँ या नीतीश कुमार के विषय में उससे क्या बदल जाएगा? प्रशंसा करूँ तो समर्थक खुश होंगे, आलोचना करूँ तो विरोधी। जो कुछ सार्वजनिक जीवन में हुआ है, वह अधिकांशतः लोगों के सामने है। इसलिए अब उस दिशा में कोई विशेष उत्साह नहीं बचा है।

फिलहाल जमशेदपुर में ही रहने का इरादा है। यह शहर मेरे लिए केवल एक शहर नहीं है. बहुत सारी स्मृतियां यहां से जुड़ी हैं. यहीं 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मेरे बाबूजी ने गांधी टोपी पहनकर अपने साथियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ विस्टूपुर की सड़कों पर नारे लगाए, गिरफ्तार हुए और हजारीबाग जेल भेजे गए। वहीं उनकी मुलाकात जयप्रकाश जी से हुई और उन्होंने समाजवाद का पहला पाठ सीखा। इसलिए जमशेदपुर मेरे जीवन और मेरे परिवार के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यदि समय ऐसा आये कि अंतिम यात्रा की तैयारी करनी पड़े, तो मेरी इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार भी जमशेदपुर में ही हो। मैंने अपनी माँ का दाह संस्कार विद्युत शवदाह गृह में कराया था। मेरा भी वैसे ही हो जाए, वही पर्याप्त होगा। जीवन का अंत जितना शांति के साथ हो जाए उतना ही अच्छा है।

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