July 30, 2026
#Citizen Charter #National #Opinion #Politics

समानता नहीं, विविधता है ताकत

प्रफुल्ल कोलख्यान

आगे बढ़ने के पहले कुछ ध्यान दिलाना जरूरी है — अब धर्म एक मुखौटा है और कानून भी एक मुखौटा ही बनकर रह गया है। कानून के धर्म की नेक बात करते हुए, कभी धीरे से तो कभी जोर से धर्म को कानून का व्यावहारिक दर्जा मिल जाता है। धर्म और कानून के मुखौटों का अदल-बदल का लक्ष्य आम लोगों का आर्थिक शोषण ही होता है। मुखौटों के अदल-बदल में फासीवादी शक्तियां सबसे तेज होती है।

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) और नागरिकता प्रमाणपत्र से जुड़े सवाल वर्तमान में भारत के सबसे चर्चित और संवेदनशील नागरिक-राजनीतिक विषयों में से एक है। भारत सरकार की डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट के रवैया के चलते भारत के नागरिक जीवन कपट. कोहराम और कोलाहल से भरा हुआ है। इस राजनीतिक कपट कोहराम और कोलाहल का हाल यह है कि प्रतिष्ठित जीवन जी चुके नामी-गिरामी लोगों के नाम इधर-उधर के कारणों के बहाने से पासपोर्ट नहीं बन रहा है, पासपोर्ट नवीनीकरण रोक लिया जा रहा है — द टेलीग्राफ अखबार के पूर्व संपादक आर राजगोपाल के पासपोर्ट नवीनीकरण का मामला तो एक उदाहरण भर है।  

आगे बढ़ने के पहले कुछ ध्यान दिलाना जरूरी है — अब धर्म एक मुखौटा है और कानून भी एक मुखौटा ही बनकर रह गया है। कानून के धर्म की नेक बात करते हुए, कभी धीरे से तो कभी जोर से धर्म को कानून का व्यावहारिक दर्जा मिल जाता है। धर्म और कानून के मुखौटों का अदल-बदल का लक्ष्य आम लोगों का आर्थिक शोषण ही होता है। मुखौटों के अदल-बदल में फासीवादी शक्तियां सबसे तेज होती है।

समान नागरिक संहिता को समझने ‎के लिए हमें इसके ‎कानूनी, ऐतिहासिक और राजनीतिक ‎पहलुओं को ‎गहराई से देखना जरूरी है। ‎

बोलचाल की भाषा में समान नागरिक संहिता का मतलब है पूरे देश में सभी के एक जैसा यानी सभी लोगों के लिए एक समान कानून। ऐसा कानून जो सभी धार्मिक समुदायों और उस समुदाय के सभी लोगों के मामलों में जैसे —विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे में समान रूप से लागू हो। सुनने में सतह पर बात अच्छी लगती है, आकर्षक भी। इसलिए सतह के नीचे, बात की तह में जाना जरूरी है।

अभी क्या स्थिति है? इस समय आपराधिक कानून सभी नागरिकों के लिए समान है। लेकिन रीति-रिवाजों, शादी-ब्याह जैसे मामले पारंपरिक रूप से अपनी-अपनी सामुदायिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होते हैं, धर्म के आधार पर तय होते हैं — हिंदुओं, सिखों, जैनों और बौद्धों के लिए हिंदू कोड बिल है, जबकि मुस्लिमों, ईसाइयों और पारसियों के लिए उनके अपने पर्सनल लॉ (जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ) हैं। इसके अलावा विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act – SMA) ‎भी है।

क्या समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) जेंडर न्याय (Gender Justice) का स्वाभाविक वातावरण बनायेगा या पारिवारिक और धार्मिक मामलों में भेदभाव का आधार तैयार कर देगा।

क्या समान नागरिक संहिता से राष्ट्रीय एकता अधिक सशक्त होगी? इसका सीधा जवाब है नहीं! क्यों? क्योंकि, यह कहने-सुनने में जैसा भी लगे भारत की राष्ट्रीय एकता की बुनियाद समानता पर ‎नहीं टिकी है। न आर्थिक समानता है, न सामाजिक समानता! ध्रुवीकरणों के चलते छोटे-छोटे द्वीपों में सांस ले रहे समाज या कि राष्ट्र की एकता का आधार समानता है! यकीन! कौन यकीन करेगा! अविरोधी भिन्नताओं से बनी विविधताओं में है भारत की राष्ट्रीय एकता ‎की ताकत! समानता नहीं, विविधता है ताकत, भारत की राष्ट्रीय एकता की ताकत!

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सदियों के टकरावों ‎की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के माध्यम से विकसित ‎सामाजिक भिन्नताओं के अविरोधी बनकर विविधताओं ‎के रूप में विकसित सामाजिक सामंजस्य की ‎बुनियाद पर टिकी है। बहुलात्मक और बहुस्तरीय भारतीयता ‎के सार में अंतर्निहित है भिन्नताओं के अविरोधी बनने ‎से विकसित विविधताओं में सहिष्णु-सहअस्तित्व के ‎प्रति सहज अनुराग — हिलमिल रहने की प्रवृत्ति। ‎अर्थात ‘तुलसी या संसार में, भांति-भांति के लोग। ‎सबसों हिल-मिल चालिए, नदी नाव संजोग॥‘‎

समान नागरिक संहिता नदी-नाव संयोग को वियोग में और भिन्नताओं को विरुद्धताओं में बदल देगा। इस अर्थ में समान नागरिक संहिता प्रतिगामी है, पीछे की ओर खींचकर ऐतिहासिक टकरावों के संकट में ले जानेवाला, अशांति और अराजकता का वातावरण बनानेवाला साबित हो सकता है। कुल मिलाकर यह कि समान नागरिक संहिता नदी-नाव संयोग को तोड़नेवाला लग रहा है।

भारत ‘उनके अनुकूल’ होने के अर्थ में न तो ‘एक’ राष्ट्र है और न उस अर्थ में एक नियम भारत की एकता की दृष्टि से हितकर है। इधर-उधर के सामाजिक हित और हितधारकों (Social Stakeholders) को ध्यान में रखकर समझ में आने लायक बात तो यह है कि राजकीय नियम को सामाजिक नियम पर लादने से राजकीय शक्ति को बचना चाहिए — राज्य को समाज पर चढ़ बैठने की कोशिश से बचना चाहिए।

तो क्या संविधान परिषद् की सभा में इस पर विचार नहीं किया गया था! विचार किया गया था! विडंबना यह है कि संविधान सभा में इस पर बहुत तीखी बहस हुई थी। मजे की बात यह है कि संविधान सभा में बहुत तीखी और व्यापक बहस हुई थी। महिलाओं के सशक्तिकरण समाज को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने के लिए समान ‎नागरिक संहिता को बेहद जरूरी माना गया था।। ‎

संविधान सभा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू ‎समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे। प्रसंगवश, अंतरधार्मिक जोड़ों के लिए 30 दिन की सूचना का अनिवार्य प्रावधान खतरनाक और असुरक्षित हो सकता है। खासकर तब जब सरकार उन लोगों के साथ दिखती है जो संविधानसम्मत अधिकारों को रौंदकर अपनी मनमर्जी करने पर सदैव आमादा रहते हैं।

नेहरू और बाबासाहेब जब समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे तब क्या स्थिति थी और जब भारतीय जनता पार्टी आज इस लागू करने के लिए आमादा है तो उसका विरोध का आधार क्या है? यह ऐतिहासिक रूप से विकसित डेडलॉक यानी गतिरोध और मतिरोध है। इस गतिरोध और मतिरोध की स्थिति को समझना जरूरी है।

उस समय हमारे पुरखों को आत्मविश्वास और गहरा भरोसा था कि आजादी के बाद सांप्रदायिक तनाव के बावजूद सामाजिक टकराव कम होता चला जायेगा। सांप्रदायिक तनाव समाज के बहुत कम और उपद्रवी लोगों तक सीमित रह जायेगा। उन्हें क्या पता था कि सांप्रदायिक ताना-तनी और तनाव राजनीतिक और लोकतांत्रिक संदर्भों के चुनावी तंत्र में यह ताना-तनी और तनाव ध्रुवीकरण के रूप में विकसित हो जायेगा! 

इसलिए तब जब डॉ. बी.आर. अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू ने समान नागरिक संहिता में जन-हित की संभावनाएं देखी थी। आजकल की राजनीतिक स्थिति-परिस्थिति में जब शासक-दल ध्रुवीकरण को राजनीतिक हथियार के रूप में व्यवहार कर रहा है तब राजनीतिक व्यावहारिकता का तकाजा है कि सामाजिक नियमों पर राजकीय हस्तक्षेप में अंतर्निहित खतरों के प्रति सावधान रहा जाए!

बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति और मिजाज में समान नागरिक संहिता को स्वीकार्य मानने में निश्चित संकोच है। यह मानने में किसी को भी दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि किसी भी चीज का अस्वीकार्य या स्वीकार्य होने का कारण सिर्फ उस चीज में नहीं हुआ करती है, बल्कि बाहर भी होती है, जैसे कि देश-काल का परिप्रेक्ष्य! इस मामले में यह क्लासिकल है।

इसी तरह का एक अन्य मामला है ‘ताकतवर’ पब्लिक सेफ्टी अधिनियम! अब पश्चिम बंगाल में भी समान नागरिक संहिता की तैयारी जोरशोर से ‎हो रही है। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही 29 जून 2026 को ‎पश्चिम बंगाल विधानसभा में ‘वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी ‎एंड कंट्रोल ऑफ ‎एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026 (West Bengal ‎Public Safety ‎and Control of Anti-Social Activities Bill, 2026) ‎पास किया गया ‎है।

आम बोलचाल में लोग इसे “गुंडा बिल” (Goonda Bill) भी ‎कह रहे ‎हैं। Public Safety Act – PSA‎ जम्मू-कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम ‎‎(Public Safety Act – PSA), 1978 भारत के सबसे चर्चित और विवादित ‎निवारक निरोध (Preventive Detention) कानूनों में से एक है। ‎

भारत की अंदरूनी राजनीति दोतरफा घिरी हुई है — बहुत तेजी से राजनीति का ‎अपराधीकरण हो रहा है और साधारण एवं निर्दोष लोगों पर तथा विपक्ष के ‎राजनीतिक नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय युवाओं पर इसका ‎बेधड़क-बेझिझक इस्तेमाल बढ़ता चला गया है। विडंबना है कि ‘गुंडों’ के ‎सामाजिक शासन में ‘गुंडा बिल’ शरीफों को अधिक डराता रहा है। जानकार लोग ‎इसकी तुलना ब्रिटिश काल के बदनाम रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act, 1919) से ‎करने से नहीं हिचकते हैं।  ‎

महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act, 1919) को काला कानून कहा और ‎इसके खिलाफ 6 अप्रैल 1919 को ‎राष्ट्रव्यापी रॉलेट सत्याग्रह शुरू किया। ‎जलियांवाला बाग हत्याकांड रॉलेट एक्ट ‎का खूनी परिणाम 13 अप्रैल ‎‎1919‎ भी ‎रॉलेट एक्ट के नाम पर है। असहयोग ‎आंदोलन के माध्यम से राष्ट्र का महा-आक्रोश ‎‎(अगस्त 1920) सामने आया था। तब बापू थे! लगभग सौ साल बाद किससे करें ‎शिकायत, किससे कहें कि आखिर हुआ क्या है! ‎

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