July 30, 2026
#National #Opinion #Politics

इस्तीफा की रणनीति और राजनीति 

प्रफुल्ल कोलख्यान

अब राम मंदिर आंदोलन और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े ‎ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पोलपट्टी खुल कर सामने आ गई है। देश की संविधानसम्मत धर्मनिरपेक्ष जनशक्ति और राजनीतिक शक्ति का पहला संवैधानिक दायित्व है, बुनियादी ईमानदारी के साथ अविलंब छद्म-धार्मिकता की हथियाई जमीन पर, पर्याप्त कारणों के साथ, संविधानसम्मत धर्मनिरपेक्ष शक्ति का नियंत्रण हासिल होना सुनिश्चित करे, धर्मनिरपेक्षता की खोई हुई जमीन को रिक्लेम (Reclaim) करे।

सेकुलर राजनीति की संवैधानिक जगह को फिर से सांप्रदायिक शक्ति से बचाने की कोशिश का राजनीतिक समय आ गया है। सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के संवैधानिक प्रावधानों की गहरी सामाजिक स्वीकृति और राजनीतिक शक्ति के इस्तेमाल का समय है।

धर्म के दो रूप हैं — पहला यह है कि धर्मपीड़ित जनता का आर्तनाद है, सांसारिक दुखों से मुक्ति का रास्ता है। दूसरा यह कि धर्म लुटेरी शक्तियों के हाथ का हथियार है। मुश्किल यह है कि अधिक-से-अधिक लोगों की भावना लुटेरी शक्तियों के हाथ और साथ हो जाया करती है यानी वही स्टॉकहॉम सिंड्रोम। 

पाप का घड़ा नहीं फूटा है, बल्कि टंकी ओवरफ्लो कर रहा है। निस्संदेह छोटी मछली और बड़ी मछली का खेल सत्ताधारी दल के सभी स्तर पर जारी है।

कौन कहता है कि जिन लोगों ने राम मंदिर के लिए चंदा नहीं दिया था उन्हें हिसाब-किताब नहीं मांगना चाहिए तो क्या जिन लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया उन्हें सत्ता की राजनीति से बाहर रहना चाहिए! बकवास की भी कोई हद होती होगी, यहां तो सब-कुछ बेहद के पार है! श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के इस्तीफे का निश्चित ही डोमिनो इफेक्ट होगा।

चंदा-चढ़ावा चोरी और भारी गबन के ‎आरोपों से घिरे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ‎महासचिव चंपत राय जैसे बड़े ‘वैचारिक और ‎सांस्कृतिक कद’ के व्यक्तित्व का इस्तीफा हो गया है। यह ‎इस्तीफा रणनीतिगत लग रहा है क्योंकि मामला चंपत ‎राय के इस्तीफे की हो तो इस्तीफा की रणनीतियां और भी ‎गहरे राजनीतिक मायने ले लेती हैं। सार्वजनिक जीवन ‎में इस्तीफा का रणनीतिक इस्तेमाल कवच के रूप में ‎किया जाना आम बात है। यह इस्तीफा भी रणनीतिक ‎रूप से राजनीतिक नुकसान के नियंत्रण से जुड़ा लगता ‎है।

क्योंकि इस्तीफा के पीछे की कहानी में नैतिकता का ‎कोई प्रसंग है ही नहीं, दबाव निश्चित रूप से असहनीय है। ‎चंपत राय राम मंदिर आंदोलन और विश्व हिंदू परिषद ‎का मजबूत चेहरा थे और अब चंदा-चढ़ावा चोरी  और गबन के बड़े आरोपियों के बीच एक छोटे आरोपी।

याद रखने की जरूरत है कि राम मंदिर आंदोलन किसी ‎एक मंदिर के निर्माण का साधारण धार्मिक आंदोलन ‎नहीं था। यह एक चतुर्दिक प्रतिशोधी आंदोलन था। यह ‎मंडल आयोग कि सिफारिशों को लागू किये जाने के ‎खिलाफ सामाजिक अन्याय की मांग की अनसुनी से ‎शुरू हुआ था। इस आंदोलन ने हिंदू-मुसलिम के बीच ‎सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया था। इस आंदोलन ने छद्म-‎धर्मनिरपेक्षता का हल्ला मचाकर छद्म-धार्मिकता की ‎मदद से भारत की संविधानसम्मत धर्मनिरपेक्षता को ‎तहस-नहस कर दिया। जनता के सभी प्रकार के निश्छल ‎सरोकारों — सभ्य और बेहतर नागरिक जीवन की ‎नैसर्गिक और सह-स्वाभाविक भावनाओं के सभी प्रसंगों ‎को इस प्रतिशोधी आंदोलन ने जनता की सर्वांगीण ‎चेतना को सभी प्रकार से नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।  ‎

फिर कहें, राम मंदिर का आंदोलन कोई साधारण आंदोलन नहीं था। आज इस के कुछ संदर्भों को याद किया जाना जरूरी है।

लालकृष्ण आडवाणी ने तथ्यात्मक रूप से गलत और अपनी राजनीतिक सुविधा ‎प्रपंची बात कही कि जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ‎विरोध किया था। जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में सरकारी ‎धन के इस्तेमाल का विरोध किया था, और यह विरोध तो महात्मा गांधी ने भी ‎किया था! यह विरोध निश्चित रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की सरकार के ‎प्रधानमंत्री और राष्ट्रपिता का सहज, स्वाभाविक और जेनुइन विरोध था।

‎लालकृष्ण आडवाणी का प्रपंची तर्क था कि 1950 में जो धर्मनिरपेक्षता स्वीकार्य ‎थी, वह 1990 तक आते-आते छद्म-धर्मनिरपेक्षता में बदल चुकी है। छद्म-‎धर्मनिरपेक्षता (Pseudo-Secularism) को समाप्त करते हुए क्या राम मंदिर ‎के निर्माण में सरकारी धन का इस्तेमाल कर पायी नरेंद्र मोदी की सरकार!

सच्चाई ‎यह है कि लालकृष्ण आडवाणी ने छद्म-धर्मनिरपेक्षता का राजनीतिक प्रपंच ‎रचकर सही धर्मनिरपेक्षता को छद्म-धार्मिकता से खंडित कर दिया! कहां तो ‎सरकारी धन से राम मंदिर बनाने को उद्धत दिखते थे, कहां तो राम मंदिर के धन ‎को सरकारी सहयोग से लूट लिया गया है।  ‎

गर्व से कहो हम हिन्दू हैं का विन्यास विवेकानंद का था। मूल रूप से यह आवाज ‎स्वामी विवेकानंद ने लगाई थी, 1893 के शिकागो व्याख्यान और उसके बाद ‎भारत लौटने पर दिए गए भाषणों में यह बात कही थी। उन्होंने गर्व से पहले अपने ‎को भारतीय कहने, प्रत्येक भारतीय को अपना भाई कहने के साथ हिंदू होने को ‎गर्व से कहने की बात कही थी।

समझ में आने लायक बात है कि स्वामी विवेकानंद ‎के गर्वबोध के इस विन्यास से लालकृष्ण आडवाणी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‎समग्र राजनीति का बुनियादी विरोध है। ‎महा-पुरुषों के मूल्यवान विन्यास को राजनीति के कुत्सित नारों में बदले जाने का यह क्लासिक ‎उदाहरण है। स्वामी विवेकानंद ने सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आत्म-बोध से सर्व-समावेशी ‎बात कही थी — सभी तरह के विरोधों पर काबू पाकर गौरवान्वित भारतीय बनने के लिए कही कि गर्व से कहो हम हिंदू हैं। 

स्वामी विवेकानंद का उद्देश्य हिंदुओं को किसी अन्य धर्म के खिलाफ ‎खड़ा करना नहीं था। जबकि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‎राजनीतिक मकसद हिंदू धर्म को आक्रामक, खासकर मुसलमानों के खिलाफ, ‎बनाना रहा है – हिंदू-मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण की राजनीति और रणनीति।  ‎

‎1980 के दशक के उत्तरार्ध में जब विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राजनीतिक ‎दलों ने इस विन्यास को “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” नारे के रूप में दीवारों पर ‎लिखवाया और रैलियों में गुंजाया, तो इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका था।

निस्संदेह ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ का मकसद सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ‎ध्रुवीकरण के अलावा कुछ नहीं था; छद्म-धर्मनिरपेक्षता (Pseudo-Secularism) और मुसलिम तुष्टिकरण की बातें इसी ध्रुवीकरण के दो पहिये थे। ‎

जाहिर है कि ध्रुवीकरण की राजनीति किसी भी तरह की हो उसमें हम बनाम वह ‎का अलगाववादी तर्क और तत्व तो रहता ही है। भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू होने को ‎आक्रामक पहचान (Assertive Identity) और भारतीय होने को दब्बू ‎पहचान (Timid Identity) में बदलने की कोशिशों की सारी हदें पार कर दी।

कांग्रेस पार्टी कमजोर पड़ गई ‎क्योंकि तब तक उच्च हिंदू और दलित पिछड़ा हिंदू आमने-सामने हो गये थे! ‎ध्रुवीकरण की राजनीति लगातार आवाज दे रही थी कि ‘हिंदू चुप नहीं बैठेगा, ‎वह अपने अधिकारों और मंदिरों के लिए लड़ेगा’ जाहिर है इस मामले में उच्च हिंदू ‎और दलित पिछड़ा हिंदू एक साथ हो गये। वैश्विक और घरेलू परिस्थिति वामपंथ ‎के अनुकूल नहीं रह गई थी। ‎अफसोस के साथ याद किया जाना जरूरी है कि राजीव गांधी का साथ छूट जाने की कितनी भारी कीमत भारत के लोकतंत्र को चुकानी पड़ गई।

बहरहाल, अटल विहारी बाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के साथ कई ‎राजनीतिक दलों ने मिलकर एनडीए बनाया। अटल विहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री ‎बने। शाइनिंग इंडिया को 2004 में श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ‎पार्टी ने सबसे बड़ी पार्टी के आसन से नीचे खींच लिया और डॉ मनमोहन सिंह के ‎प्रधानमंत्री बनने के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनी ‎और 10 साल तक चली! यूपीए के दस साल के शासन के बाद धूम-धड़ाके के साथ ‎नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गये। लालकृष्ण आडवाणी सहित राम मंदिर आंदोलन ‎के सारे ‘योद्धा’ या तो मार्गदर्शक मंडल में धकेल दिये गये या फिर उनके ‎साथ जो हुआ, वही जान पाये! ‎

प्रभु की प्रेरणा से प्रार्थना की मुद्रा में राम मंदिर निर्माण के आंदोलन का फैसला ‎‎‘सुप्रीम कोर्ट के द्वारा’ लिखा गया और न्यायाधीशों ने हस्ताक्षर किया — ‎पारंपरिक रूप से अपने शब्दों में फैसला लिखनेवाले न्यायाधीश का नाम दर्ज ‎रहता है, लेकिन इस फैसला में सर्वसम्मति (Unanimously) यह नहीं लिखा ‎गया।   ‎

कमजोर देश (Soft Nation) का जो ताना मारनेवाले सत्ता में आने के बाद ‎कितना और कैसा मजबूत राष्ट्र (Hard State) बनाया यह तो सर्वविदित है — एक्सिलेंसी ।  ‎

जो भी हो, छद्म-धार्मिकता की हथियाई जमीन पर संविधानसम्मत धर्मनिरपेक्ष शक्ति का ‎नियंत्रण हासिल करने के लिए, धर्मनिरपेक्षता की ‎खोई हुई जमीन को रिक्लेम (Reclaim) करने के लिए, राहुल गांधी के नेतृत्व में सभी प्रकार की जनशक्तियां और राजनीतिक शक्तियां अविलंब ‎पहल करे, जनता उम्मीद से गाफिल है। उम्मीद है, लिट्टी-पानी पर गुजर-बसर कर रही जनता के हाथ सिर्फ लोकतांत्रिक नाउम्मीदी ही नहीं आयेगी। कहीं कुछ गहरे पानी में हो रहा है।

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