नीतीश कुमार – एक राजनेता का राजनीतिक व मानसिक अंतर्द्वंद्व
समाजवाद और बिहार की जनता का जनसंघर्ष
डॉक्टर लोहिया ने जो सपना देखा था कि पिछड़े जब जागेंगे, तो उससे जो ऊर्जा निकलेगी उसके ज़रिए जाति व्यवस्था के जकड़न से समाज को मुक्त कर समता आधारित नये समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। वह नहीं हो रहा था, बल्कि ठीक उसके विपरीत हो रहा था।
राजनीति की शुरुआत तो मैंने समाजवादी युवजन सभा के कार्यकर्ता के रूप में किया। किशन पटनायक जी का प्रभाव मेरे ऊपर ज़्यादा रहा। उनके साथ बिहार घूमा। पढ़ाई-लिखाई तो मेरी तेरह-बाईस रही। लेकिन मेरा वैचारिक आधार किशन पटनायक को पढ़-सुनकर ही बना है।
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किशन जी के बाद कृष्णनाथ जी का प्रभाव भी मुझ पर रहा। चुनावी राजनीति मैंने लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ ही की। नीतीश कुमार मेरे ज़्यादा प्रिय रहे, क्योंकि मुझे लगता था कि वे लोहिया को पढ़कर, किशनजी को सुनकर वैचारिक आधार पर समाजवादी राजनीति कर रहे हैं।
दूसरी ओर लालू यादव समाजवादी विचारों और सिद्धांतों के प्रति उस तरह संवेदनशील नहीं थे, जितना कि नीतीश कुमार थे। उनकी राजनीति में व्यक्तिवाद ज़्यादा है। मंडल कमीशन और आडवाणीजी की गिरफ़्तारी के बाद लालू यादव का अहंकार सर पर चढ़ कर बोलने लगा था।
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2004 में नीतीश जी के नेतृत्व में समता पार्टी बनी। उस समय मैं बिहार नागरिक परिषद् का उपाध्यक्ष था। लालू यादव ने ही इस पद पर मुझे मनोनीत किया था। मंत्री का दर्जा प्राप्त था मुझे, सरकारी मकान, सरकारी वाहन, सरकारी वे सारी सुविधाएं जो मंत्री को मिलती हैं, वो मुझे प्राप्त थीं।
मेरे जीवन का वह काल ऐसा था, जब जिंदगी में पहली दफा हम रुपये-पैसे, खाने-पीने के मामले में थोड़ा निश्चिंत हुए थे। हालांकि मंडल अभियान और आडवाणी जी की गिरफ़्तारी के बाद लालू यादव को काफी ताकत मिली थी, लेकिन उस ताकत का उपयोग वे सामाजिक परिवर्तन के लिये नहीं कर सके।
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डॉक्टर लोहिया ने जो सपना देखा था कि पिछड़े जब जागेंगे, तो उससे जो ऊर्जा निकलेगी उसके ज़रिए जाति व्यवस्था के जकड़न से समाज को मुक्त कर समता आधारित नये समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। वह नहीं हो रहा था, बल्कि ठीक उसके विपरीत हो रहा था।
इसको चुनौती देने के लिए नीतीश कुमार को हम लोगों ने तैयार किया। काफी समय लगा। नीतीश कुमार में जोखिम लेने के साहस का हमेशा अभाव रहा। ललन सिंह उस संपूर्ण प्रकरण के गवाह रहे हैं। सरयू राय भी इससे वाकिफ रहे हैं।
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जब हम लोग लालू जी से अलग हुए, उस समय हम दिल्ली में थे। जिस दिन लालू यादव से अलग होने का हमारा एलान हुआ, उसी दिन पोलो रोड में जो सरकारी मकान मिला था, वह मेरी ग़ैर मौजूदगी में ही खाली करा दिया गया।
हमारा परिवार कहाँ गया, इसके विषय में हमको कोई जानकारी नहीं थी। जब लौटकर पटना आए तो पता लगा कि कुछ मित्रों और समर्थकों ने डाक्टर बी. भट्टाचार्य के मकान के पास किराए के दो कमरों के मकान में हमारे परिवार को पहुँचा दिया था।
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नीतीश कुमार उस समय लोक सभा के सदस्य थे। इसलिए जो परिवर्तन हुआ इससे उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। वे पार्लियामेंट के मेंबर थे, लेकिन चार बच्चों के मेरे परिवार का काम कैसे चलेगा, इसकी चिंता किसी ने नहीं की।
मैंने महसूस किया कि नीतीश ये मानते हैं कि बाकी लोग उनके लिए काम करें, लेकिन दूसरों के लिए भी उनका कोई कर्तव्य या दायित्व बनता है इसको वे नहीं मानते या जानते थे।
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नीतीश कुमार के चरित्र में ग़ज़ब का विरोधाभास दिखाई देता है। याद होगा जब मोदी जी के गुजरात शासन काल में गोधरा कांड हुआ था। नीतीश कुमार उन दिनों रेल मंत्री थे।
उन्हीं दिनों रेल मंत्री के रूप में वो एक रेल परियोजना के उद्घाटन के लिए गुजरात के कच्छ गए थे। वहाँ उनके साथ मंच पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। नीतीश जी ने उसी मंच से कहा था कि “नरेंद्र भाई केवल गुजरात के नेता नहीं हैं बल्कि देश के होनहार नेता हैं। जल्द ही इनकी सेवा देश को मिलने वाली है।” मोदी जी को राष्ट्रीय राजनीति में आने का उन्होंने न्योता दिया था।
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वही समय था जब भाजपा ने भी महसूस किया था कि पिछड़ी जाति के नेता को ही सामने रख कर वह देश की गद्दी पर आरूढ़ हो सकती है। नरेंद्र मोदी के पहले केशव भाई पटेल के नेतृत्व वाली भाजपा लगातार चुनाव हारने वाली भाजपा, गोधरा के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार चुनाव जीतने लगी।
मुसलमानों का भय दिखाकर लगातार गुजरात का चुनाव जिताने वाले नरेंद्र मोदी को जब भाजपा ने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करने की योजना बनाई तो नीतीश जी ऐसा भड़के जैसे लाल कपड़े से सांढ़ भड़कता है।
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उनका बीजेपी से परहेज नहीं था, उनका मानना था कि लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में सामने रखकर भारतीय जनता पार्टी अगर चुनाव लड़ती है तो हम उसके साथ रहेंगे। लेकिन नरेंद्र मोदी के नाम पर तो पूछिए मत।
हमको याद है, बहुतों को याद होगा कि 2013 में मैं राज्यसभा में था। नीतीश कुमार ने ही हमारे पास आकर प्रस्ताव रखा और मुझे राज्यसभा भेजा था। 2013 में राजगीर में पार्टी का शिविर हुआ था।
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उस समय तक स्पष्ट हो गया था कि नरेंद्र मोदी को ही सामने रख कर भाजपा 2014 के लोकसभा का चुनाव लड़ेगी। उस शिविर में मैंने नीतीश कुमार को चेताया था कि नरेंद्र मोदी को हल्का मत समझिए।
चाय बेचने वाला आदमी प्रधानमंत्री की कुर्सी का इतना सशक्त दावेदार बन गया है और वह भी पिछड़ी जाति का है। इसको आप हल्के नहीं ले सकते हैं। मेरी इसी बात पर नीतीश कुमार ने मुझे राज्यसभा के लिए दोबारा नामित तो नहीं ही किया, पार्टी से भी निकाल दिया।
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उसके बाद नीतीश कुमार की जो राजनीतिक यात्रा रही उसका भी स्मरण कर लीजिए। लालू यादव के साथ दो-दो बार आना जाना करना पड़ा। विधानसभा में ‘संघ मुक्त’ देश बनाने के संकल्प की घोषणा करना, इंडिया गठबंधन बनाने में उनकी देशव्यापी सक्रियता और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के हाथ में सत्ता सौंप देना !
सबसे अपमानजनक तो सार्वजनिक रूप से उनका नरेंद्र मोदी का पैर या घुटना छूना रहा। पता नहीं ललन सिंह या संजय झा जैसे लोग जो दिनरात उनको घेरे रहने वाले हैं, उनको कैसे यह अच्छा लगता है।
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ऐसे लोग जो नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर हित साध रहे हैं, उनको नीतीश जी की प्रतिष्ठा से क्या लेना देना है! लेकिन जिन लोगों ने नीतीश जी को ऊँचा उठाने में अपना कंधा लगाया है उनको तो रोना आता ही है।
जिस आदमी के जीवन में इतना अंतर्विरोध रहा है, वो दिमागी रूप से स्वस्थ कैसे रह सकता है ! ललन सिंह हों या संजय झा, नीतीश कुमार के कंधे पर सवार होकर कहां से कहाँ पहुँच गए। गली के आदमी नीतीश कुमार की कृपा से देश की नीति बनाने वालों में शामिल हो गए हैं। ऐसे में देश का तो भगवान ही मालिक है !!
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