जुग-जुग जीयें जज जामदार
प्रफुल्ल कोलख्यान

निराशा और हताशा के दौर में गहरा अंधेरा है। यह साधारण अंधेरा नहीं है। यह संवेदनशील जनतंत्र का कंटीला अंधेर है। इस अंधेर का नाभिनाल संबंध ‘न पक्ष, न विपक्ष सब समकक्ष’ जैसी भ्रामक शब्दावली से स्वयं-सिद्ध है। इस जनतंत्र के अंधेर से घनीभूत अंधकार के बीच राजनीतिक आसमान में घिरते बादल सामान्य रूप से दिखते नहीं हैं। दिखते हैं, बिजलत्ता के चमकने पर! इस अंधकार के बीच में मुंबई हाईकोर्ट से चमकी बिजलत्ता के साथ आई आवाज।
इस आवाज की अनुगूंज उन लोगों के कान तक अधिक सुनाई देगी जो जीवनयापन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने में निर्योग्य बनकर रह गये हैं। जी निर्योग्य का मतलब अपनी योग्यता के इस्तेमाल का अवसर न मिलने पर अयोग्य हो गये हैं — संसार का योग्यतम तैराक भी अपनी योग्यता का इस्तेमाल रेत में नहीं कर सकता है। पानी में तैरने की योग्यता रेत में निर्योग्य हो जाती है। योग्यता का अर्थ ही होता है जुड़ने के काबिल यानी नदी-नाव संयोग!
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सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (Social Democratic Party of India) एक पंजीकृत किंतु गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। इस राजनीतिक दल की राजनीतिक गतिविधियों से सहमति-असहमति अपनी जगह, लेकिन उस दल के राजनीतिक अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता है। एसडीपीआई के नेता सईद अहमद को पुलिस ने जिला बदर होने का फरमान जारी किया।
मामला मुंबई हाईकोर्ट में दर्ज हुआ। सईद अहमद पर आरोप था कि उन्होंने भाजपा और अमित शाह के खिलाफ मुर्दाबाद का नारा लगाया था। नारेबाजी करने के चलते एसडीपीआई के नेता सईद अहमद को एक साल के लिए जिला बदर करने के पुलिस के आदेश को जस्टिस माधव जे. जामदार ने पूरी तरह खारिज कर दिया।
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मुंबई पुलिस ने भाजपा और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ मुर्दाबाद का नारे लगाने और प्रदर्शन करनेवाले एसडीपीआई के नेता सईद अहमद को एक साल के लिए जिला बदर करने के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने पुलिस और सरकार के रवैये पर बेहद तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणियां की है; जैसे कि नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है! यह भी कि पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है।
जस्टिस जामदार की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह संविधान मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व की अवहेलना और अनदेखी से जुड़ा हुआ है। जस्टिस माधव जे. जामदार ने नागरिकों को सरकार के गुलाम बनाये जाने, समझे जाने की अफसरशाही प्रवृत्ति पर बहुत गहरी टिप्पणी की है। उन्होंने सवाल किया कि क्या हो रहा है यह? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है। वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते? लोग विरोध करें तो क्या उन पर मुकदमे लाद दिये जायेंगे? यह भी कहा कि विरोध करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
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राजनीतिक दबाव में आकर पुलिस द्वारा जिला बदर की पुलिसिया कार्रवाई पर मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जे. जामदार ने सावधान किया कि पुलिस सरकार की नौकर होती है। पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं होती है। पुलिस भी लोकसेवक (Public Servants) है। मंत्री छोड़िए संतरी के इशारा पर अफसरशाही संविधान और कानून दायरे से बाहर जाकर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने में जरा भी लिहाज नहीं करती है, कोई लोकलाज नहीं होता है! क्या गजब स्थिति है — देश को छप्पन इंचवाले नहीं चला रहे, छुटभैय्ये चला रहे हैं। अफसरशाही में संविधान और कानून के अनुशासन के दायरे से बाहर जाकर प्रवृत्ति बद्धमूल हो गई है।
जस्टिस माधव जे. जामदार ने ध्यान दिलाया कि नारे लगाना जिला बदर करने का आधार नहीं हो सकता। पुलिस ने दलील दी थी कि प्रदर्शनकारी ने भाजपा सरकार मुर्दाबाद और अमित शाह मुर्दाबाद का नारा लगाया था। जस्टिस माधव जे. जामदार ने पुलिस के इस दलील को वैध नहीं माना और ठीक ही कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल भाजपा सरकार मुर्दाबाद या अमित शाह मुर्दाबाद जैसे नारे लगाए हैं, सवाल किया कि नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? यह राजनीतिक अभिव्यक्ति है। सिर्फ सरकार के फैसलों का विरोध करने या नारे लगाने को तड़ीपार (जिला बदर) करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
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अपने फैसले में जस्टिस जामदार ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के हवाले से कहा कि नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, बल्कि सम्मान के साथ जीने का भी अधिकार है। सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने मात्र के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण (Mala fide) है और उसके मौलिक अधिकारों का सीधा हनन करती है।
मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जे. जामदार के इस फैसले को बहुत दिनों तक याद किया जाता रहेगा। असाधारण रूप से घने और चुभाऊ अंधकार के बीच यह फैसला साधारण नहीं है। यह फैसला जनतंत्र के घनीभूत अंधकार के बीच बिजलत्तों की चमक के साथ आई है।
इस ऐतिहासिक फैसला के लिए मुंबई हाईकोर्ट जस्टिस माधव जे. जामदार को याद किया जाता रहेगा — जुग-जुग जीयें जज जामदार!
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