June 19, 2026
#Citizen Charter #Opinion

युवाओं की बेचैनी को समझना होगा

                                                          

भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों की एक लंबी परंपरा रही है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1970 के दशक के छात्र आंदोलनों, मंडल आयोग आंदोलन, 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन और हाल के किसान आंदोलनों तक, समाज के विभिन्न वर्गों ने अपने अधिकारों, अवसरों और सरकार की नीतियों को लेकर को लेकर आवाज़ उठाई है। आज के दौर में युवाओं से जुड़े आंदोलन इसी परंपरा के विस्तार के रूप में देखे जा सकते हैं। हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आह्वान पर 6 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में दो हजार से अधिक युवा सड़कों पर उतरे। इस प्रदर्शन में आइसा और अन्य छात्र संगठन, लद्दाख के शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, सीपीआई एम एल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, अभिनेता प्रकाश राज किसान नेता वीरेन्द्र यादव और तमाम अन्य एक्टिविस्ट शामिल रहे। यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में पेपर लीक, बेरोजगारी और परीक्षा घोटालों के खिलाफ था। किसी भी आंदोलन की सफलता या असफलता का आकलन केवल उसके तात्कालिक राजनीतिक परिणामों से नहीं, बल्कि उससे पैदा हुई सामाजिक चेतना और दीर्घकालिक प्रभाव से भी किया जाना चाहिए। सीजेपी जैसे नए मंच इसी उभरती हुई चेतना का प्रतीक हैं, जो सोशल मीडिया की शक्ति को सड़क पर ले आ रहे हैं।

भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है। 15-29 वर्ष के आयु वर्ग में 36.7 करोड़ युवा हैं, जो कुल आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट आफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट और PLFS डेटा के अनुसार, इस जनसांख्यिकीय लाभ को सही दिशा न मिलने से यह एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। 2030 के बाद यह लाभ कम होना शुरू हो जाएगा। रोजगार की स्थिति बेहद चिंताजनक है। 15-25 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 40% के आसपास है, जबकि शिक्षित युवाओं (ग्रेजुएट्स) में स्थिति और बदतर है। CMIE और PLFS के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में 15-29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 15.2% तक पहुंच गई थी। केवल 7% युवा पुरुषों को ही स्थायी नौकरी मिल पाती है।

इन समस्याओं के साथ परीक्षा प्रणाली की धांधली युवाओं की निराशा को चरम पर पहुंचा रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती 2026 में 4000 से अधिक पदों पर धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं और युवाओं में आक्रोश फैला। इसी तरह NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद के बाद परीक्षा रद्द होने से 22.8 लाख छात्र प्रभावित हुए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना के बाद 10 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या कर ली। इनमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों के युवा शामिल हैं, जिन्होंने वर्षों की मेहनत को एक पल में व्यर्थ होते देखा। पिछले 10 वर्षों में 89 से अधिक बड़ी पेपर लीक घटनाएं दर्ज की गई हैं। CBI जांच चल रही है और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जोरों पर है। CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) पर भी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

अब सीजेपी के आन्दोलन की बात किया जाए तो आज का युवा केवल नौकरी की तलाश में नहीं है। वह पारदर्शिता, सम्मान, समान अवसर और न्याय की मांग कर रहा है। सीजेपी प्रदर्शन में शामिल युवाओं ने ‘शिक्षा मंत्री इस्तीफा दो’ जैसे नारे लगाए और कहा कि यह सिर्फ ट्रेलर है, अगर मांगें पूरी नहीं हुईं तो पूरे देश में बड़ा आंदोलन होगा। सीजेपी की संभावनाएं काफी उज्ज्वल दिख रही हैं। एक ऑनलाइन मीम और सोशल मीडिया कैंपेन से शुरू होकर यह ऑफलाइन जनांदोलन का रूप ले चुका है। सोनम वांगचुक, दीपांकर भट्टाचार्य, प्रकाश राज जैसे प्रमुख व्यक्तियों का समर्थन इसे व्यापक वैचारिक और सामाजिक आधार प्रदान कर रहा है। यदि सीजेपी दीर्घकालिक संस्थागत संरचना तैयार कर सके, राज्य स्तर पर इकाइयां बना सके, वैकल्पिक नीतिगत सुझाव दे सके और युवाओं को स्किल डेवलपमेंट, उद्यमिता तथा शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों से जोड़ सके, तो यह एक सशक्त युवा शक्ति के रूप में उभर सकता है।

हालांकि चुनौतियां भी हैं। शुरुआती जोश को निरंतरता प्रदान करना, विभिन्न विचारधाराओं वाले युवाओं को एक मंच पर रखना और प्रोपगैंडा के आरोपों से बचना महत्वपूर्ण होगा। कुछ युवा, खासकर मुस्लिम युवा, इस आंदोलन को बीजेपी का प्रोपगैंडा मान रहे हैं। ठीक है, मान लेते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन प्रायोजित है। लेकिन फिर सवाल यह है कि जब पेपर लीक से लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद हो रहा है, तब आप किसके प्रायोजन में घर पर बैठे हैं? अगर यह आंदोलन नकली है तो असली आंदोलन खड़ा कीजिए, सड़क पर आइए, गिरफ्तारी दीजिए, लाठी खाइए और युवाओं के लिए आवाज़ उठाइए। सिर्फ़ सोशल मीडिया पर बैठकर हर संघर्ष को ‘प्रायोजित’ बताना सबसे आसान काम है। सच्चाई यह है कि कुछ लोगों को हर आंदोलन में एजेंट दिखता है, लेकिन खुद संघर्ष करने की हिम्मत नहीं दिखती। युवाओं के मुद्दों पर लड़ने वालों से असहमति हो सकती है, लेकिन जो लोग खुद मैदान में नहीं हैं, उन्हें दूसरों के संघर्ष पर सवाल उठाने से पहले अपना योगदान भी बताना चाहिए।

युवा आंदोलनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तात्कालिक नाराजगी को सकारात्मक सामाजिक हस्तक्षेप में बदलने की है। सोशल मीडिया ने मुद्दों को राष्ट्रीय चर्चा में लाया है, लेकिन ग्रासरूट संगठन और वैचारिक स्पष्टता भी जरूरी है। शासन और व्यवस्था की जिम्मेदारी कम नहीं है। यदि युवाओं द्वारा उठाए गए प्रश्नों को केवल असंतोष मानकर टाल दिया जाएगा, तो समस्या और गहरी होगी। परीक्षा प्रणाली में डिजिटल सुरक्षा, पारदर्शी मूल्यांकन, भर्ती प्रक्रियाओं में तेजी और जवाबदेही सुनिश्चित करना अनिवार्य है। साथ ही स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसे कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाना होगा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह असहमति को जगह देता है और नई आवाजों को सुनता है। सीजेपी जैसे आंदोलन इस बात का सबूत हैं कि आज की युवा पीढ़ी चुप रहने वाली नहीं है। युवाओं की बेचैनी को समझना, उसके स्रोतों को दूर करना और समाधान खोजना वर्तमान भारत की सबसे बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है।

यह बहस किसी एक संगठन या मंच की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के भविष्य की है जो आने वाले भारत का निर्माण करेगी। यदि हम आज युवाओं की आवाज को गंभीरता से नहीं सुनेंगे, तो कल हम एक असंतुष्ट और अस्थिर समाज का सामना करेंगे। इसलिए संवाद, सुधार और सहभागिता का रास्ता अपनाना ही सही दिशा है।

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