सुप्रीमो कल्चर समाप्त हो और सुरक्षित रहे लोकतंत्र
नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हुए। उसके पहले 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन चुकी थी। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालने के तीन साल बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे और लगता है ममता बनर्जी के सत्ता गंवाने के तीन साल बाद या उसके पहले वे भी अपनी सत्ता गंवा देंगे।
प्रफुल्ल कोलख्यान

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे आते ही चुनावोत्तर हिंसा और तोड़-फोड़ का कोहराम मचा हुआ है। चुनाव में हर जगह हार-जीत के बाद ऐसी अशांति और अराजकता फैलने लगे, तोड़-फोड़ होने लगे तो फिर लोकतंत्र की जरूरत ही क्या है। आजकल ऐसी परिस्थिति बन गई है कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन पर विचार का हर प्रसंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शुरू होता है और उन्हीं पर जाकर समाप्त भी हो जाता है। यह स्वाभाविक भी है। हालांकि उदाहरण कई हैं लेकिन अपनी व्यापकता और गहराई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का अवसर अतुल्य है।
याद कर लेना जरूरी है कि ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनना और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन 2011 के दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हैं।
डॉ मनमोहन सिंह की सरकार की चूलें हिलाई जा रही थीं। हवा में ‘मैं भी अन्ना’, ‘मैं भी अन्ना’ की समां बंध गई थी। पारंपरिक राजनीति और स्थापित सत्ताओं को चुनौती देने का दौर शुरू हो चुका था।
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नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हुए। उसके पहले 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन चुकी थी। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालने के तीन साल बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे और लगता है ममता बनर्जी के सत्ता गंवाने के तीन साल बाद या उसके पहले वे भी अपनी सत्ता गंवा देंगे।
2011 से 2026 को भारत के लोकतंत्र के इतिहास में खास तौर पर याद किया जायेगा। यानी ‘मैं भी अन्ना’ के दौर से लेकर कॉकरोच जनता पार्टी की हुंकार तक।
सच पूछा जाये तो 2011 से लेकर 2014 के बीच की लोकतांत्रिक परिस्थिति और अभिव्यक्ति की आजादी की स्थिति पर खास तौर पर ध्यान दिया जाना कोई कम जरूरी नहीं है — यानी उस समय जब ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री थी लेकिन नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे।
ममता बनर्जी की जोरदार पहल पर साल 2012 में तृणमूल कांग्रेस के नेता मुकुल रॉय को दिनेश त्रिवेदी की जगह देश का नया रेल मंत्री बनाया गया था। इस राजनीतिक घटनाक्रम पर इंटरनेट पर एक व्यंग्यात्मक कार्टून वायरल हो रहा था। यह कार्टून सत्यजीत रे की प्रसिद्ध फिल्म ‘सोने का किला’ (Sonar Kella) के एक दृश्य पर आधारित था, जिसमें फिल्म के एक पात्र ‘मुकुल’ का जिक्र था।
जादवपुर यूनिवर्सिटी रसायन संकाय के प्रोफेसर थे अंबिकेश महापात्र (Ambikesh Mahapatra)। एक कार्टून में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मुकुल रॉय को दिखाया गया था। हालांकि अंबिकेश महापात्र ने इस कार्टून को खुद नहीं बनाया था, लेकिन उन्होंने उस कार्टून को अपनी हाउसिंग सोसाइटी के एक ईमेल ग्रुप पर कुछ करीबियों और दोस्तों के साथ फॉरवर्ड (शेयर) किया था। भारत में 2012 में वाट्सअप का चलन शुरू नहीं हुआ था। जैसे ही यह ईमेल सोसाइटी ग्रुप में भेजा गया, कुछ स्थानीय टीएमसी समर्थकों ने इसका विरोध किया।
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पहले तो प्रोफ़ेसर महापात्र के साथ उनकी सोसाइटी के अंदर ही मारपीट और धक्का-मुक्की की गई। इसके बाद 12 अप्रैल 2012 की रात को पुलिस ने उन्हें और उनके एक बुजुर्ग पड़ोसी सुब्रत सेनगुप्ता को गिरफ्तार कर लिया।
उन पर तत्कालीन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की विवादास्पद धारा 66A और आईपीसी की अन्य धाराएं लगाई गईं। उन्हें रात भर हाजत में रहना पड़ा, जिसके बाद उन्हें जमानत मिली।
इस पूरी घटना पर मुख्यमंत्री, ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया भी कोई कम महत्वपूर्ण और चौंकाऊ नहीं थी।
इस घटना के बाद, देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज ने इसकी कड़ी निंदा की थी। लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मानवतावादी मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी की आवाजों की अनसुनी करते हुए इस कार्टून को चरित्र हनन (Character Assassination) और एक साजिश करार दिया था।
11 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अंबिकेश महापात्र को अदालत से पूरी तरह से रिहाई मिली। रिहाई तो मिल गई लेकिन जादवपुर यूनिवर्सिटी जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर की जिंदगी में 11 साल में क्या-क्या हुआ और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकार की कीमत के संकेत नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत पहले ही मिल गया था। अधिक बार कोर्ट के चक्कर काटने के बाद, जनवरी 2023 में कोलकाता की अलीपुर जिला अदालत ने प्रोफ़ेसर अंबिकेश महापात्र को इस केस से पूरी तरह बरी (Discharged) कर दिया।
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पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद जो हो रहा है वह बहुत ही दुखद है। आज की इन राजनीतिक परिस्थितियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान की स्थितियों पर नजर डालने के पहले अंबिकेश महापात्र (Ambikesh Mahapatra) मामला, 2012, को याद करने का तात्पर्य बस इतना भर है कि ममता बनर्जी के शासन काल के शुरुआती दिनों, खास तौर पर नरेंद्र मोदी के शासनकाल की शुरुआत के पहले की राजनीतिक परिस्थितियों और लोकतांत्रिक स्थितियों की भी झलक देख ली जाए।
वामपंथ की राजनीति ने जब कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया तो तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस पार्टी का हाथ थाम लिया। राजनीतिक नतीजा क्या हुआ! पहला नतीजा — 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन समाप्त हो गया और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई। दूसरा नतीजा — 2014 के चुनाव में डॉ मनमोहन सिंह की सरकार चली गई और नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई। 2014 में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हो गई और 2016 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पश्चिम बंगाल राज्य की राजनीति में अप्रासंगिक हो गई।
वामपंथ से कांग्रेस का हाथ छूटना और तृणमूल का साथ होना कांग्रेस और वामपंथ के लिए राजनीतिक रूप से बहुत घातक साबित हुआ। कांग्रेसी और वामपंथी राजनीति का भारत की राजनीति में अप्रासंगिक होना भारत के लोकतंत्र के लिए बहुत घातक साबित हुआ।
अब 2026 की हार के बाद बंगाल और दिल्ली दोनों जगह तृणमूल की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। पिछले हफ्ते पार्टी के 80 विधायकों में से अधिकांश ने तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी की अवहेलना करते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष नेता चुन लिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उनकी संख्या 55-60 है। तृणमूल कांग्रेस के बाद ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के लिए पश्चिम बंगाल की धरती पर अपनी जगह पर पांव टिकाना भी बहुत मुश्किल बना दिया गया है।
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कोलकाता दिल्ली का द्वंद्व
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की नजर तृणमूल विधायकों पर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले भारतीय जनता पार्टी के नेतागण तृणमूल विधायकों को साथ लेने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को पहले से दो-तिहाई बहुमत हासिल है।
तृणमूल विधायक को अपने साथ लेने का मतलब उन्हें कानूनी संरक्षण देना, जबकि वे तृणमूल विधायकों पर अधिक-से-अधिक कानूनी कार्रवाइयों के पक्ष में हैं; इस मामले में वे अपने शासन की नजीर पेश करना चाहते हैं। तृणमूल विधायकों पर उनकी खास नजर है कि वे किसी भी तरह से तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी की राजनीतिक बाड़ेबंदी (फोल्ड) की तरफ मुड़कर देखने का साहस भी न कर सकें — बस इतना ही। इससे अधिक! बिल्कुल नहीं।
ऐसा क्यों?
ऐसा क्यों? क्योंकि 2020 में तृणमूल से विद्रोह कर के निकले तृणमूल के बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी 2021 के चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गये — और आज पश्चिम बंगाल के माननीय मुख्यमंत्री हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतागण और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित स्वयं-सेवक अपनी आंतरिक हताशा से पीड़ित तो होंगे ही!
शुभेंदु अधिकारी जो पहले ही राजनीतिक रूप से भारतीय जनता पार्टी के राज्य के नेताओं के लिए बेकाबू हैं, तृणमूल विधायकों का साथ पाकर और भी ताकतवर और बेकाबू हो जायेंगे। 2029 में यदि केंद्र सरकार हाथ से निकल गई फिर तो कहना ही क्या!
चुनावोत्तर कार्रवाई में पश्चिम बंगाल राज्य प्रशासन और केंद्रीय एजेंसियां तत्परतापूर्वक अपनी कार्रवाइयों में लगी हैं। हां कहा जा सकता है कि बात कानूनी है। कानूनी बातों में अब कानूनी तत्व कम और प्रतिशोध का आपराधिक तत्व अधिक होता है — तो फिर तोड़-फोड़ का दौर साथ-साथ जारी है।
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चुनावी माध्यम से हासिल सत्ता के जनसरोकारहीन हो जाने के बाद सत्ता परिवर्तन की महत्वाकांक्षाओं के टकरावों के मलवा के नीचे दबकर राजनीतिक दलों के साथ-साथ जनता के हितों का सत्यानाश होना; लोकतंत्र का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना आम बात है।
उधर दिल्ली की कथा में कई दिलचस्प मोड़ हैं। दिल्ली तृणमूल की वरिष्ठ नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार तृणमूल के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने राज्य के ‘विकास’ के लिए भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होने का फैसला किया है। जबकि ‘तृणमूल सुप्रीमो’ ममता बनर्जी लोकसभा के 28 और राज्यसभा के 13 सांसदों के साथ इंडिया गठबंधन में हैं।
ममता बनर्जी के लिए इस समय न सिर्फ इंडिया गठबंधन में मजबूती के साथ बने रहने की जरूरत है बल्कि कांग्रेस में उनकी घरवापसी भी जरूरी है। व्यावहारिक और अव्यावहारिक पहलू पर सोचने के लिए वक्त बहुत कम है और घरवापसी जरूरी है!
घरवापसी! जैसे साधारण घर-संसारी नागरिक लोग दशकों बाद कोविड 2019 से बचाव में अपनी घरवापसी की थी — राजनीति 2026 से लोकतंत्र के बचाव के लिए राजनीतिक लोगों की घरवापसी जरूरी है।
2017 में मुकुल राय, 2020 में शुभेंदु अधिकारी का तृणमूल कांग्रेस के साथ संबंधों के उतार-चढ़ाव, कल्याण बनर्जी की 2022 और 2026 की चीखपुकार को भी समझना जरूरी है। तृणमूल के भीतर इस विद्रोह के प्रमुख चेहरों ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को अपना निशाना बनाया है, जो ममता बनर्जी के भतीजे हैं।
संतति और समर्थक में भेदभाव का राजनीतिक षड़यंत्र राजनीतिक दलों में सांगठनिक स्तर पर महत्वाकांक्षाओं के विस्फोट का कारण बन जाता है। विस्फोटक महत्वाकांक्षाओं से होनेवाली सांगठनिक क्षति को बचाना बहुत मुश्किल होता है। विस्फोट कहने का आशय सिर्फ एक ऐसी स्थिति-परिस्थिति की ओर इशारा करना है जहां तर्क-वितर्क और नीति-नैतिकता आदि के सारे प्रसंग अपनी जगह खो देते हैं।
वंशवाद और परिवारवाद!
जब वंशवाद, परिवारवाद, संतति और समर्थक आदि की बात की जाये तो पूरी ईमानदारी से राहुल गांधी की राजनीतिक स्थिति की भी गहन जांच-पड़ताल किये जाने की जरूरत है। इस गहन जांच-पड़ताल में दो प्रमुख कारणों से जांच-पड़ताल में अत्यधिक ईमानदारी जरूरी है। एक बड़ा कारण तो यह है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी — पूरे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में, लगभग अकेले — मजबूती से भारत के लोकतंत्र के सक्रिय तारणहार की भूमिका में नजर आते हैं। दूसरा कारण, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। राहुल गांधी सबसे पुराने राजनीतिक परिवार से आते हैं। प्रसंगवश अभी बार-बार केन्द्रीय मंत्री और बंगाल के प्रभारी भूपेंद्र यादव की रिहाइश और तृणमूल के तोड़-फोड़ के संदर्भ में मोतीलाल नेहरू मार्ग का उल्लेख हो रहा है। कहना जरूरी है कि राहुल गांधी इन्हीं मोतीलाल नेहरू के परिवार की पांचवीं-छठी पीढ़ी के सदस्य हैं!
जाहिर है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर लगनेवाले वंशवाद या परिवारवाद के आरोपों की जांच-पड़ताल काफी गहराई से की जानी चाहिए।
यह सुनें
यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि राहुल गांधी मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी की श्रृंखला में से आते हैं। यह ठीक है कि राहुल गांधी को पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते अवसर मिला। राहुल गांधी को अवसर मिलने में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है।
यह ठीक है कि पारिवारिक कारणों से उन्हें अवसर मिला। लेकिन अवसर का इस्तेमाल तो खुद ही किया न! ऐसे उदाहरण तो सभी राजनीतिक दलों में भरे पड़े हैं! भारतीय जनता पार्टी अपनी तरफ से पूरी ताकत लगाकर कांग्रेस और प्रांतीय दलों पर आरोप लगाती है, लेकिन खुद भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों और समर्थकों में उदाहरणों की कमी नहीं है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि के प्रभाव, कम-से-कम भारतीय लोगों के जीवन के सभी स्तरों पर दिख जाते हैं। दुहराकर कहना जरूरी है कि भले ही किसी को पारिवारिक कारणों से राजनीति में अवसर मिला हो लेकिन महत्वपूर्ण है यह देखना कि इस अवसर का राजनीतिक इस्तेमाल उसने जनसरोकार के पक्ष में किया या फिर मिले अवसर का इस्तेमाल अपने जनसरोकारीन गैर-राजनीतिक प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए किया।
इस दृष्टि से राहुल गांधी की राजनीतिक पहलकदमियों का गहराई और ईमानदारी से विश्लेषण करने पर यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि राहुल गांधी की राजनीति को परिवारवाद और वंशवाद से जोड़कर देखना न सिर्फ राहुल गांधी पर तर्कहीन अत्याचार है बल्कि भारत की राजनीतिक परंपराओं के लोकतांत्रिक प्रसंगों पर भी अत्याचार है। प्रसंगवश, राहुल गांधी की इतनी लंबी पारिवारिक श्रृंखला और भारत के प्रति उस श्रृंखला को कहीं अधिक गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर यह कि सभी राजनीतिक दलों के लिए यह एक अवसर है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लोकतंत्र पर प्रहार बनाये जाने के खिलाफ खड़े होने लिए तैयार होना चाहिए। एक अस्वाभाविक राजनीतिक समय में घरवापसी का अस्वाभाविक फैसला जरूरी है। लोकतंत्र में सुप्रीमो कल्चर समाप्त हो और बची रहे आजादी! नहीं क्या?
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