June 19, 2026
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नीलकंठ राहुल गांधी को कान पाथकर सुनो इंडिया

एक राष्ट्र के रूप में भारत उस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच में फंसा दिया गया है या अपनेआप फंस गया! क्या पता! लेकिन नागपाश से बाहर निकलने के लिए हिम्मत जुटाना जरूरी है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को उतारने की योग्यता हो, तो हिम्मत जुटे! भारत के लोकतंत्र की सेहत के लिए जरूरी है राजनीति के सिर से महत्वाकांक्षाओं के बोझ को उतार फेंकना!  महत्वाकांक्षाओं से लदी राजनीति को स्वयंसेवकों की गिरफ्त  से निकालकर सेहतमंद लोकतंत्र को हासिल करना बहुत मुश्किल है।

विचारधारा की पकड़ ढीली पड़ते ही मन में ज्ञात-अज्ञात कारणों से डर पंख फैलाने लगता है। विचारधारा की पकड़ ढीली पड़ते ही‎ महत्वाकांक्षाएं मन की सवारी शुरू कर देती है। मन में जमे डर और महत्वाकांक्षाओं की पकड़ से मुकाबला विचारधारा के सहारे ही किया जा सकता है। जाहिर है कि राहुल गांधी ने ‘डरो मत’ का जयघोष करने के पहले विचारधारा को कस के थाम लिया। राहुल गांधी की विचारधारा का एक मतलब संविधान भी है। संविधान हाथ में हो तो ज्ञानी-अज्ञानी सभी लोकतंत्र की राह पर आ जाते हैं। संविधान हाथ में हो तो महत्वाकांक्षाएं थोड़ा दूर-दूर ही रहती है। संविधान हाथ में हो तो डर मन के आंगन में झांकने तक नहीं आता है।  

विचारधारा का अटूट साथ संघर्ष में प्राण तक न्यौछावर करने का साहस भर देता है। प्राण तक न्यौछावर करने के साहस के सामने क्या तो डर और कैसी तो महत्वाकांक्षा! यह राजनीतिक साहस दिखता है जब राहुल गांधी कहते हैं — मैं डरने वाला नहीं हूँ। वे मुझे डराने की कोशिश कर सकते हैं, मेरा सिर भी काट दें, तो भी मैं अपनी विचारधारा से पीछे नहीं हटूंगा। क्योंकि मैं जो लड़ाई लड़ रहा हूं, वह मेरी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है; यह इस देश के करोड़ों लोगों के अधिकारों, संविधान और सच्चाई की लड़ाई है। वे मुझे जेल भेज सकते हैं, मुझ पर हमले कर सकते हैं, मेरी सदस्यता रद्द कर सकते हैं, लेकिन वे मेरी आवाज और मेरी सोच को कभी नहीं दबा सकते। मैं सत्य के रास्ते पर चलने के लिए पूरी तरह तैयार हूं, चाहे उसके लिए कितनी भी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

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राहुल गांधी ने अपनी विचारधारा और राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में जो बातें कही, उसका सार यही है कि वे किसी भी स्थिति-परिस्थिति में संविधान सम्मत विचारधारा से समझौता नहीं कर सकते हैं। चुनावी जीत-हार के लिए नहीं, संविधान की रक्षा, आम लोगों, नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल रखने की लड़ाई में राहुल गांधी ‎ कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं।  

इस तरह की प्राण तक न्यौछावर करने का संदर्भ राहुल गांधी के भाषणों में तब आता है जब वे वैचारिक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जूझ रहे होते हैं।

राहुल गांधी भारतीय जनता पार्टी की ताकत को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़ाव में देखते हैं। वैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास विचारधारा नहीं, भावधारा प्रमुख है। यह बात अलग है कि अपनी भावधारा को विचारधारा मनवा लेने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कामयाब रही है। विचारधारा और भावधारा की बनावट और बुनावट को समझना जरूरी है — दोनों में ‘कहियत भिन्न, न-भिन्न’ जैसा संबंध होता है। राहुल गांधी इस बात को जानते हैं। इसलिए राहुल गांधी हवाला तो कांग्रेस की विचारधारा का देते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भावधारा का मुकाबला विचारधारा से निकली भावधारा से करते हुए दिखाई देते हैं।  यह भावना अक्सर उनके उन भाषणों में झलकती है, जहाँ वे खुद को भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भावधारा के खिलाफ एक मुखर आलोचक के रूप में पेश करते हैं।

राहुल गांधी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता में गांधीवादी और समावेशी विचारधारा को अपना आधार मानते हैं और उस पर कायम रहने की बात करते हैं। विचारधारा के मूल स्रोत संविधान को हाथ में रखकर लोगों को यह संदेश देते हैं कि राजनीतिक दबाव या नाजायज कानूनी कार्रवाइयों से उन्हें नहीं डिगाया जा सकता है। उनको जाननेवाले लोगों का मानना है कि वे डिगने वाले लोगों में से नहीं हैं।

सत्ता के खिलाफ सत्य की लड़ाई हमेशा कठिन होती है। सत्ता के खिलाफ सत्य की लड़ाई की सबसे बड़ी ताकत का स्रोत नैतिकता में होती है। हमारे समय के महत्वाकांक्षा पीड़ित राजनीतिक लोगों में आपराधिक साहस की कोई कमी नहीं होती है, जबकि अपराधमुक्त राजनीतिक साहस के होने का कोई प्रसंग ही नहीं बनता है। उस देश में लोकतंत्र का हाल क्या हो सकता है जिस देश की लोकतांत्रिक राजनीति आपराधिक कवच के बिना जनजीवन की तपती जमीन पर पांव धर भी नहीं पाती है — पांव टिकाने की बात को तो रहने ही दिया जाये।

नीलकंठ राहुल गांधी के इस भाषण को सुनते ही आजाद भारत के दो प्रसंगों की याद आना स्वाभाविक है। इंदिरा गांधी ने अपने खून के अंतिम बूंद को देश के लिए कुर्बान करने की बात, अपनी शहादत के ठीक पहले उड़ीसा में कही थी।

इंदिरा गांधी के इस भाषण को भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे भावुक और प्रभावशाली क्षणों में गिना जाता है। 30 अक्टूबर 1984 को ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी ने यह ऐतिहासिक भाषण किया था। संयोग यह कि शहादत से एक दिन पहले के इस भाषण में देश के प्रति अटूट निष्ठा और बलिदान की भावना को महसूस किया जा सकता है। शब्दों को याद किया जाये — मैं आज यहाँ हूँ, कल शायद यहाँ न रहूँ। मुझे चिंता नहीं है कि मैं रहूँ या न रहूँ। मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी अंतिम सांस तक ऐसा करना जारी रखूंगी और जब मैं मरूंगी, तो मुझे पता है कि मेरे खून की हर एक बूंद भारत को मजबूत बनाने में योगदान देगी।

नीलकंठी परिवार के विरासतदार राहुल गांधी भी नीलकंठ हैं! सुनो इंडिया, सुनो। “इंडिया सुनो” कान पाथकर सुनो नीलकंठ राहुल गांधी को सुनो।

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