July 30, 2026
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कांग्रेस नेता गुरदीप सप्पल ने सोनम वांगचुक को आइना दिखाया

नई दिल्ली: पर्यावरण कार्यकर्ता और लद्दाख के सामाजिक नेता सोनम वांगचुक का आमरण अनशन देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। उनके समर्थन में कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने आवाज़ उठाई है। अब उनके समर्थकों की ओर से विपक्षी नेताओं, विशेषकर राहुल गांधी, से भी आंदोलन के समर्थन में आने की अपील की जा रही है। इसी बीच कांग्रेस नेता, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक गुरदीप सप्पल ने सोशल मीडिया मंच ‘X’ पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखते हुए गांधीवादी आंदोलनों, अनशन और राजनीतिक संघर्ष की प्रकृति पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है।

सप्पल का मूल तर्क यह है कि सोनम वांगचुक के आंदोलन की विफलता या सरकार की उदासीनता को गांधीवादी तरीकों की असफलता नहीं माना जाना चाहिए। उनके अनुसार समस्या गांधी के विचारों में नहीं, बल्कि गांधी के औजारों के चयन और उनके प्रयोग की समझ में है।

गांधी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कभी अनशन नहीं किया

सप्पल इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाते हैं कि महात्मा गांधी ने अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण अनशन किए, लेकिन उनमें से एक भी ब्रिटिश सरकार को झुकाने के उद्देश्य से नहीं था। गांधी का अनशन हमेशा अपने समाज, अपने सहयोगियों या अपने नैतिक समुदाय को संबोधित करता था।

1918 के अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन में उन्होंने डगमगाते मजदूरों का मनोबल बढ़ाने के लिए अनशन किया। 1932 के पूना पैक्ट के दौरान उनका अनशन डॉ. भीमराव आंबेडकर और सवर्ण हिंदू समाज के बीच सहमति बनाने के लिए था। 1947 में कलकत्ता के सांप्रदायिक दंगों के दौरान उन्होंने अपनी ही जनता की अंतरात्मा को झकझोरने के लिए उपवास रखा।

सप्पल का कहना है कि गांधी अच्छी तरह जानते थे कि नैतिक दबाव केवल उसी पर काम करता है, जो स्वयं को नैतिक रूप से आपके प्रति उत्तरदायी मानता हो। इसलिए किसी ऐसी सत्ता के विरुद्ध, जो आपकी पीड़ा के प्रति संवेदनशील ही न हो, अनशन प्रभावी हथियार नहीं बन सकता।

सरकार की बेरुख़ी गांधीवाद की हार नहीं

लेख के अनुसार वर्तमान परिस्थिति में यदि केंद्र सरकार सोनम वांगचुक के अनशन से अप्रभावित दिखाई देती है, तो इसे गांधीवाद की पराजय नहीं कहा जा सकता। यह उस रणनीति की सीमा है, जिसमें एक ऐसे हथियार का प्रयोग किया जा रहा है जो इस प्रकार की सत्ता संरचना पर अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल सकता।

सप्पल के अनुसार गांधी का वास्तविक राजनीतिक हथियार सत्याग्रह, असहयोग और जन-भागीदारी था। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, कर न देना, प्रशासनिक सहयोग से इनकार करना और जनता को व्यापक स्तर पर संगठित करना—यही वे तरीके थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती दी।

गांधीवाद केवल अनशन नहीं, बल्कि व्यापक जनसंघर्ष की पद्धति

सप्पल इस धारणा का भी खंडन करते हैं कि गांधीवाद का अर्थ केवल भूख हड़ताल है। उनके अनुसार गांधी की पूरी राजनीति तीन स्तंभों पर आधारित थी—सत्याग्रह, असहयोग और अहिंसा।

अहिंसा उनके लिए केवल नैतिक आदर्श नहीं थी, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति भी थी। निहत्थे लोगों पर होने वाला दमन शासक की नैतिक वैधता को कमजोर करता था और जनता का समर्थन आंदोलन के पक्ष में खड़ा करता था।

गांधी बनाम हिटलर की बहस को बताया सतही

हाल के वर्षों में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि गांधी की पद्धति हिटलर जैसी तानाशाही के सामने विफल हो जाती। सप्पल इसे गांधी की विचारधारा की गलत व्याख्या बताते हैं।

उनके अनुसार स्वयं गांधी ने कभी यह दावा नहीं किया कि हर प्रकार की सत्ता के विरुद्ध एक ही तरीका कारगर होगा। गांधी की रणनीति परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक औजार चुनने पर आधारित थी। इसलिए गांधी को केवल अनशन तक सीमित कर देना उनके विचारों का सरलीकरण है।

‘सेफ्टी वाल्व’ सिद्धांत का भी किया खंडन

सप्पल ने उस पुराने तर्क को भी चुनौती दी कि अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को कमजोर करने के लिए गांधी को आगे बढ़ाया था। वे जतिन दास की शहादत और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुए व्यापक दमन का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यदि ब्रिटिश शासन गांधीवादी आंदोलनों को केवल ‘सेफ्टी वाल्व’ मानता, तो लाखों गिरफ्तारियां, हजारों मौतें और व्यापक दमन नहीं होता।

वे याद दिलाते हैं कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्राण न्योछावर किए और लाखों लोग जेल गए। इसलिए यह कहना कि केवल क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया और गांधीवादी आंदोलन सुरक्षित थे, इतिहास के साथ अन्याय होगा।

पारदर्शिता और राजनीतिक स्पष्टता भी गांधीवाद की शर्त

सप्पल का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि गांधी के प्रत्येक आंदोलन में उद्देश्य, रणनीति और अगला कदम पूरी तरह सार्वजनिक होता था। वे पहले से घोषणा करते थे कि कौन-सा कानून तोड़ेंगे और क्यों।

उनके अनुसार किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति उसकी पारदर्शिता से आती है। यदि आंदोलन स्वयं को ‘गैर-राजनीतिक’ बताता है, लेकिन बाद में राजनीतिक दलों से समर्थन की अपील करता है, तो इससे उसकी वैचारिक स्पष्टता पर प्रश्न उठते हैं।

राजनीति से दूरी नहीं, लोकतांत्रिक भागीदारी थी गांधी की सोच

सप्पल का मानना है कि गांधी कभी राजनीति से दूरी बनाने के पक्षधर नहीं थे। वे लोकतांत्रिक भागीदारी, जनसंगठन और सार्वजनिक राजनीतिक संवाद को परिवर्तन का आवश्यक माध्यम मानते थे। इसलिए किसी आंदोलन का राजनीति से पूरी तरह अलग होने का दावा, गांधीवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

बहस को इतिहास की रोशनी में देखने की जरूरत

सोनम वांगचुक के आंदोलन को लेकर देश में अलग-अलग मत हैं। लेकिन गुरदीप सप्पल का लेख इस बहस को एक व्यापक ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ देता है। उनका कहना है कि किसी आंदोलन की सफलता या असफलता का आकलन करते समय गांधी के विचारों को केवल अनशन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।

उनके अनुसार गांधी का सबसे बड़ा संदेश यह था कि संघर्ष का हर औजार अपनी परिस्थिति, उद्देश्य और लक्ष्य के अनुरूप चुना जाना चाहिए। केवल गांधी का नाम लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक रणनीति, नैतिक अनुशासन और जनसंगठन की पद्धति को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।

इसी संदर्भ में सप्पल का निष्कर्ष है कि वर्तमान बहस गांधीवाद की असफलता की नहीं, बल्कि गांधीवादी औजारों की सही समझ और उनके उचित प्रयोग की है। यही प्रश्न आज के आंदोलनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है।

पढ़ें गुरदीप सिंह सप्पल के X हैंडल पर लिखा गया पूरा लेख-