आंदोलन की ताक़त या राजनीति का सहारा? सोनम वांगचुक को फैसला करना होगा
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल मांगों का नहीं, बल्कि अपनी रणनीति और विश्वसनीयता का भी इम्तिहान दे रहा है। हर गुजरते दिन के साथ वांगचुक का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है, सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ रहा है और आंदोलन के सामने यह सवाल और बड़ा होता जा रहा है कि आगे का रास्ता क्या होगा।
सरकार की चुप्पी इस आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती है। यह पहली बार नहीं है कि किसी सरकार ने अनशन को समय के भरोसे छोड़ देने की रणनीति अपनाई हो। सत्ता अक्सर मानकर चलती है कि समय के साथ आंदोलन की ऊर्जा क्षीण हो जाएगी। ऐसे में केवल नैतिक अपील के सहारे सरकार को झुकाने की उम्मीद करना यथार्थवादी नहीं कहा जा सकता।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल आंदोलन की बदलती रणनीति को लेकर है।
जब यह आंदोलन शुरू हुआ था, तब आयोजकों ने बार-बार कहा कि यह पूरी तरह गैर-राजनीतिक आंदोलन है। विपक्षी दलों से दूरी बनाए रखने की बात कही गई। राजनीतिक नेताओं से मंच पर न आने का अनुरोध किया गया। यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत भी थी। छात्रों, अभिभावकों और आम नागरिकों ने इसे किसी पार्टी का नहीं, बल्कि शिक्षा और लोकतंत्र के सवाल पर खड़ा एक नागरिक आंदोलन माना।
अब तस्वीर बदलती दिख रही है।
सरकार से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिलने के बाद विपक्षी नेताओं से संपर्क साधा जा रहा है। उन्हें जंतर-मंतर आने का निमंत्रण दिया जा रहा है। यह बदलाव स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन इससे उस मूल दावे पर प्रश्न भी खड़े होते हैं कि आंदोलन राजनीति से पूरी तरह दूर रहेगा।
लोकतंत्र में कोई भी बड़ा जनांदोलन राजनीतिक समर्थन के बिना बहुत दूर नहीं जाता। यह एक कड़वा लेकिन स्थापित सत्य है। संसद में आवाज़ उठाने से लेकर सरकार पर संस्थागत दबाव बनाने तक, राजनीतिक दलों की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। इसलिए विपक्ष का नैतिक और संसदीय समर्थन लेना कोई अपराध नहीं है।
लेकिन आंदोलन और राजनीतिक दलों के बीच एक महीन रेखा होती है। यदि वह रेखा मिट जाती है, तो आंदोलन का चरित्र बदल जाता है।
यही कारण है कि राहुल गांधी की संभावित मौजूदगी इस आंदोलन के लिए अवसर से अधिक जोखिम बन सकती है। राहुल गांधी यदि जंतर-मंतर पहुंचते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी को किसी अतिरिक्त तर्क की आवश्यकता नहीं होगी। वह तत्काल पूरे आंदोलन को कांग्रेस प्रायोजित बताना शुरू कर देगी। फिर बहस शिक्षा, जवाबदेही या मंत्री के इस्तीफे की नहीं, बल्कि कांग्रेस बनाम भाजपा की रह जाएगी।
राजनीति में धारणा अक्सर सच्चाई पर भारी पड़ती है।
इससे भी बड़ी चिंता उन हजारों छात्रों और उनके अभिभावकों की है, जो इस विश्वास के साथ आंदोलन से जुड़े कि यह किसी दल का मंच नहीं है। यदि आंदोलन खुलकर विपक्ष के साथ दिखाई देता है, तो उनमें से अनेक स्वयं को अलग कर सकते हैं। किसी भी जनांदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसका व्यापक सामाजिक विश्वास होता है। एक बार वह विश्वास दरक गया, तो भीड़ लौटने में देर नहीं लगती।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि विपक्ष दूरी बनाकर बैठा रहे।
विपक्ष संसद में सरकार को घेर सकता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकता है। राष्ट्रपति से मिल सकता है। देशभर में शांतिपूर्ण समर्थन अभियान चला सकता है। लेकिन आंदोलन के मंच पर कब्ज़ा करने या उसे दलगत शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बनाने से बचना चाहिए। इससे आंदोलन भी मजबूत रहेगा और उसका नैतिक आधार भी सुरक्षित रहेगा।
20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा इसी रणनीतिक लड़ाई का अगला अध्याय है। संभवतः सरकार प्रदर्शनकारियों को संसद तक पहुंचने नहीं देगी। दिल्ली पुलिस बैरिकेड लगाएगी, धारा 144 का हवाला दिया जाएगा और मार्च रास्ते में ही रोक दिया जाएगा। यह लगभग तय माना जा सकता है।
फिर भी संसद मार्च गलत रणनीति नहीं है।
लोकतांत्रिक आंदोलनों में हर लड़ाई मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं लड़ी जाती। कई बार रास्ते में रोक दिया जाना भी एक राजनीतिक संदेश बन जाता है। संसद तक न पहुंच पाने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि देश यह देखे कि नागरिक अपनी बात संसद तक पहुंचाना चाहते थे और उन्हें रोका गया। लोकतंत्र में प्रतीक भी राजनीति की भाषा होते हैं।
लेकिन समय तेजी से निकल रहा है।
हर दिन सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य गिर रहा है। सरकार यदि इंतजार की नीति पर अड़ी रहती है, तो यह केवल एक आंदोलन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का भी प्रश्न बन जाएगा। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को विरोध से असहमति हो सकती है, लेकिन विरोध की उपेक्षा लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी का संकेत होती है।
अब फैसला आंदोलन के नेतृत्व को भी करना है।
क्या वह अपनी गैर-दलीय पहचान बचाते हुए राजनीतिक समर्थन का विवेकपूर्ण उपयोग करेगा, या फिर प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी के कारण अपने सबसे बड़े नैतिक हथियार को कमजोर कर देगा?
इतिहास गवाह है कि आंदोलनों को केवल भीड़ नहीं, बल्कि भरोसा मजबूत बनाता है। और भरोसा तब तक कायम रहता है, जब तक आंदोलन किसी दल का विस्तार नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक आवाज़ बना रहता है।
सोनम वांगचुक के आंदोलन की असली परीक्षा सरकार से पहले इसी कसौटी पर होने वाली है।









