July 30, 2026
#Citizen Charter #National #Opinion

भारत की जनता, इन 12 सालों का हिसाब दो…

राष्ट्र प्रहरी

2014 से 2018 तक प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदारदास मोदी की विदेश यात्राओं, चार्टर्ड फ्लाइट, एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस और सरकारी इंतज़ामों पर 2000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए थे। बाद में 2022 से 2024 के बीच 38 विदेश यात्राओं पर करीब 258 करोड़ रुपये और खर्च हुए थे।

इसमें उस बोइंग विमान खरीदने का 8458 करोड़ अतिरिक्त जोड़ लीजिए, जो प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति की नकल करने के लिए खरीदी और यह पूरा पैसे देश के जनता की गाढ़ी कमाई में से खर्च हुआ।

2025 की कुछ यात्राओं पर अलग से 67 करोड़ रुपये का आंकड़ा सामने आया। मतलब जनता टैक्स भरती रही और सरकार “विश्वगुरु टूर पैकेज” चलाती रही।

अब वही प्रधानमंत्री जनता को ज्ञान दे रहे हैं कि सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, तेल कम खाओ। भाई साहब, जनता ने आपको प्रधानमंत्री इसलिए बनाया था कि अर्थव्यवस्था संभालो, ना कि पूरा देश हॉस्टल वार्डन की तरह चलाओ।

खुद दुनिया के दर्जनों देशों की यात्राएं करेंगे, कैमरों के सामने गले मिलेंगे, विदेशी स्टेडियमों में शो करेंगे, हजारों करोड़ खर्च होंगे, लेकिन आम आदमी अगर अपनी बेटी की शादी में दो चूड़ी खरीद ले तो राष्ट्रहित खतरे में पड़ जाता है।

जनता पूछ रही है कि आखिर इन यात्राओं से मिला क्या? बेरोजगारी कम हुई क्या? रुपया मजबूत हुआ क्या? पेट्रोल सस्ता हुआ क्या? किसान अमीर हुआ क्या? मध्यम वर्ग टैक्स से मुक्त हुआ क्या? चीन डर गया क्या?

12 साल से हर संकट का इलाज जनता की जेब में ढूंढा जा रहा है। कभी गैस छोड़ो, कभी सब्सिडी छोड़ो, कभी त्याग करो, कभी कम खाओ, कभी कम घूमो। मतलब सरकार सिर्फ भाषण देगी और जनता तपस्या करेगी।

इतिहास में नेताओं ने त्याग तब मांगा था जब देश खुद किसी युद्ध में लड़ रहा हो। लाल बहादुर शास्त्री ने “एक समय का भोजन छोड़ो” कहा था क्योंकि देश के पास अनाज नहीं था और प्रधानमंत्री खुद सादगी से जीता था। लेकिन आज कौन सा युद्ध चल रहा है? कौन सी आपातकालीन भूखमरी आई हुई है?

असलियत ये है कि 2014 में “अच्छे दिन” का सपना दिखाया गया था, 2026 आते-आते जनता को “कम खर्च करो अभियान” में धकेल दिया गया।

आज हालत ये हो गई है कि प्रधानमंत्री देश को विकसित राष्ट्र कम और संयम शिविर ज्यादा बना रहे हैं। सोना मत खरीदो। विदेश मत जाओ। पेट्रोल मत जलाओ। तेल कम खाओ। कल को शायद बोल दें कि शादी भी ऑनलाइन कर लो ताकि लाइट का बिल बच सके।

देश भाषणों से नहीं चलता देश चलता है मजबूत अर्थव्यवस्था, रोजगार, उद्योग, उत्पादन और जवाबदेही से। लेकिन यहां हर असफलता का ठीकरा जनता के सिर पर फोड़ दिया जाता है।

जनता अब पूछ रही है कि “त्याग” सिर्फ आम आदमी करेगा या सत्ता भी कभी अपने शाही खर्चों का हिसाब देगी?

जनता हिसाब दो…

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