जयप्रकाश नारायण के साथ मेरी पहली मुलाकात

शिवानंद तिवारी
राजनीति की शुरुआत तो मैं ने लोहियावादी के रूप में की थी। लेकिन मेरी पीढ़ी के तमाम लोग, जो बिहार की राजनीति के शीर्ष पर लंबे समय तक कायम रहे और आज भी कायम हैं, उन सबको जयप्रकाश जी के आंदोलन ने ही एक उछाल दिया था। बल्कि कहा जाए तो उस आंदोलन ने ही उनको नेता बनाया।
बिहार की राजनीति में जो सड़ांध दिखाई दे रही है, उसके पीछे यह भी एक कारण है कि पिछले पचास वर्षों से उन जन सवालों पर कोई व्यापक जन संघर्ष नहीं हुआ, जिन सवालों को लेकर हम इस संपूर्ण क्रांति के पथ पर चले थे। इसलिए राजनीति की सफ़ाई नहीं हुईं। पचास सालों से बिहार की राजनीति एक ही पटरी पर चल रही है। यही कारण है कि यहाँ की राजनीति में अनेक विकृतियाँ पैदा होती चली गईं।
वीडियो देखें
खैर, यहाँ मेरे लिखने का मकसद यह है कि मैंने लोहिया जी को भी देखा और उन्हें समझने का थोड़ा-बहुत प्रयास किया। विचारक और राजनीतिक दार्शनिक के रूप में लोहिया जी शिखर पुरुष दिखाई देते हैं। लेकिन एक व्यक्ति और नेता के रूप में जयप्रकाश जी का कोई जवाब नहीं था। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि मेरे जैसा साधारण आदमी भी उनके सामने जाता था तो अपने आपको बड़ा महसूस करने लगता था।
मैं कुछ घटनाओं का ज़िक्र करना चाहता हूँ। पहली घटना तो बहुत लोग जानते हैं। अठारह मार्च 74 की रात गिरफ़्तारी के डर से दो तीन साथी श्रीकृष्ण पुरी वाले मेरे घर पर ही सोए। उन्नीस मार्च की सुबह, भवेश चंद्र प्रसाद हम लोगों को लेकर जयप्रकाश जी से मिलाने गए। भवेश जी बाद में संघर्ष कार्यालय के कार्यालय मंत्री बने और विधायक भी हुए। उन दिनों वे भूदान यज्ञ कमिटी के सचिव थे और आंदोलनकारी नेतृत्व और जयप्रकाश जी के बीच सेतु का काम कर रहे थे।
वीडियो देखें
हम लोग पहले राजेंद्र नगर विद्यार्थी परिषद् के कार्यालय गए और वहाँ से जयप्रकाश जी के यहाँ पहुँचे। भवेश जी सबका परिचय करा रहे थे। जब मेरी बारी आई तो मैंने भोजपुरी में ही कहा — “हम शिवानंद हईं।” मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मेरे पिताजी को समाजवादी के रूप में दीक्षित करने वाले स्वयं जयप्रकाश जी ही थे। पिताजी उन्हें ही अपना नेता मानते थे, इसलिए मुझे लगा कि ये तो मेरे घर के बुजुर्ग हैं। इन्हें अपना परिचय मुझे खुद देना चाहिए।
जैसे ही उन्होंने मेरा नाम सुना, उनकी भौंहें तन गई। उन्होंने दुबारा पूछा-के ? मैंने दुबारा अपना परिचय दिया। उन्होंने भोजपुरी में ही मुझसे पूछा — “तूं एह लोग के साथे कईसे ? इस सवाल के बाद तो पूछिए मत ! भीतर से मैंने बहुत अपमानित महसूस किया। मैंने भोजपुरी में ही जवाब दिया कि -‘सुना कि आपकी तबियत ख़राब है. इसलिए आपको देखने चला आया’।
वीडियो देखें
उन्होंने तुरंत कहा — “हमार तबीयत ठीक बा, अब जा !” एक तरह से उन्होंने मुझे कमरे से बाहर निकाल दिया।
मैं बाहर आ गया, बाक़ी लोगों का इंतज़ार करने लगा। जेपी ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया यह जानने के लिए मैं बेचैन था ! बाद में जब बाकी लोग निकले तो मैंने पूछा कि आखिर बात क्या थी, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया।
उसी दौरान ओमप्रकाश दीपक जी पटना आ गए। उनसे मेरा पुराना परिचय था। मैंने उनसे पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि पटना शहर के अलग-अलग मोहल्लों में कमेटियाँ बनाइए और धरना-प्रदर्शन शुरू कीजिए। पटना शहर का शायद ही कोई मोहल्ला होगा जहाँ दो-चार लोग मुझे नहीं जानते हों या मैं दो-चार लोगों को नहीं जानता होऊँ। हमने काम शुरू कर दिया। सुबह जाकर कह देते कि शाम को मीटिंग होगी, और शाम को पहुँचते तो तीस-चालीस-पचास लोग जमा हो जाते। वहाँ कमेटी बनती, भाषण होते, आंदोलन की बातें होतीं।
वीडियो देखें
मेरे साथ जेपी की जमात के कुछ अपेक्षाकृत नौजवान लोग भी जाते थे, जो पहले सोशलिस्ट पार्टी के साथ जुड़े हुए थे। उनके नाम मुझे याद नहीं हैं। मुझे लगता है कि वे लोग जयप्रकाश जी को मेरी गतिविधियों रिपोर्ट करते थे। धीरे-धीरे आंदोलन में हमारी सक्रियता बढ़ी। संचालन समिति में लालू यादव, सुशील मोदी, नीतीश कुमार और दूसरे लोग थे, उन्होंने मुझे भी संचालन समिति में सदस्य के रूप में शामिल (को-ऑप्ट) कर लिया।
संचालन समिति की बैठक महिला चरखा समिति में, जो जयप्रकाश जी का आवास भी था, प्राय: उनकी उपस्थिति में ही हुआ करती थी। मैं सदस्य के रूप में संचालन समिति की अपनी पहली बैठक में शामिल हुआ।
वीडियो देखें
प्रायः सभी सदस्यों के आ जाने के बाद जेपी बैठक वाले हॉल में दाखिल हुए। उसको हॉल कहना उचित नहीं होगा। वह जेपी का बैठका था। जैसे ही जयप्रकाश जी बैठक में आए और कुर्सी पर बैठे, उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा — “सबसे पहले हम शिवानंद से माफी माँगना चाहेंगे।”यह कहकर उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
मैं बता नहीं सकता कि उस समय मेरी क्या स्थिति हो गई थी। मेरे सामने जयप्रकाश जी जैसा महान व्यक्ति हाथ जोड़ कर माफ़ी माँग रहा था। मेरा हाथ भी तुरंत जुड़ गया- मेरे मुँह से निकला, अइसन मत करीं। हमरा पाप लागी। रउआ अधिकार बा, हमरा के बोले के,डाँटे के।”
वीडियो देखें
तमाम लोग इस अदभुत दृश्य को चकित भाव से देख रहे थे। तब उन्होंने कहा — “हम क्या करें? इसके पिताजी ही आकर कहते थे कि उनका बेटा बिगड़ गया है। लेकिन लोगों ने हमें बताया कि तुम किस तरह काम कर रहे हो। इस तरह की ऊर्जा वाले लोग जब सही दिशा में लगते हैं तो बहुत काम के साबित होते हैं।”
उनकी महानता का वह मेरा पहला अनुभव था। इतना बड़ी आदमी, जिनके सामने देश झुकता था, उन्होंने अपने ही एक शिष्य के बेटे से हाथ जोड़कर माफी माँगी। यह जयप्रकाश जी की महानता थी। मैंने देखा है कि उनके पास कोई साधारण आदमी भी जाता था तो उससे जिस तरह मिलते कि उसे महसूस होता था कि वह भी महत्वपूर्ण है।
वीडियो देखें
यह भी पढ़ें
हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार का होगा मंत्रिमंडल विस्तार
नीतीश कुमार और सत्ता का व्यवहार









