द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर राजगोपाल का नाम पहले मतदाता सूची से काटा
फिर भारतीय पासपोर्ट को नवीनीकरण करने से रोका जिससे बिटिया की शादी में शामिल नहीं हो पाए
एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम में कल एक जबरदस्त रहस्योद्घाटन हुआ। इस रहस्योद्घाटन में द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर.राजगोपाल, जो कोलकाता में रहते हैं, का नाम पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची से काट दिया गया है और इसका प्रतिफल यह निकला कि उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण की प्रक्रिया रोक दी गई। यह रहस्योद्घाटन होने के बाद कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा) आदि दलों ने केन्द्र सरकार पर जोरदार हमला किया है।
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आर राजगोपाल ने एक विस्तृत टिप्पणी में बताया कि वह खुद को नागरिक अनिश्चितता की स्थिति में पा रहे हैं। विपक्ष के नेताओं ने कहा कि आर.राजगोपाल की स्थिति नागरिकों के अधिकारों के व्यापक क्षरण को दर्शाती है। मतदाता सूची में नाम हटाए जाने से जुड़ी प्रतिकूल पुलिस रिपोर्ट के कारण पासपोर्ट नवीनीकरण रूक जाने के बाद वह दशकों पुराने पारिवारिक अभिलेखों को दोबारा जुटाने में अपना अधिकांश समय बिता रहे हैं।
आर. राजगोपाल ने आगे लिखा है – पश्चिम बंगाल के लगभग 27 लाख अन्य निवासियों की तरह मुझे भी तथाकथित तार्किक विसंगतियों के आधार पर मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया। मेरे मैट्रिक प्रमाणपत्र जमा कराने के बाद भी कोई कारण नहीं बताया गया और अब मेरी अपील उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत गठित एक न्यायाधिकरण में लंबित है।
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पूर्व संपादक आर राजगोपाल ने आगे कहा – इससे भी अधिक पीड़ादायक मेरे पासपोर्ट नवीनीकरण आवेदन का हाल है। मैंने 19 मार्च 2026 को बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन पुलिस सत्यापन प्रक्रिया इसलिए पूरी नहीं हुई क्योंकि मेरा नाम अभी मतदाता सूची में नहीं है। पुलिस की इस सत्यापन प्रक्रिया का मेरी मतदाता सूची के नाम से क्या लेना देना है, यह मेरी समझ से बाहर है।
देश के एक सबसे बड़े अंग्रेजी अखबारों में से एक द देलीग्राफ समाचार पत्र जो मुख्यरूप से कोलकाता से प्रकाशित होता है और पूरब और पूर्वोत्तर राज्यों सहित करीब दस-ग्यारह राज्यों का एक प्रमुख अखबार है। उसके संपादक रहे आर.राजगोपाल का नाम मतदाता सूची से काटा जा सकता है तो देश के आम नागरिकों का नाम मतदाता सूची में नहीं होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बहुत प्रतिकूल है।
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बिहार में सड़सठ लाख और बंगाल में पिचानबे लाख लोगों का नाम मतदाता सूची काटा गया है। इसके अलावा बंगाल में सत्ताइस लाख लोगों के नाम संदिग्ध सूची में डाल दिया गया है। बिहार में वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने के बाद लाखों लोगों का नामं राशन सूची में से काट दिया गया है और उन्हें राशन देने से मना कर दिया है। इसका असर दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के जनजीवन पर पड़ रहा है।
पूरे देश में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है, अभी तक किसी भी राज्य में कहीं भी कोई सूचना किसी अखबार में नहीं छापा जाता या किसी पोस्टर पर कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। देश के प्रधानमंत्री जो छोटी-छोटी गैस, रेल और नौकरी के फोटो को पूरे देश में पोस्टरों से पाट देते हैं, उस देश में इतना बड़ा अभियान चलाया जा रहा है एसआईआर, इसके लिए देश के वोटरों में कोई सहज सूचना और चेतना या जागरूकता नहीं फैलाई गई है। सारी बातें पूरी तरह से गुप-चुप तरीके से चलाया जा रहा है।
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देश के अपने ही नागरिकों का नाम वोटरलिस्ट से काट कर वोटर रजिस्टर से हटाकर देश के नागरिकों को नागरिकताविहीन कर दिया है। इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी करते हुए कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और उच्चतम न्यायालय के वकील विवेक तन्खा ने एक्स डॉट कॉम पर लिखा है – यह घटनाक्रम उस अतार्किकता के स्तर को दर्शाती है, जहां देश पहुंच चुका है और क्या हम अपने संस्थापक राजनेताओं द्वारा बड़े परिश्रम से स्थापित कानून के शासन वाले राष्ट्र की पहचान को मिटाने पर आमादा है। यह बेहद दुखद है।
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