आपातकाल से अधिक दुखद है अमृतकाल
प्रफुल्ल कोलख्यान

आज की राजनीतिक स्थिति-परिस्थिति तो स्पष्ट है। घोर प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता है या भ्रष्टाचार का पराक्रम, यह कहना मुश्किल है। राजनीतिक नैतिकता और संस्थागत प्रतिबद्धता में आपराधिक ह्रास का वातावरण बना हुआ है। नेताओं के लिए राजनीतिक रूप से जीवित रहने की स्थिति नहीं बची है — यह स्थिति जितना विपक्ष के राजनीतिक दलों पर लागू होती है, उतना ही सत्ता पक्ष नेताओं के बारे में सच है। सत्ता पक्ष के नेताओं की खामोशी में छिपी हुई बेआवाज चीख के दर्द और अर्थ को अभी समझना भले ही मुश्किल हो, लेकिन जी-हुजूरी और चाटुकारिता का दौर कभी तो समाप्त होगा! तब बेआवाज चीख का दर्द निश्चित ही फट पड़ेगा!
राजनीतिक रूप से जीवित रहने और मनुष्य के मनुष्य बनने में याद रखने और भूल जाने का अद्भुत इतिहास विवेक का योगदान है। याद रखने और भूल जाने की क्षमता और विवेक न होता तो मनुष्य की आज तक की यात्रा बहुत कठिन, शायद असंभव ही होती। इतिहास प्रतिशोध का दस्तावेज नहीं होता है। पूर्व विदेश मंत्री के. नटवर सिंह ने ’वन लाइफ इज नॉट इनफ’ में इंदिरा गांधी को एक महान और मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में याद किया है, लेकिन उनकी दो बड़ी गलतियों की तरफ इशारा किया है — एक संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक आपातकाल’ और दूसरा ऑपरेशन ब्लू स्टार। दोनों का संबंध जून से है — आपातकाल 25 जून 1975 और ऑपरेशन ब्लू स्टार 1-8 जून 1984।
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आज की तारीख में संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक आपातकाल’ (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) को याद कर लेना चाहिए। क्योंकि आपातकाल की घोषणा के बिना आज की राजनीतिक स्थिति ऐसी हो गई है कि सत्ता से असहमत राजनीतिक दलों और उसके नेताओं के लिए राजनीतिक रूप से जीवित रहने के अधिकार को ही ध्वस्त हो गया है।
विडंबना यह है कि जी-हुजूरी और चाटुकारिता के दौर में खुद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के लिए भी असहमति के साथ राजनीतिक रूप से जीवित रहने का अधिकार नहीं बचा है; भारतीय जनता पार्टी के नेता आज इसे मानें या न मानें — आगामी कल की बात कहना मुश्किल है । बहरहाल, आज की तारीख में आपातकाल के लगाये जाने और उठाये जाने की राजनीतिक परिस्थितियों-स्थितियों को समझना जरूरी है। भुलाये जाने के लिए भी वैसे राजनीतिक अनुभव को याद किया जाना जरूरी होता है।
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आपातकाल लगाये जाने के कई कारण थे। आपातकाल के पीछे राजनीतिक, आर्थिक और कानूनी कारणों से बनी बहुस्तरीय जटिल परिस्थिति थी।
1971 के बांग्लादेश युद्ध, भारी शरणार्थियों के बोझ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में निरंतर बढ़ोतरी हो रही थी। देश में महंगाई नागरिकों की क्रय-क्षमता के पार होती चली जा रही थी। साधारण लोगों में भी असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा था। जाहिर है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष प्रतिपक्ष की राजनीतिक शक्तियों के लिए यह मुनासिब ही था कि वे पूरी बेमुरौब्बती से साधारण लोगों के असंतोष को हवा देते और उसे भयानक राजनीतिक असंतोष में बदल देने का प्रयास करते।
तबके सत्ताधारी दल और उसके नेता प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को इस का मुकाबला राजनीतिक रूप से कराना चाहिए था। लेकिन स्थिति इतनी अव्यवस्थित हो गई थी कि श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके मुखर-जबर और साइलेंट सलाहकारों को लगा कि संवैधानिक उपचारों के बिना राजनीतिक रूप से मुकाबला करना असंभव हो गया था।
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गुजरात में छात्रों के नवनिर्माण आंदोलन से मोरारजी भाई देसाई और बिहार में छात्रों के आंदोलन से जयप्रकाश नारायण (JP) के जुड़ने से परिस्थिति और भी जटिल हो गई थी। ऊपर से 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई देशव्यापी रेलवे हड़ताल ने देश की अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया था।
मुश्किल तब नियंत्रण से बाहर हो गई जब राजनीतिक आंदोलन को कोर्ट-कचहरी की न्यायिक कार्रवाइयों से भी ताकत मिल गई। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला 12 जून 1975 को आया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित कर दिया (सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप में)। उन पर 6 साल तक कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की आंशिक अनुमति दी, लेकिन वे संसद में मतदान नहीं कर सकती थीं। श्रीमती इंदिरा गांधी पर लगे आरोपों और सजा की तुलना करते हुए आपातकाल के राजनीतिक उत्पीड़न के शिकार बने कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी इनसाइड स्टोरी में दर्ज किया कि न्यायाधीश का फैसला ट्रैफिक रूल तोड़ने पर किसी प्रधानमंत्री को अपदस्थ कर दिये जाने के फैसले की तरह था। जाहिर है कि इससे विपक्ष का दबाव असहनीय हो गया।
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ऊपर से 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल रैली में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की और सेना व पुलिस से असंवैधानिक आदेशों को न मानने की अपील की। चुनी हुई सरकार के आदेशों के संवैधानिक और असंवैधानिक होने का फैसला यदि आधिकारिक तौर पर अधिकारियों के स्तर पर तय होने लगे तो स्थिति की भयावहता का अनुमान सहज ही लग सकता है।
स्थिति चाहे जितनी भी भयावह रही हो, बेहतर उपाय तो यही था कि उसका राजनीतिक मुकाबला किया जाता। आंतरिक आपातकाल का समर्थन कोई नहीं कर सकता है। लेकिन जिन परिस्थितियों-स्थितियों में आपातकाल लगाये जाने की नौबत आई थी आज उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती है। भले ही इसे अनुशासन पर्व कहा गया हो, जमाखोरी, कालाबाजारी, सूदी-किस्ती करनेवालों पर नियंत्रण करने की जितनी भी कहानियां सुनाई जाए बिना किसी सफाई के इसे घोर प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता ही माना जा सकता है। इस राजनीतिक गलती पर कांग्रेस ने माफी मांगी है।
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1977 में जब इंदिरा गांधी ने चुनाव कराए, तो देश की जनता, खासकर उत्तर भारत के लोगों ने कांग्रेस को बुरी तरह हरा दिया, यहां तक कि खुद इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गईं।
आपातकाल को शिथिल कर चुनाव करवाये जाने का श्रीमती इंदिरा गांधी फैसला भी कोई कम चौंकाऊ नहीं था। 18 जनवरी 1977 की रात श्रीमती इंदिरा गांधी ने को इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर अचानक मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी। हालांकि आपातकाल के कई प्रावधानों को शिथिल कर दिया गया था लेकिन आधिकारिक रूप से 1977 के चुनाव परिणाम के स्पष्ट हो जाने के बाद ही 21 मार्च 1977 को हटाया गया था। मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव का फैसला इसलिए चौंकाऊ है क्योंकि चुनाव घोषणा के दिन यानी 18 जनवरी 1977 की तारीख तक श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता पर मजबूत राजनीतिक पकड़ बनी हुई थी।
श्रीमती इंदिरा गांधी के इस फैसले के पीछे कितना नैतिक दबाव था कितनी राजनीति और रणनीति थी कुछ भी कहना मुश्किल है लेकिन राजनीतिक चुनौती नहीं थी यह तो स्पष्ट ही है।
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घोर प्रशासनिक और राजनीतिक विफलताओं, भ्रष्टाचारियों ने बहुत बुरी तरह से जनजीवन को घेर लिया है। कौन विफलता बड़ी है कौन छोटी है, किस पर बिना किसी देर के चर्चा जरूरी है, किस पर चर्चा बाद में हो सकती है, कहना बहुत मुश्किल है।
आज की राजनीतिक चुनौतियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विभिन्न संदर्भों के उनके सलाहकारों की समझ से सचमुच बाहर है या जी-हुजूरी और चाटुकारिता के वातावरण में वे अपनी खामोशी में बेआवाज चीखते रहने के लिए बाध्य हैं यह कहना मुश्किल है। इतना तो कोई भी महसूस कर सकता है, समझ सकता है कि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की हवा तो अब सचमुच खराब हो गई है। भारत के लोकतंत्र ने तबका आंतरिक आपातकाल भी देखा और अब वर्तमान का अमृतकाल भी देख रहा है — आपातकाल से अधिक दुखद है अमृतकाल!
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चलते-चलाते समय की छाती पर कान धरकर यह भी सुन सकते हैं कि सिर्फ जी-हुजूरियों और चाटुकारों की चीख ही बेआवाज नहीं होती है, कभी-कभी इतिहास भी अपने बदले हुए तथ्य और तेवर के साथ बेआवाज ही प्रकट हो जाता है।
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