July 30, 2026
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तिनका-तिनका तृणमूल : बिखराव में भारत की राज-व्यवस्था

सत्ता के जाते ही जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के पांव राजनीति के मैदान से उखड़ गये, चुनावी नतीजों के बाद शायद ही दुनिया के किसी लोकतंत्र में कभी हुआ हो। प्रभुओं की कृपा से दो-तिहाई संख्या के साथ तृणमूल कांग्रेस के सांसद नामालूम-से जन-प्रतिनिधि-हीन राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर रहे हैं — जो है ही नहीं उसमें विलीन हो रहे हैं! अद्भुत है राजनीतिक नेताओं का लोकतंत्र में किया जानेवाला यह रेत-स्नान! एनसीपीआई के घर के ऊपर लोकतांत्रिक राजनीति का जैसे बादल ही फट पड़ा।

प्रफुल्ल कोलख्यान

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद महीना भर में तिनका-तिनका बिखर गया तृणमूल। पश्चिम बंगाल के लोगों के मन में उन स्थितियों-परिस्थितियों की याद ताजा हो गई, जिनके चलते ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग हुई थी। उन स्थितियों-परिस्थितियों की याद तो खुद ममता बनर्जी और उनके उन दिनों के साथियों और जज्बात की याद जरूर आ रही होगी। कहना न होगा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति सामान्य नहीं है। पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों को असामान्य मानने के कारण और लक्षण क्या हैं!

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के साथ एक ही शेड्यूल में असम, केरलम, तमिलनाडु और केंद्रशासित प्रदेश पुदुचेरी में भी चुनाव संपन्न हुए। केरलम और तमिलनाडु के विधानसभा 2026 में भारतीय जनता पार्टी की कोई संभावना नहीं थी, हालांकि वहां भी सत्ता परिवर्तन हुआ। भारतीय जनता पार्टी असम की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने में कामयाब रही। कहीं कोई आंख चुभाऊ उथल-पुथल और उठापटक नहीं! पश्चिम बंगाल अपवाद साबित हुआ। इसका व्यापक असर पश्चिम बंगाल की राज-व्यवस्था पर पड़ ही रहा है, पूरे भारत की राज-व्यवस्था पर इसका दूरगामी असर पड़ता हुआ दिख रहा है।

चुनावी माध्यम से सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया और घटना है। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद लोकतंत्र का शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन का आश्वासन निरर्थक और अविश्वसनीय बन गया है। चुनाव परिणाम को भारतीय जनता पार्टी की नजर से देखने पर भी महत्वपूर्ण है लेकिन, यह अतिमहत्वपूर्ण ठहरता है भारत के लोकतंत्र और संविधान के नजरिये से देखने पर।

सत्ता के जाते ही जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के पांव राजनीति के मैदान से उखड़ गये, चुनावी नतीजों के बाद शायद ही दुनिया के किसी लोकतंत्र में कभी हुआ हो। प्रभुओं की कृपा से दो-तिहाई संख्या के साथ तृणमूल कांग्रेस के सांसद नामालूम-से जन-प्रतिनिधि-हीन राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर रहे हैं — जो है ही नहीं उसमें विलीन हो रहे हैं! अद्भुत है राजनीतिक नेताओं का लोकतंत्र में किया जानेवाला यह रेत-स्नान! एनसीपीआई के घर के ऊपर लोकतांत्रिक राजनीति का जैसे बादल ही फट पड़ा। किसी राजनीतिक दल का दूसरे दल में मिल जाने की बात नई नहीं है, कानून क्या कहता है, क्या करता है? वह सब बाद में, फिलहाल तो यह कि सांसदों का दल तो एनसीपीआई में मिल गया और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस के पद से हटा दिया और अभिषेक बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पद से उतारकर पार्टी से निलंबित कर दिया है। अद्भुत है यह बात कि तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री हैं और सीपीआई (एम) से अलग हुए ऋतब्रत बनर्जी नेता प्रतिपक्ष हैं।

पश्चिम बंगाल में तीन दशक के वाम फ्रंट के शासन के उखड़ जाने के बाद भी तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी के शासनकाल की शुरुआत में ही काफी उठापटक हुई थी। तृणमूल कांग्रेस की भयानक और आपराधिक हमलावरी की चपेट में मुख्य रूप से सीपीआई (एम) पार्टी और कॉडर आये। उस दौरान जो हुआ उसकी टीस से सीपीआई (एम) और उसका कॉडर आज भी परेशान हो जाता है।

लेकिन एक बात है, उस समय ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस वाम फ्रंट के शासनकाल के दौरान वाम फ्रंट सरकार पर लगाये अपने आरोपों को साबित करने में कामयाब नहीं हो पाई थी; कोई नकारात्मक-सकारात्मक सच्ची जांच रिपोर्ट सामने ला पाई। हालांकि हमलों में कोई ‘कोताही’ नहीं दिखी थी। अभी तो इतना संकेत करना ही काफी है कि उतने हमलों के बावजूद सीपीआई (एम) एकदम से भहराकर अपनी ही रद्दी के नीचे नहीं दब गई थी। ऐसा नहीं है कि रद्दोबदल का सीपीआई (एम) के पार्टी संगठन पर कोई असर पड़ा ही नहीं। असर पड़ा और ऐसा पड़ा कि आज तक सीपीआई (एम) सांगठनिक रूप से बहुत पंगु न भी हो गई हो, लेकिन चुनावी राजनीति में अपनी कमर सीधी नहीं कर पाई है।

वाम फ्रंट सरकार की ताकत का अतिरिक्त और पुख्ता स्रोत सरकार के अलावा पार्टी सोसाइटी में था। पार्टी सोसाइटी का मतलब समाज और समाज के लोगों के साथ पूरी ताकत के साथ होना, न सिर्फ पश्चिम बंगाल की सीमा में बल्कि कहीं भी, मतलब कहीं भी! इस के कई कारणों में से एक अतिमहत्वपूर्ण कारण था सिद्धार्थ शंकर राय (1972-77) का शासनकाल नक्सल प्रेरित और प्रभावित हिंसा का उथल-पुथल भरा दौर था।  शुरू-शुरू में पार्टी सोसाइटी की गतिविधियों का बहुत सकारात्मक प्रभाव था; समझ में आने लायक बात यह है कि पार्टी सोसाइटी की ताकत के बल पर ही ऑपरेशन वर्गा (Operation Barga1978)‎ यानी भूमि सुधार कार्यक्रम संभव हो सका था। इतना ही नहीं पंचायती राज जैसे सकारात्मक लक्ष्य पार्टी सोसाइटी के बल पर ही सफलतापूर्वक हासिल हो सके थे।

लेकिन जैसाकि होता है, समय के साथ हर व्यवस्था में त्रुटियां भी व्यवस्था में घुस जाती है। पार्टी सोसाइटी को बहुत सारी कमजोरियों और बुराइयों ने धर दबोचा।

सत्ता की बागडोर आते ही तृणमूल कांग्रेस ने दोनों हाथ से पार्टी सोसाइटी की कमजोरियों और बुराइयों को अपनी सांगठनिक संरचना में समेट लिया। असल में गौर किया जाये तो सत्ताधारी दल के रूप में तृणमूल कांग्रेस की सारी लड़ाई सीपीआई (एम) से ‎पार्टी सोसाइटी पर कब्जा छीनने की बनकर रह गई।

शुरू-शुरू में पार्टी कॉमरेड पार्टी समर्थक अपराधी तत्वों के साथ डटे रहे, लेकिन 2011-16 के बाद जब 2016-21 के लिए दोबारा तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापस आ गई तो फिर न कॉमरेड उस प्रतिबद्धता से टिके रह सके और न अपराधी तत्वों को जोड़े रख सके। शायद कहना जरूरी है कि जन-मानस में अपराधियों की वही छवि नहीं होती है, जो कानून और संविधान की नजर में होती है। राजनीति के जमीनी स्तर पर ‘शरीफों’ की निरंतर कमी होती चली गई। रही-सही कमी राजनीतिक दलों के सुप्रीमो टाइप नेताओं के संतान प्रेम और विरासत बोध ने कर दिया है। जमीन पर अपराधियों की छवि न्याय-प्रभुओं की बनती चली गई; न्याय-प्रभुओं की राजनीतिक धमक भी कोई कम नहीं है।   

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 न सिर्फ पश्चिम बंगाल की राज-व्यवस्था में बदलाव लेकर नहीं आया है, बल्कि इसने संपूर्ण भारत की राज-व्यवस्था में बदलाव का सूत्रपात कर दिया है। इस नजर से देखने पर पश्चिम बंगाल विधानसभा 2026 का चुनाव काफी महत्वपूर्ण घटना है। पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करने के बाद अत्यंत विपरीत घरेलू और अंतरराष्‍ट्रीय परिस्थितियों में भी भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक दुस्साहस के चरम पर है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से उप-मुख्यमंत्री बने शिवसेना (शिंदे) के नेता एकनाथ शिंदे ने ऑपरेशन टाइगर के माध्यम से शिवसेना (युटी) के 9 सांसदों में से 6 को अपनी तरफ खींच लिया वह उनके अकेले के बूते की बात नहीं है। कहा जा रहा है कि नजर तो समाजवादी पार्टी पर भी है। अखिलेश यादव सावधान हैं, सावधान तो ममता बनर्जी भी कम नहीं थी, ऊपर से सत्ता में भी थी।

चुनाव आयोग पर बात होती रही है, होती रहेगी। चुनाव आयोग अपना काम करता रहा है, करता रहेगा। न्याय-पालिका पूरी गरिमा के साथ चलता रहा है और चलता रहेगा।  क्या गजब का लोकतंत्र है और गजब का बना रहेगा। भयंकर लूटमार मचा रहेगा! लोकतंत्र! अभी समर शेष है। 

वोटमारी, उलटफेर और भयंकर लूटमार के दौर में लोकतांत्रिक सत्ता में फेरबदल का ऐसा घमासान!

चलते-चलाते एकुसे जुलै यानी इक्कीस जुलाई! तृणमूल कांग्रेस की चर्चा हो और एकुसे जुलै यानी इक्कीस जुलाई की चर्चा न हो तो फिर बात अधूरी रह जाती है। क्या है एकुसे जुलै यानी इक्कीस जुलाई?

साल 1993 में ममता बनर्जी यूथ कांग्रेस, पश्चिम बंगाल की अध्यक्ष थीं। ज्योति ‎बसु के नेतृत्व में वाम फ्रंट की सरकार थी। वाम फ्रंट चुनाव में वैज्ञानिक धांधली ‎‎(Scientific Rigging) का आरोप था। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए ‎ममता बनर्जी ने मांग की थी कि मतदान के लिए सचित्र मतदाता पहचान पत्र ‎‎(Photo Voter ID Card) को अनिवार्य किया जाए। इसी मांग को लेकर ‎‎21 जुलाई 1993 को ममता बनर्जी के नेतृत्व में राइटर्स बिल्डिंग के घेराव का आह्वान ‎किया गया। हज़ारों की संख्या में युवा कार्यकर्ता कोलकाता की सड़कों पर उतरे। ‎पुलिस ने कोलकाता के एस्प्लेनेड (Esplanade) इलाके के पास ‎आंदोलनकारियों को रोकने के लिए ‎ बैरिकेड्स लगा दिए थे। जब भीड़ आगे बढ़ी, ‎तो स्थिति हिंसक हो गई। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पहले ‎लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। पुलिस द्वारा की गई ओपन फायरिंग में ‎‎13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की जान चली गई और सैकड़ों लोग घायल हुए। ‎तब तृणमूल कांग्रेस अलग पार्टी नहीं बनी थी लेकिन बाद में 21 जुलाई को ‎टीएमसी ने पूरी तरह से अपना प्रतीक बना लिया। ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की ‎अजेय नेता के रूप में उभरी। एकुसे जुलै यानी इक्कीस जुलाई को अजेय ‎ममता बनर्जी ने शहीद दिवस के रूप में मनाना शुरू कर दिया और अपने ‎‎‘शक्ति प्रदर्शन’ का माध्यम बना लिया।

अब जबकि अजेय ममता बनर्जी बुरी तरह से पराजित हो गई हैं, जिस ‎राजनीतिक दल तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया उससे बेदखल हैं, उनके ‎पास एकुसे जुलै यानी इक्कीस जुलाई अपने शक्ति प्रदर्शन का आखिरी ‎मौका है। अब जबकि सत्ता नहीं है, उनका शक्ति प्रदर्शन देखना दिलचस्प ‎होगा। यह भी संकेत मिल जायेगा की ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की ‎राजनीति में प्रासंगिक हैं। लाख टके का सवाल यह है कि अभिषेक बनर्जी ‎का राजनीतिक भविष्य अब क्या होगा और क्या होगी उनकी ‎राजनीतिक भूमिका।

लेकिन सब से बड़ा सवाल तिनका-तिनका तृणमूल बिखर रहा है या बिखराव में भारत का लोकतंत्र है। 

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