भारत की शिक्षा का काकरोच – संघ(आरएसएस), धर्मेन्द्र प्रधान और पेपरलीक
भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अघोषित तौर पर संघ और भाजपा की विचारधारा से प्रभावित लगते हैं और उन्होंने 15 मई को भारत के बेरोजगारों को काकरोच और परजीवी तक कह दिया। देश के बेरोजगार युवा, सरकारी नौकरी के माध्यम से अपने भविष्य को सुरक्षित करने को बेताब छात्र-युवा, देश का आम वोटर -आम पब्लिक उनकी और उन जैसे सोच रखनेवालों की नजरों में काकरोच हैं, इसीलिए तो नागरिकों के मताधिकार छीनने के टूल की तरह भारत के निर्वाचन आयोग(इलेक्शन कमीशन ऑफ इन्डिया) के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के स्पेशल इन्टेन्सिव रिवीजन (एसआईआर) को अवैध ठहराने के बदले उसे कई विपरीत साक्ष्यों के होने के बावजूद वैध ठहरा दिया मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने। और तो और उनके सामने लाखों नामों के काटे जाने को लेकर सवाल किया गया और मृत बताए गए दसियों लोगों को कोर्ट के सामने खड़ा कर दिया गया, फिर भी अंधा होकर न्याय किया गया।
यह सब आरएसएस और भाजपा की मोदी सरकार को अवैध तरीके से चुनाव जितवाने के अकाट्य फार्मूले के तहत एक योजनाबद्ध तरीके से किया गया है। बिहार, बंगाल और असम में हुए हालिया चुनाव में इसी फार्मूले से बीजेपी को चुनाव जितवाया गया है और आगे कई राज्यों में इसी की तैयारी की जा रही है। दरअसल, काकरोच उनकी दिमाग में पल रहा वो कीड़ा है, जिसके माध्यम से आरएसएस, बीजेपी और उसकी सोच से पल्लवित-पुष्पित सभी वैसी संस्थाएं जिसके अंत में संघ या भारती लिखी होती है, उनसे जुड़े लोगों और लाभार्थियों ने ऐसी नौबत पैदा की है कि वे देश को और उसकी बौद्धिक संपदाओं, लोकतांत्रिक परंपराओं और देश की पूंजी को और स्वतंत्रता पश्चात् एक-एक पैसे जोड़कर तैयार की गई संस्थाओं, संस्थानों, इसीआई, सीएजी, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, यूजीसी, सीबीएससी, आईआईटी, आईआईएम आदि सभी को निगल जाने और सफाचट कर जाने को बेताब हैं।
बिना वैधता, बिना पंजीकरण के और बिना किसी संस्थागत बैंक खाते के पिछले सौ सालों से पूरे भारत और विश्व के कोने-कोने में पांव पसार चुकी भारत की सत्ता से जुड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ तोड़ने में कामयाब हो चुकी है। इसका ताजातरीन उदाहरण है, नीट का पेपरलीक 2024 और 2026, सीबीएससी के ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम में धोखाधड़ी। ऐसे पेपरलीकों की संख्या सौ के पार होने वाली है। संघ जो भारत की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने और उसमें आमूलचूल परिवर्तन करने का दावा किया करती थी, अभी बिलकुल चुप है क्योंकि उसके लाडले शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान पिछले पांच-सात सालों से पेपरलीक पर पेपरलीक किए जा रहे हैं और संघ को और बीजेपी पार्टी को आर्थिक फायदा पहुँचाते आ रहे हैं और देश को लाखों छात्रों-अभिभावकों को लाखों करोड़ का आर्थिक चोट पहुँचाते रहे हैं।
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आईए इसे ठीक से समझते हैं कि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा 2024 में ही उस समय क्यों नहीं लिया गया जब नीट की परीक्षा में पेपरलीक हुआ था और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था। उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ स्वघोषित विश्वगुरू प्रधानमंत्री मोदी को अपने घर में बुलाकर और गणेश पूजा के शुभअवसर पर न्यायाधीश और सत्ता की जुगलबंदी की मिसाल पेश कर रहे थे और भारतीय न्यायव्यवस्था किसकी गुलाम है यह साबित कर रहे थे। अपने घर में गणेश आरती में उनसे घंटी टुनटुनवा रहे थे। वो पेपरलीक ऐसा-वैसा नहीं था करीब पांच-सात सौ छात्रों को पूर्ण पूर्णांक अर्थात् 700 में से 700 अंक प्राप्त हो गए थे। उस परीक्षा को भी कैंसिल नहीं किया गया, आंशिक सुधार के साथ उसे लागू कर दिया गया था। जाहिर था कि छात्रों-अभिभावकों से पैसा जो ले लिया गया था।
इस साल देश में नीट में बाइस लाख छात्रों ने परीक्षा दिया। सीबीएससी की बारहवीं में सतरह लाख परीक्षार्थी बैठे। जेईई में पंद्रह लाख। दसवीं से लेकर पीएचडी-यूजीसी, नीट, जेईई, एसएससी, यूपीएससी, आदि परीक्षाओं में कुल मिलाकर एक साल में चार करोड़ पचास लाख से अधिक परीक्षार्थी-छात्र प्रतिवर्ष फीस भरते हैं और बैठते हैं। और इसका कुल जोड़ बैठता है करीब बीस से तीस हजार करोड़ रुपए का। यानि सरकार को इतने पैसे फार्म की फीस से मिलते हैं। इसके अलावा, कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के नाम पर दो से पांच लाख रूपए प्रतिवर्ष देकर तैयारी करने वाले बच्चों की फीस को जोड़ें तो वह कारोबार एक लाख करोड़ से ऊपर का होता है। इसी बीच में, शिक्षा के मैदान में गंदा घंघा का खेल होता है। मेडिकल में निजी कॉलेजों की फीस एक करोड़ से लेकर पांच करोड़ तक बैठ रही है। इसके बदले यदि दलालों के माध्यम से दस-बीस लाख रिश्वत देकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों की दस-बीस हजार सीटें नीट परीक्षा में धांधली से बेची जाती हो, तो इस घंघे में भी बीस-तीस हजार करोड़ का खेल होने की संभावना बताई जाती है। स्वाभाविक है कि इसमें सत्तापक्ष अपनी मुट्ठी गर्म करेगा ही। तो जब संघ(आरएसएस और बीजेपी) को इस खेल से कुछ हजार करोड़ रूपए मिल रहे हों, तो इस पेपरलीक के खिलाफ कौन आवाज उठाए और कौन धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा मांगे। दूसरी ओर, धर्मेन्द्र प्रधान भी तो संघ के लिए और बीजेपी के लिए दुधारू गाय हुए कि नहीं।
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अब जरा सीबीएससी के ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम का खेल समझिए। एक बारहवीं के छात्र सार्थक सिद्धांत ने इस खेल को मीडिया में जाकर उजागर कर दिया और उस छात्र को शिक्षा की संसदीय समिति ने नई दिल्ली में आकर प्रेजेन्टेशन देने के लिए बुला लिया। ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम का ठेका जिस कंपनी को-एम्प्ट(Co-Empt) को दिया गया वो कंपनी पहले भी दूसरे नाम से धोखाधड़ी करती रही है और एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी है। पहले इसका नाम Globe Arena था और इस कंपनी के डायरेक्टर का नाम है वीएसएन राजू। इस कंपनी को-एम्प्ट(Co-Empt) और इसके डायरेक्टर, Manipal Global Education Service नामक कंपनी और इसके मालिक T V Mohan Das Pai से भी संबंध रखते हैं। ये टी वी मोहन दास पई वही हैं, जो गला फाड़-फाड़कर मोदीजी और बीजेपी की पेरौकारी किया करते थे। मणिपाल का अपना इन्जीनियरिंग से लेकर मेडिकल कॉलेज तक हैं, जिसके मेडिकल और इन्जीनियरिंग कॉलेज की फीस कई करोड़ में होती है।
तो कुल मिलाकर, इस देश की शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने में संघ(आरएसएस) और बीजेपी पूरी तरह लगी हुई है। उसे गोदी मीडिया, उसके मालिकों, सत्ता और शिक्षा के दलालों, मेडिकल काउन्सिल ऑफ इन्डिया, एनटीए, सीबीएससी सबका सहयोग मिल रहा है। और यह कॉकरोच की तरह(घुन की तरह नहीं) देश की शिक्षा व्यवस्था को चाटने पर आमादा है।
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