June 13, 2026
#Citizen Charter

समाज का अधोपतन और राजनीति का महापतन – को बर छोट कहत अपराधू

मैं एक पारिवारिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने अभी पिछले दिनों गांव गया हुआ था। एक सुबह गांव के उमेश काका के दालान पर गया, तो देखा कि वहां एक जोरदार बहस उनके और उनके दोस्त के बीच छिड़ी हुई थी। शुरू-शुरू में पता नहीं चला कि किस बात पर ये बहस हो रही है। थोड़ी देर जब वहां बैठा रहा, तब बात धीरे-धीरे समझ में आने लगी। एक तरफ शंकर काका थे तो दूसरी ओर उनके हमउम्र और दोस्त उमेश काका। उमेश काका जोर-जोर से कह रहे थे कि – देश में नेताओं के चारित्रिक पतन की कहानी बन गया है हमारा पूरा लोकतंत्र और लोकतंत्र वोटतंत्र में बदलकर आज खतरे में आ गया है। नेताओं के चारित्रिक पतन के कारण ही देश और समाज गर्त में जा रहा है।


वहीं दूसरी ओर उनके समवयस्क व दोस्त शंकर काका इसे मानने को बिलकुल भी तैयार नहीं थे, उनका कहना था – नेता समाज का आइना होता है। वह पूरे परिदृष्य का प्रतिबिंब भर है। कहावत सुनी नहीं क्या – यथा प्रजा तथा राजा। इस पर उमेश काका ने बोला ये कहावत ही तुम उल्टी पढ़ रहे हो। असल में कहावत है – यथा राजा तथा प्रजा। कहावत उल्टी पढ़ देने से कोई तुम्हें विद्वान नहीं मानने लगेगा। असल विद्वता इसमें है कि अपने तर्कों से और तथ्यों से मेरे अकाट्य तर्क को काटकर दिखाओ सबके सामने, तब मैं मानूंगा कि हाँ किसी स्कूल के हेडमास्टर लगे थे तुम। उमेश काका के इस नहले पे दहला पर दालान पर उपस्थित सभी लोगों की हंसी छूट गई और सबने जोर से ताली मारी। इससे तो यही लगा कि उमेश काका का पलड़ा भारी पड़ा है।


लेकिन शंकर काका ने हार नहीं मानी और फिर से कहा – समाज यदि गर्त में नहीं जाता, उसका नैतिक और चारित्रिक पतन नहीं होता, तो सत्तर-पहचत्तर सालों में हमारे लोकतंत्र का ये हाल न होता। जिधर देखो उधर झूठ-फरेब-भ्रष्ट आचरण के कई जीते-जागते उदाहरण मिल जाएंगे। रामचरित्र-रामउदार दोनों भाई में चार गज जमीन को लेकर झगड़ा-लड़ाई नहीं हुआ क्या। केस हाईकोर्ट तक गया। प्रधान बनने के बाद ब्रजबिहारी ने दूसरे की जमीन हड़पने की कोशिश नहीं की। गांव-पंचायत में सुलटा लेने वाली आपस की बात को थाना-पुलिस और नेताओं तक लेकर कौन गया यह तो बताओ। आज छोटा-सा जिला है हमारा, उसके कोर्ट-कचहरी में जमीन के दीवानी मामले के लाखों केस दर्ज हैं। और जिन्दगी बीत जाती है, लेकिन केस नहीं सुलझता। दूसरा उदाहरण, माना अंग्रेजों ने दलाली सिस्टम चलाया तो अंग्रेजों के जाने के बाद इसे बंद करने को किसने मना किया था। यदि समाज का दबाव होता तो सरकार की क्या मजाल कि इसे बंद न करती। लेकिन समाज को भी इन्हीं की बदौलत पैसे कमाने थे, दूसरे के मकान-जमीन-जायदाद-सोने-चान्दी हड़पकर ही पैसेवाला बनना था, इसलिए पुलिस, साहूकार और नेताओं के गठजोड़ से सारे अधःकर्म किए गए। नेता को छोड़ो बाकी दो तो समाज के ही हिस्सा थे न।
उमेश काका ने बात रोकते हुए कहा – नेता जैसा गिरगिट तुम्हें दूसरा कोई नहीं मिलेगा। सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ और – समाज से वो कई प्रकार के वादे तो कर लेता है, और ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं कि उन किए हुए वादों से मुकर भी जाता है। बताओ नेताओं द्वारा किए गए वादों को तोड़ने के ऊपर कहीं कोई जिम्मेवारी या उत्तरदायित्व तय होती है, किसी कानून में कोई नियम-कायदा बना है कि उस बात का उसे जेल हो जाए।


और उसका क्या कि हमारा समाज-यहां तक कि किसानों ने अन्न, दाल, तेल, सब्जी उपजाने के नाम पर हमारे स्वास्थ्य के साथ जो सुलूक किया है, उसकी कहानियों का अंत नहीं है। शंकर काका बहस को आगे बढ़ाते हुए बोले – जेनेटिक सूई और हानिकारक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से पूरे देश के लोगों का स्वास्थ्य का सर्वनाश हो चुका है। देश भर में बिक रहे फिल्टर तेल और सरसों तेल के नाम पर पॉम ऑयल खिलाया जा रहा है और भारत दुनिया का डायबिटीज सेंटर, कैंसर सेन्टर, हार्ट-किडनी डिजीज सेन्टर बन चुका है और पूरे विश्व की दवा कंपनियों का गुलाम बन चुके हैं हमलोग। हमारे हाथ के उद्योगों को खतम करने के लिए क्या नेताओं ने कहा था, अभी भी देश के कई कोने में कोल्हू चल ही रहे हैं और उनसे शुद्ध तेल निकाला जा सकता है, तो समाज नकली तेल क्यों खाना और खिलाना चाह रहा है। ऐसा क्यों न होकि समाज सतत विकासशील बना रहे और क्यों नेताओं के चक्कर में अपना बिगाड़ करे।


उमेश काका भी कहां चूकने वाले थे – अरे तो इन्हीं नेताओं ने विश्व बैंक और आईएमएफ से हाथ मिलाकर खेती को सबसे घटिया और अलाभकारी साबित करके गाँव छुड़ाने की साजिश की और बीस करोड़ से अधिक आबादी को गाँव छोड़कर शहरों की ओर भागने और मलिन बस्तियों में अस्वास्थ्यकर हालात में रहने के लिए, कम सैलरी पर जीवनयापन करने को मजबूर कर दिया है। मजदूरी कानून किसने बर्बाद किया नेताओं ने आठ घंटे के बदले दस घंटे और बारह घंटे। और देखा नहीं किस तरह लॉकडाउन में भूखे-प्यासे और बिना सैलरी पाए लोग हजारों किलोमीटर गाँव चलकर वापस आ गए थे।


शंकर काका ने इस पर कहा – बिलकुल ठीक, यदि हमने और हमारे सामाजिक व्यवस्था ने खेती-किसानी, देसी तकनीक और सतत विकासमान प्रक्रियाओं, हाथों से किए जा सकने वाले और मेहनत से किए जाने वाले कामों को लाभकारी बनाया होता, तो गाँव छोड़कर शहर जाने की मजबूरी किसी को न होती और समाज का आर्थिक पक्ष मजबूत रहता। समाज भी अधिक लाभ के चक्कर में पड़कर गलत दिशा में भटक गई।
उमेश काका ने कहा – और नेताओं ने समाज के इसी गलत दिशा के भटकाव को और भी हवा दे दिया। लोगों के पांव उखड़ गए और गरीबी का दुष्चक्र टूट नहीं पाया।
हमने बात को आगे बढ़ने से रोकते हुए कहा – काका, बात अब एक ही जगह पर आती हुई दिखाई दे रही थी। चाय भी आ गई है। इस पर अरविन्द ने कहा – काका, हरि अनंत हरि कथा अनंता। समाज और नेता दोनों ही अगम-अबूझ हैं और दोनों में से दोनों ही – को बर छोट कहत अपराधू – के समान ही अपराधी हैं, इसलिए अब इस चर्चा को विराम दिया जाए।