August 7, 2026
#Opinion

बॉलीबुड सिनेमा – कहानियों का अभाव या नेपोटिज्म की मार

पिछले कई वर्षों से बॉलीवुड की कहानियों को लगता है कि लकवा मार गया है। कोविड और उसके बाद पिछले पांच वर्षों का एक सामान्य लेखा-जोखा करें तो हम पाते हैं कि बॉलीवुड ने हिट कम और फ्ल़ॉप फिल्में ज्यादा दी हैं। इस दरम्यान हुआ ये है कि बॉलीवुड की ऑरिजिनल फिल्मों से ज्यादा थियेटर में या ओटीटी पर दक्षिण भारत की चारों भाषाओं – कन्नड़, तेलुगु, तमिल और मलयालम फिल्मों का डब वर्जन ज्यादा चला है और लोगों ने काफी पसंद भी किए हैं।


बॉलीवुड की हिट फिल्मों की यदि बात करें, तो 2021 – सूर्यवंशी, शेरशाह, 83, मिमी 2022 में दृष्यम्-2, ब्रह्मास्त्र, 2023 में पठान, जवान, गदर-2, तू झूठी मैं मक्कार, एनिमल, 2024 में स्त्री-2, 2025 में सूर्यवंशी-2, वार-2, सितारे जमीन पर आदि हिट रहे।
वहीं फ्लॉप फिल्मों की फेहरिश्त यूं तो बहुत लंबी है, उनमें से कुछेक हैं – 2021 – राधे, अंतिम, बंटी और बबली 2, 2022 – लाल सिंह चड्ढा, बच्चन पाण्डे, मैदान, बड़े मियाँ छोटे मियाँ, शमशेरा, 2023 – शाहजादा, सेल्फी 2024- सिकंदर, धड़क-2, सन ऑफ सरदार, 2025 – सिकंदर, सिरफिरा।


बॉलीवुड के फिल्मों के ज्यादातर फ्लॉप होने और उसके हिट कम होने के कई कारण हैं। उन्हीं कारणों का एक लेखा-जोखा प्रस्तु कर रहे हैं।
कहानियों में विविधता – बॉलीवुड फिल्मों की कहानियों में वो विविधता नहीं है जैसी दक्षिण भारत की चारों भाषाई फिल्मों में है। आप ऊपर लिखे कई नामों को देखें तो उनमें से कुछ हिट और कुछ फ्लॉप फिल्म तो भाग दो हैं यानि पुरानी फिल्मों की कहानियों को आगे बढ़ाया गया है – स्त्री 2, दृष्यम् 2, गदर 2 बंटी और बबली 2, धड़क 2, वॉर 2, सूर्यवंशी -2। कहानीकारों, लेखकों को अब बॉलीवुड में कोई नहीं पूछता। हिन्दी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक कहानी के लेखकों को कोई खास भाव नहीं दे रहे है और यह एक चलन बन गया है। लेखकों से कहानी का प्लॉट या तो मांग लिया जाता है या चुरा लिया जाता है या खरीद लिया जाता है और अपने नाम से फिल्मों में परोस दिया जाता है। ऐसे कई स्वीकारोक्ति में देखा गया है कि कई निर्देशक खुद कहानी-डाइलॉग सेट पर ही लिखने लगे हैं। नए कहानीकार अब बॉलीवुड में नहीं पनप पा रहे हैं, उनका स्थान ओटीटी पर या सीरियलों में रह गया है। इसलिए आप देखेंगे कि बॉलीवुड की कहानियों में अब कोई खास और रेखांकित करने लायक विविधता नहीं होती। वही घिसी-पिटी फार्मूला फिल्मों का दौर लौट आया है।


दक्षिण की फिल्मों में कहानियों की विविधता होती है। उनकी कहानियों में एक नाटकीयता, विविधता, जमीनी वास्तविकता, सांस्कृतिक जुड़ाव और मिट्टी की सुगंध, कथानक में गंभीरता और वास्तविकता का पुट होता है, जो बॉलीवुड की कथानकों में बिलकुल नहीं होता। बॉलीवुड में ड्रामा ज्यादा, डायलॉग बहुत उबाऊ, थकाऊ और कहानी कहीं-न-कहीं से कॉपी-सी लगती है। एक दूसरा चलन ये हो गया है कि बॉलीवुड अब दक्षिण की कहानियों की कॉपी करके भी फिल्में बना रहा है। हिन्दी में डबिंग करके तो दक्षिण की फिल्में धड़ाधड़ हिट हो ही रही हैं। जब कहानीकारों को हटाकर निर्माता और निर्देशक खुद ही कहानी-डायलॉग-पटकथा सबकुछ लिखने लगे या अपना नाम देने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उस फिल्म इन्डस्ट्री में भ्रष्टाचरण की जड़ें गहरी हो चली हैं। जो फिल्म उद्योग कहानीकारों को उनका क्रेडिट नहीं देना चाहता या उन्हें पैसे न देकर उनका मान-सम्मान छीन लेना चाहता है, वह ईमानदारी की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता। ये बॉलीवुड के मानसिक दीवालियापन का बहुत बड़ा नमूना है। इसी के कारण, पिछले पांच सालों में बॉलीवुड में जितनी फिल्में हिट नहीं हुईं उससे दुगूनी या तिगुनी फिल्में फ्लॉप हुई हैं। ये बॉलीवुड के अर्श से फिसलकर फर्श पर आ जाने की दस्तान भी बयान करता है। ये अलग बात है कि फ्लॉप फिल्में भी अपनी लागत निकाल लेता है, इसी वजह से उसे अच्छी कहानियों और कहानीकारों-लेखकों की दरकार नहीं है। इसका जिम्मेदार बॉलीवुड के नेपोटिज्म प्रायोजक निर्माता-निर्देशक-फिल्मकार-अभिनेता-अभिनेत्री आदि हैं।


इसी से दूसरा सवाल यह खड़ा होता है कि बॉलीवुड की दुर्गति के लिए नेपोटिज्म कितनी ज्यादा जिम्मेदार है। आप यदि ऊपर लिखे हिट फिल्मों के नामों पर गौर करेंगे, तो पाएंगे कि एकाध अभिनेता को छोड़कर शेष ज्यादातर फिल्में स्थापित अभिनेताओं, निर्देशकों द्वारा बनाए गए हैं। यहां पर साफ नेपोटिज्म का चमत्कार देखा जा सकता है। लेकिन नेपोटिज्म का उससे ज्यादा चमत्कार फ्लॉप फिल्मों में देखा जा सकता है। पिछले पांच सालों में बॉलीवुड में अपने सखा-संतानों को अभिनेता-अभिनेत्री के रूप में स्थापित करने के लिए बनाए जाने वाले अधिकतर फिल्में फ्लॉप ही रही हैं। ऊपर कुछ नाम दिए गए हैं और पाठक अपनी ओर से कुछ और नाम इसमें जोड़ सकते हैं। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की कोविड के दौरान हुए रहस्यमय मौत के समय उठे सवालों से बॉलीवुड अभी तक पीछा नहीं छुड़ा पाया है। हां सवालों पर गर्दो-गुबार जरूर बैठ गया है। लेकिन इसी से जुड़ा दूसरा सवाल है, बॉलीवुड अपने घर के अलावा बाहरी प्रतिभाओं का खुले हाथ और खुले हृदय से स्वागत क्यों नहीं करना चाहता ? ज्यादातर बॉलीवुड सितारे, निर्माता, निर्देशक इस सवाल पर चुप्पी क्यों लगा जाते हैं।


तीसरा और एक महत्वपूर्ण मुद्दा है बॉलीवुड से भारतीय गाँव-ग्रामीण दुनिया-गाँव देहात यहां तक कि मध्य वर्ग की समस्याओं से पूरी तरह से नाता तोड़ लेना। आप सभी ने ओटीटी पर गांव-समाज से जुड़ी पंचायत नामक सिरीज की सफलता को अपनी आँखों से देखा होगा और यह भी कि शहरी मध्यवर्ग से जुड़े गुल्लक नामक सिरीज के कई भागों की सफलता से यह जरूर समझा होगा कि आमलोग अभी भी गाँव-समाज-शहरी मध्यवर्ग से जुड़े फिल्मों-सीरियलों को गंभीरता से लेते हैं और इसे देखना पसंद करते हैं। एकाध फिल्मों में पंजाब के गांवों की कुछ तस्वीर मिली भी होगी ते क्षेपक के रूप में मुख्य कहानी लंदन-मुम्बई-दिल्ली की ही रही होगी, गाँव की नहीं। लेकिन, बॉलीवुड का क्या कहना। पिछले पाँच वर्ष के दौरान तो नहीं हि दिखा लेकिन दस-पंद्रह सालों से ऐसी फिल्में बननी ही बंद हो गई हैं। बॉलीवुड के सभी निर्माता-निर्देशक करण जौहर फिनोमिना के शिकार हो गए हैं। और एक ही धरातल के एक से बढ़कर एक अमीरी-दिखावे-पैसे के खेल, नहीं तो मार-पीट-हिंसा-बलात्कार और ज्यादा हुआ तो इतिहास की कहानी या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की बायोग्राफी पर फिल्म बना दी। गंगा-यमुना दोआब का दर्शक सभी कुछ देख ही लेता है, चाहे उसके जीवन और उसकी संवेदना से जुड़े कथानकों पर कोई बातें करे या न करे।

यह भी देखें

तो फिर, लोकतंत्र की लुटिया डूबी कैसे? 

मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन के निरस्त होने पर मचा बवाल

खाड़ी संकट – डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की सनक का नतीजा