कॉकरोच जनता पार्टी और भारत का भविष्य
प्रफुल्ल कोलख्यान

नरेंद्र मोदी के शासनकाल में जरूरत से अधिक शक्ति नरेंद्र मोदी नाम के व्यक्ति में केंद्रित हो गई। यह केंद्रीयकरण इतना जबरदस्त हो गया कि कैबिनेट के सामूहिक शासन की अवधारणा ही लुप्त हो गई। राष्ट्र को पार्टी, राष्ट्र और राष्ट्र की शक्ति को पार्टी की शक्ति समझे जाने का माहौल बना दिया गया है। अर्थात, जो पार्टी में है वही देश का नागरिक माना जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक चित्त और चरित्र में बद्धमूल है कि जो उनकी पार्टी में नहीं है, वह घुसपैठिया है। असहमति दुश्मनी है ‘देशद्रोही’ होने का लक्षण है।
कॉकरोच जनता पार्टी का आज जंतर-मंतर पर भारी प्रदर्शन हो रहा है। जिस तूफानी गति से कॉकरोच जनता पार्टी को केंद्र में रखकर लोगों के मन में जमा हुआ आक्रोश जिस तरह से राजनीतिक रूप से कैपिटलाइज हो रहा है, वह बहुत चौंकाऊ है। साधारण पब्लिक के मन में अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले अरविंद केजरीवाल के इंडिया अगेन्स्ट करप्शन आंदोलन की स्मृति और उसकी परिणति कौंध जाती है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस चौंकाऊ प्रकटीकरण से चतुर्दिक हलचल दिख रही है। कॉकरोच जनता पार्टी का भारत में क्या भविष्य है? यह तो वक्त बतायेगा, लेकिन फिलहाल तो इसके प्रति नजर तो बनाये रखनी ही पड़ेगी।
वीडियो देखें
कॉकरोच जनता पार्टी के चौंकाऊ प्रकटीकरण के चलते राजनीतिक हलचल है; इसके प्रकटीकरण के परिप्रेक्ष्य को समझना जरूरी है। परिप्रेक्ष्य यह है कि डूबते हुए भविष्य के सामने युवा खड़ा है। बेरोजगारी से देश की बड़ी आबादी त्राहि-त्राहि कर रही है। जन-हित में सूचना प्राप्त करने के अधिकार का इस्तेमाल करनेवालों यानी आरटीआई कार्यकर्ताओं, शासक के कानून के खिलाफ और कानून के शासन के पक्ष में खड़े होनेवाले लोगों के प्रति जबरदस्त नफरती माहौल बना दिया गया है। खुद प्रधानमंत्री संसद में नागरिक जमात के लोगों को आंदोलनजीवी कहकर अपना नफरती तेवर दिखा चुके हैं।
नरेंद्र मोदी के शासनकाल में जरूरत से अधिक शक्ति नरेंद्र मोदी नाम के व्यक्ति में केंद्रित हो गई। यह केंद्रीयकरण इतना जबरदस्त हो गया कि कैबिनेट के सामूहिक शासन की अवधारणा ही लुप्त हो गई। राष्ट्र को पार्टी, राष्ट्र और राष्ट्र की शक्ति को पार्टी की शक्ति समझे जाने का माहौल बना दिया गया है। अर्थात, जो पार्टी में है वही देश का नागरिक माना जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक चित्त और चरित्र में बद्धमूल है कि जो उनकी पार्टी में नहीं है, वह घुसपैठिया है। असहमति दुश्मनी है ‘देशद्रोही’ होने का लक्षण है।
नफरती अहंकार के इस शासनकाल में शासन के प्रति लोगों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। लोकतंत्र में जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति आंदोलनों में होती है। जनाक्रोश की निकासी सही तरीके से होनेवाली चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से होती है। डॉ राममनोहर लोहिया के राजनीतिक विचारों को याद करें तो जीवंत लोकतंत्र में जनांदोलन और चुनावी प्रक्रिया के पारस्परिक संबंधों के महत्व को समझना बहुत मुश्किल नहीं होगा। इस सरकार के लिए न जनांदोलन का कोई महत्व है, न निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से कोई लगाव है। आज का राजनीतिक यथार्थ तो यह है कि लोकतांत्रिक तरीकों के सारे दरवाजे एक-एक करके बंद हो गये हैं। यह सरकार भूल गई है कि चुनौती में जनता संविधानसम्मत शासन का दायित्व देती है — दायित्व देती है स्वामित्व नहीं। कहना न होगा कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में अलोकतांत्रिक तरीके से ही पूरी व्यवस्था चलने लगी है।
वीडियो देखें
ऐसे में, किसी भी देश का लोकतांत्रिक तरीका जब निष्फल होने लगा तब सहज ही इस के संवैधानिक और न्यायिक उपचार के लिए आशा की किरण न्याय-पालिका ही बची रहती है। लेकिन इस दौर में न्याय-पालिका से लोग कम निराश नहीं हुए हैं। संवैधानिक और कानूनी रूप से सब-कुछ सही हो सकता है, लेकिन विडंबना यह है कि सब-कुछ का इस तरह से सही होना जनजीवन और जीवनयापन के विरुद्ध साबित हो रहा है। बिल्कुल ताजा उदाहरण, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का नतीजा है।
न्याय-पालिका के रुख और रवैया के साथ ही भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी में अपने लिए कॉकरोच और परजीवी जैसे शब्द के आने से मामला बहुत गड़बड़ा गया। व्यवस्थित लोगों की टिप्पणी ने व्यथित मन को और बेचैन कर दिया। इसी बेचैनी और अपमान के आलम में सूझे हंसी-खेल से शुरू हुआ व कॉकरॉच जनता पार्टी के रूप में आकार पाने लगा। जंतर-मंतर पर उनका प्रदर्शन हुआ।
वीडियो देखें
सब-कुछ अराजकता और अनिश्चितता के भंवर में फंसा हुआ है। जनजीवन के लिए कुछ भी स्थिर नहीं सिर्फ सरकार निश्चित और स्थिर है। निश्चित स्थिर और लापरवाह! जनजीवन के प्रति लापरवाह, नागरिक अधिकारों के प्रति लापरवाह, अपनी लोकतांत्रिक जवाबदेही से लापरवाह! सर्व-लापरवाह!
विपक्ष के नेताओं के साथ ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की हर कोशिश के बावजूद चुनाव आयोग ने चुनाव में राजनीतिक संघर्ष के लिए समतल और निष्पक्ष जमीन बनाने में अपनी भूमिका नहीं निभाई!
स्थिर सरकार और अस्थिर जनजीवन की राजनीतिक विडंबना का गहरा संबंध भारत के लोकतंत्र के संस्थागत ढांचों के चरमरा जाने से जरूर है।
जनतंत्र के रहनुमाओं के लिए कॉकरोच जनता पार्टी के माध्यम से हो रहे राजनीतिक कैपिटलाइजेशन को कैसे किया जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि जिस प्रकार से अन्ना हजारे के आंदोलन के राजनीतिक कैपिटलाइजेशन का इस्तेमाल कांग्रेस के खिलाफ किया गया, उसी तरह से कॉकरोच जनता पार्टी के राजनीतिक कैपिटलाइजेशन का इस्तेमाल फिर संविधानसम्मत लोकतांत्रिक तरीकों से शासन के लिए राजनीतिक संघर्ष कर रहे राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ न कर लिया जाये।
फिलहाल देखना दिलचस्प होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी में जेन-जी की भावना काम कर रही है या सब-कुछ भरी हुई चाभी का कमाल साबित हो जायेगा।
यह भी पढ़ें








