युवाओं के प्रश्न, सत्ता की चुप्पी और मीडिया का नैरेटिव !
बात यह महत्वपूर्ण है कि विपक्ष को नही, युवाओं और जनता को क्या चाहिए? एक ऐसी अनैतिक और भ्रष्टाचारी सरकार जिसके पद पर बने रहने का कोई नैतिक आधार नही है, जो जनादेश पर नही, बल्कि “ज्ञानादेश” के सहारे आई है! और सर्वसत्ताधिकारवाद न्यायविद के सहारे अहंकारी बनी हुई है!
तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया का युवाओं के ज्वलंत मुद्दों- पेपर लीक, भ्रष्ट और सड़-गल चुकी शिक्षा व्यवस्था के दोषी- सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्षी पार्टी, कांग्रेस के पीछे पड़ने से आंदोलन रूकने वाला नही है। निकम्मी सरकार को जवाबदेह बनाने के बजाय कांग्रेस के खिलाफ नैरेटिव बनाने से छात्रों और युवाओं के आंदोलन को भ्रमित नही किया जा सकता।
जब सत्ता निरंकुश होकर युवाओं के खिलाफ हिंसक हो जाए तो आत्मरक्षार्थ और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वर्तमान सत्ता के खिलाफ हर एक आवाज, हर एक अहिंसक उपाय अनिवार्य है।
सरकार का “खासमखास मीडिया” विपक्ष और कांग्रेस के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने के बजाय वर्तमान सत्ता को नैतिक और जवाबदेह बनाता, तो आज देश का यह हाल ना होता और ना ही युवा सड़कों पर होते।
देश और युवाओं को इस हाल में पहुंचाने के लिए अपराधिक कृत्य करती सरकार के साथ मीडिया का वो धड़ा भी उतना ही दोषी है जो अपराधिक कृत्य करने वाले भाजपा और संघ के साथ नेक्सस बनाकर पिछले 15 सालों से षडयंत्र रचता आ रहा है! और मीडिया का यह अपराधी गिरोह आज भी लोकतंत्र और युवाओं के खिलाफ ही काम कर रहा है!
मीडिया संस्थानों और भ्रष्ट सरकारों के बीच अनैतिक संबंध एक अस्वस्थ गठबंधन का रूप ले लेते हैं जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कमजोर करता है, सार्वजनिक जवाबदेही को दबाता है और युवा कल्याण की उपेक्षा करता है। जब मीडिया निष्पक्ष रिपोर्टिंग की बजाय राजनीतिक गठबंधन या वित्तीय लाभ को प्राथमिकता देते हैं, तो वे सार्वजनिक प्रहरी से राज्य के प्रचार का उपकरण बन जाते हैं।
नियंत्रण : विशेष तरह के गठबंधन (nexus) से “स्पिन ज़ोन” बनते हैं। यहाँ, युवा बेरोजगारी, खराब शिक्षा व्यवस्था और अनैतिक प्रणालीगत मुद्दों को जानबूझकर कम करके आंका जाता है और पक्षपाती मीडिया द्वारा उनका पुनर्परिभाषित किया जाना लोकतांत्रिक जवाबदेही का ह्रास है।
ध्यान भटकाने की रणनीति : मुख्यधारा मीडिया सनसनीखेज, विभाजनकारी या अति-पक्षपातपूर्ण खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। इससे जनता का ध्यान नीतिगत विफलताओं और युवाओं की कल्याणकारी आवश्यकताओं से हट जाना स्वाभाविक है।
लोकतांत्रिक आधार और युवाओं के प्रति जवाबदेही का क्षरण : लोकतंत्र सत्ता को जवाबदेह ठहराने के लिए प्रेस/ मीडिया पर निर्भर करता है। जब मीडिया राज्य के साथ मिल जाता है, तो जनता पारदर्शी जांच के अपने प्राथमिक साधन को खो देती है।
युवाओं से जुड़े मुद्दों का हाशिए पर चले जाना: छात्रों में भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना, वित्तीय संकट और इसके प्रभाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य संकट, रोजगार की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों को पक्षपाती मीडिया द्वारा अक्सर राजनीतिक रूप से उपयोगी बयानबाजी के पक्ष में दरकिनार कर दिया जाता है।
जनता का मोहभंग: पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग और प्रस्तुती के निरंतर संपर्क से व्यापक निराशावाद पनपता है। यह नागरिकों, विशेषकर युवा पीढ़ी को, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पूरी तरह से अलग होने के लिए प्रेरित करता है।
असहमति का दमन: शांतिपूर्ण छात्र विरोध प्रदर्शनों या जमीनी स्तर के युवा आंदोलनों को राज्य-समर्थित मीडिया द्वारा असामाजिक या गैरकानूनी के रूप में पेश किया जाना और जिससे वैध शिकायतों को अमान्य कर दिए जाने से लोकतंत्र के लिए एक गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। अब वक्त आ गया है कि अपराधी मीडिया और निरंकुश सत्ता के वर्चस्व को नकारते हुए राष्ट्र के समग्र विकास के लिए बचे हुए मीडिया के सच्चे प्रणेता और अल्टरनेटिव मीडिया की जवाबदेही बनती है कि भारत को इस अराजक व्यवस्था और अवस्था से निकाले…









