नेता स्क्रीन पर, जनता ज़मीन पर! क्या यही लोकतंत्र है?
श्रम से सपनों का विच्छिन्न हो जाना, श्रम से आनंद का तिरोहित हो जाना डिजिटलयुग की सब से बड़ी दुर्घटना है! कोई तो कमायेगा-कमायेगी! या फिर सब-कुछडेटा कमायेगा और बाकी बचा हुआ काम सेवायोगी कर लेंगे!
नेता स्क्रीन पर, जनता जमीन पर! क्या यही लोकतंत्र है?
रामदास क्यों उदास था! किस ने उसे बता दिया था कि उस की हत्या होगी। चौड़ी सड़क, पतली गली, घनी बदली आखिर मामला क्या था? ऐसे पता नहीं चलेगा! राजनीतिक नेता को संकोच होगा या फिर क्या पता कि उन्हें पता ही न हो! चलते हैं हिंदी कवि और पत्रकार रघुवीर सहाय के पास! रघुवीर सहाय कवि थे, पत्रकार भी थे। अब तो विरला ही कोई कवि-साहित्यकार वास्तविक पत्रकार होता है। उस जमाने में होते थे और उन में रघुवीर सहाय भी प्रमुख रहे हैं। कुछ हिस्सा — “चौड़ीसड़क गली पतली थी / दिन का समय घनी बदली थी / रामदास उस दिन उदास था/ अंत समय आ गया पास था / उसे बता यह दिया गया था / उसकी हत्या होगी”।(रघुवीर सहाय की यह कविता उन के संग्रह हँसो हँसो जल्दी हँसो 1975 में प्रकाशित हुआ, ध्यान रहे घोषित इमरजेंसी के साल और दौर में)।
1975 की घोषित इमरजेंसी में रामदास उदास था। आज 1926 में कोई इमरजेंसी नहीं है लेकिन राम जन्म-भूमि पर बने राम मंदिर में लूटपाट की खबरों से रामदासरामभक्त उदास हैं। क्या होगा तब जब कभी यह उदासी टूटेगी! राम के नाम पर राजनीति करनेवालों को यकीन है कि वे रामभक्तों की उदासी को आमजन की बेहोशी में बदल देने में कामयाब हो जायेंगे! क्या सचमुच, कामयाब हो जायेंगे!‘रामराज की राजनीति’ करनेवालों की सफलता का एक बड़ा कारण डेटा और एल्गोरिदम में छिपा रहता है!
जो लूटपाट हुआ उस मामले में अदालती दोषसिद्धि तक पहुंचने में वक्त लगेगा, बल्कि काफी से अधिक वक्त लग सकता है। अदालती दोषसिद्धि में चाहे जितना वक्त लगे, देश के लोगों के सामने सब-कुछ साफ-साफ आ गया है। बड़ी मुश्किल यह कि भारतीय जनता पार्टी विपक्षी राजनीतिक दलों के खिलाफ परसेप्शन और करप्शन का राजनीतिक इस्तेमाल करने में डेटा और एल्गोरिदम के सहारे सफल होती रही है। क्या विपक्ष की राजनीति परसेप्शन और करप्शन का इस्तेमाल कर पायेगी! सवाल लाख टके का, जवाब दो कौड़ी का — किस का कितना कंट्रोल डेटा और एल्गोरिदम पर है!
क्या सभ्य, शिष्ट और बेहतर जीवन की आकांक्षा ही मर गई है?
क्या सभ्यता हताश हो चुकी है! विज्ञान और तकनीक में निहित शक्तियों केइस्तेमाल से मनुष्य की गति तो बढ़ी है; लेकिन मति! मति घट गई या कुमति बदल गई है! बाहर-बाहर बहुत विस्तार हुआ गुलजार हुआ लेकिन अंतरमनसंकुचित हो गया है। अंतरमन में सूनापन भर गया है। सिर्फ शक्ति और ताकत कीभाषा बची है। बाहर-भीतर के सोच और अप्रोच की दिशाहीनता या फिरजीवनयापन का में! ‘जीने दो और जीओ’ तो क्या सिर्फ कहने को है — कोराआदर्श है। व्यावहारिक और यथार्थ में असल बात है ‘मारो और जीओ’! सर्वाइवलइंस्टिक्ट असल में कीलिंग इंस्टिक्ट ही है।
सभ्यता भूख से नहीं, हवस से परेशान है। और राजनीति किस चीज के लिए परेशानहै! दल के लोगों की सत्ता के लिए या फिर देश के लोगों की सत्ता के लिए, या फिर स्वयं की सत्ता के लिए! लोकसत्ता यानी लोक की सत्ता के लिए कौन परेशान है?क्या पता! लेकिन हम क्यों परेशान हैं! हमारी छटपटाहट किस के लिए है! दी गई परिस्थिति को बदलने के लिए! जीवनयापन के निश्चित आधार के लिए! भूखमिटाने के लिए! हवस पूरी करने के लिए! किस के लिए!
हमारी परेशानी की जड़ सर्वाइवल इंस्टिक्ट में है? कीलिंग इंस्टिक्ट में है? कहां है?मनुष्य किस नियम से चलता है? ऐकिक नियम से! लौकिक नियम से! पारलौकिकनियम से, भौतिक नियम से! पराभौतिक नियम से! जीवन एकआयामी नियम से नहींचलता है। बल्कि जीवन चलता है बहुआयामी संयम से! संयम से यानी सारी शर्तों, यहां तक कि नकारात्मक शर्तों से भी, सकारात्मक जुड़ाव से जीवन चलता है!
यम का अर्थ जुड़ाव है और नियम का अर्थ जुड़ाव की शर्तें! संयम यानी जीवन कीशर्तों से सकारात्मक जुड़ाव! जीवन की शर्त यानी दी गई परिस्थिति, मिली हुई परिस्थिति। किस ने दी जीवन की परिस्थिति! किस से मिलती है, यह जिसे कहा जाता है मिली हुई परिस्थिति! उत्तरजीविता से! उत्तरजीविता जिसे चुना नहीं जाता है है। अर्जित नहीं किया गया होता है। लेकिन मनुष्य! मनुष्य!! तुच्छ-से-तुच्छ, दुखी-से-दुखी और महान-से-महान, सुखी-से-सुखी माना जानेवाला मनुष्य भी मिली हुई परिस्थिति से संतुष्ट नहीं रहता है! वह दी गई परिस्थिति और मिली हुई परिस्थिति से बाहर निकलकर अपने जीवन की परिस्थिति को खुद बनाना चाहता है।
यह जो चाहत है, यह जो इच्छा है, अपने जीवन की स्थिति-परिस्थिति को खुद तय करने की, यही उद्यमशील मानवीय बुद्धिमत्ता मनुष्य को अन्य प्राणियों से भिन्न करती है! वैसे, दी गई परिस्थिति और मिली हुई परिस्थिति से बाहर निकलने की कोशिश तो जीवधारियों के जीवधारी होने का बुनियादी लक्षण है। जीवन की स्थिति-परिस्थिति को बदलने की सामाजिक-समूहों की कोशिश का नाम राजनीति है। आज के लोगों की अब तक की अर्जित जीवन की स्थिति-परिस्थिति आनेवालेकल के लोगों के लिए दी गई, मिली हुई परिस्थिति बन जाती है। यही जीवन-चक्र है। यह जीवन-चक्र असल में धम्म-चक्र के साथ प्रवर्तित होता रहता है — आगे से भी आगे बढ़ता रहता है! धम्म-चक्र प्रवर्तनाय और धर्मसंस्थापनार्थाय के द्वंद्व-दोलन के दोपहिया पर जीवन आगे बढ़ता रहता है। लेकिन ऐसा भी होता है जब पहिया पाट में बदल जाता है — जीवन दो पाटों के बीच पिसने लगता है। चलती चक्की देखकर कबीर दुखी होता है, रोता है! चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोये — दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई! सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवे — दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवे। दोपहिया है या दोपाट है — पता हीनहीं चलता; कब प्रतिहिंसा सिर्फ हिंसा बन जाती है। पता ही नहीं चलता है!
पता ही नहीं चलता है! क्या इस पता नहीं चलने के चलते सभ्य, शिष्ट और बेहतरजीवन की आकांक्षा ही सभ्यता में मर गई है! नहीं मरी नहीं है, मूर्छितावस्था में है,मूर्छित है! शक्तिवाण से मूर्छित हो गया है — जैसे राम-रावण युद्ध में लछमन मूर्छित हो गये थे। अभी भारत का लोकतंत्र मूर्छितावस्था में है। भारत का लोकतंत्र अपनी मूर्छा से निकलकर पूरी ताकत से खड़ा हो जायेगा; अभी समर शेष है!
सदाशयताओं के पुल का पाया
तमाम सदाशयताओं के बावजूद बुजुर्ग बुद्धिजीवी के विश्लेषण के मुख्य परिसर और प्रिमाइसेज और उस के आधार पर किये गये विश्लेषण से सहमत होना बहुत मुश्किल है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में ऐसी कोई टीका-टिप्पणी या ऐसा कोई टकराव संभव ही नहीं है जो एक दूसरे के टूटन की राजनीतिक परिस्थिति बन जाए। सही बात क्या है? सहज-सरल बुद्धि से यह बात समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि भाजपा आरएसएस का दूसरे पर दिखनेवाला कोई भी हमला असल में कांग्रेस पर किया गया हमला होता है। कांग्रेस को किसी भी कीमत पर आरएसएस और भाजपा के टकराव से किसी एक या दोनों के क्षतिग्रस्त का इंतजार किये बिना अपना राजनीतिक इंतजाम करना चाहिए!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी में से एक काया है तो दूसरा माया है। कब कौन काया है, कौन माया है; यह समझना मुश्किल होता है। जनकवि नागार्जुन ने देख लिया था हिटलर का तंबू! बिना हकलाये कहा था कि हिटलर केतंबू में अब वे लगा रहे पैबंद। मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।नागार्जुन की मानें तो खुद तक्षक ने सिखलाये इन को सर्प नृत्य के छंद!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कांग्रेस का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य इतना भिन्न और विरोधी है कि इन के बीच तुलना की सदाशयताओं का बीच में ही टूट जाना अवश्यंभावी होता रहा है। कांग्रेस इस स्थिति को कभी समझ नहीं पाई! कांग्रेस ने हमेशा सदाशयताओं के पुल के पायों खड़ी करने की कोशिश की! हुआ क्या! हर कोशिश के साथ कांग्रेस वैचारिक जमीन खोती गई और आरएसएस इस जमीन पर अपनी विचारधारा की वैधता का दावा करती रही है! अब जबकि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जवाहरलाल नेहरू के शासन का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है, कांग्रेस को समझना चाहिए कि उस के साथ हुआ क्या है।
संवेदनशील बुजुर्ग बुद्धिजीवी भी भाजपा आरएसएस के बहुआयामी संबंधों में ताना-तनी पर गहराई से गौर कर रहे हैं। वे इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिकूल टिप्पणी को उचित नहीं मान रहे हैं। कांग्रेस के नेता और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खरगे का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कागजपत्तर मांग दिया है। बुजुर्ग बुद्धिजीवी के अनुसार प्रियांक खरगे का यह कदम ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ नहीं है। उन के अनुसार, इस समय आरएसएस को किसी भी तरह की असुविधा में डालना भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक मददगार होना है! यानी, साफ-साफ शब्दों में वे स्थापित करते हैं कि इस समय भाजपा और आरएसएस की भीतरी लड़ाई में आरएसएस पर हमलावर होना भाजपा को मजबूत करता है। कुल-जमा यह कि इस समय प्रियांक खरगे का यह कदम भाजपा में मोदी जी की राजनीतिक योजनाओं को आरएसएस के दबाव से बाहर निकलने में मददगार है! आरएसएस को ब्लैकमेल करने के लिए भाजपा के हाथ में झटहा और लबेदा का जुगाड़ देना है। क्या आरएसएस अपने इतिहास के किसी दौर में मॉरल पुलिसिंग की है! दंगा-फसाद, उन्माद, उपद्रव, राजनीतिक उत्तेजना, घात-प्रतिघात, अशांति और अराजकता क्या मॉरल पुलिसिंग के उत्पादक उपकरण हैं! कभी नहीं।
मॉरल ऑथरिटी के बिना मॉरल पुलिसिंग
नीतिविहीन लोगों का परस्पर के नीतिविहीन काम-काज पर नजर रखना कहीं से मॉरल पुलिसिंग नहीं मानी जा सकती है। यह असल में परस्पर में से किसी एक के भी पकड़े जाने से बचाव का भिन्न तरीका होता है। जिस की खुद की कोई मॉरल ऑथरिटी नहीं, उसकी मॉरल पुलिसिंग के हवाले से बात को कौन-सा सुसंगत तार्किक आधार दिया जा सकता है?
इस तरह से विश्लेषण करने के पीछे कोई सुसंगत तार्किक आधार नहीं होता है। मिथ्या कथाओं के तार्किक आधार पर खड़े नैरेटिवों पर भरोसा करके किये गये राजनीतिक विश्लेषण कई बार सुनने-कहने में चित्ताकर्षक और रौशन-खयाल लगते हैं हैं लेकिन अंतिम निष्कर्ष पहुंचते-न-पहुंचते आरती के कपूर के की लौ बूझ जाती है — असर फुर्र हो जाता है!
कभी-कभार ऐसे विश्लेषण खामखयाली से निकलते हैं। खुफियागिरी की शैली के चलते बातचीत की शुरुआत में अच्छा असर भी पैदा करते हैं।
डेटा और एल्गोरिदम युग्मिता डेटावाद के अर्द्धनारीश्वर
सुनने-कहने की इस शैली में अंतर्निहित शुरुआती आकर्षण का दायरा धीरे-धीरे बहुत संकुचित होता चला जाता है और अपना अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाता है। इस समय यानी डिजिटल युग में डेटा और एल्गोरिदम ही ‘सर्वोत्तम असर’ का जनक है, जननी भी! अर्द्धनारीश्वर!
जनक और जननी की इस डिजिटल युग्मिता भारत की सांस्कृतिक संदर्भ में अर्द्धनारीश्वर के रूप में अभिव्यक्त है। डेटा और एल्गोरिदम की युग्मिता राजनीतिक लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य की कहानी भिन्न है, या कहें एक अन्य कहानी है। डेटा और एल्गोरिदम के महाजाल में विस्तार के मिथ्या सुख के झूठे आश्वासन और वास्तविक दुख के निविड़ गोपन के सारे उपाय रहते हैं। डेटावाद में यों ही नहीं डेटा और एल्गोरिदम को इस डिजिटल युग का भगवान कहा गया है!
जो लोग भगवान से दूरी बनाकर जीवनयापन करते आये हैं, डिजिटल गवर्नेंस के युग में, डेटावाद के नये भगवान के ‘डे जीरो’ में उन के सामने जीवनयापन की चुनौती है।
कमाये-घमाये (घाम पसीना) बिना रातों-रात अमीर बन जाने की चाहत में डूबे हुई आबादी में रोजगारहीनता के प्रति रोष ही नहीं है और न ही बेरोजगारी से कोई असंतोष है!
कमाना-घमाना थोड़ा मुश्किल काम है! श्रम से सपनों का विच्छिन्न हो जाना, श्रम से आनंद का तिरोहित हो जाना डिजिटल युग की सब से बड़ी दुर्घटना है! कोई तो कमायेगा-कमायेगी! या फिर सब-कुछ डेटा कमायेगा और बाकी बचा हुआ काम सेवायोगी कर लेंगे!
जगह-जगह दानपात्र तो रहेगा ही। हर स्तर पर लूटपाट के अवसर होंगे! व्यवस्था के रंध्र-रंध्र से रिसाव होता रहेगा — जिसकी जितनी लंबी जीभ! अधिक लंबी हुई तो काटी भी जा सकती है! क्या? जीभ, और क्या!
डेटावाद और डिजिटल युग के भगवान के हथियार और औजार से बने डेटा और एल्गोरिदम के बुने दूषित कल्पनाओं के महाजाल और माया-जाल के सांस्कृतिक उपादान और हिंदुत्व की राजनीति की सुपरिचित सोच और अप्रोच के साथ लोकतंत्र के राजनीतिक यथार्थ का सामना करना, लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतकर सत्ता हासिल करना, डिजिटल युग के डेटा और एल्गोरिदम के महाजाल तथा सांस्कृतिक माया-जाल से लोगों को बाहर निकालना राम-रावण युद्ध में शक्ति के आशीर्वाद के बिना रावण को पराजित करने जैसा है; याद किया जा सकता है बीच युद्ध में राम की शक्ति पूजा का संदर्भ।
नेता स्क्रीन पर, जनता जमीन पर! अब यही लोकतंत्र है!









