July 30, 2026
#Opinion

क्या भारतीय लोकतंत्र में अब सत्याग्रह की परंपरा के लिए कोई स्थान नहीं?

सोनम वांगचुक के आमरण अनशन को 16 दिन से अधिक बीत चुके हैं और उनकी सेहत लगातार चिंताजनक बताई जा रही है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकार इतनी संवेदन हीन हो चुकी है की अनशनकारियों को जंतर मंतर पर मरने के लिए छोड़ दिया गया है!

लोकतंत्र संसद, सरकार और संविधान के साथ-साथ जनता की आवाज़ों से भी बनता है। धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह, अनशन, ट्रेड यूनियन, छात्र आंदोलन, दबाव समूह और सिविल सोसायटी—ये सभी लोकतंत्र की आवाज़े हैं। लोकतंत्र का अर्थ ही है “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन।” यदि जनता की शांतिपूर्ण आवाज़ें ही अनसुनी कर दी जाएं, तो लोकतंत्र का अर्थ ही क्या है!

जालिम अंग्रेजी सरकार ने भी नहीं दिखाई थी इतनी संवेदनहीनता!

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा नैतिक हथियार सत्याग्रह था। महात्मा गांधी ने अनेक बार आमरण अनशन का सहारा लिया। ब्रिटिश सरकार उनकी हर बात से सहमत नहीं होती थी, लेकिन वह स्थिति को इस स्तर तक नहीं पहुंचने देती थी कि गांधीजी की मृत्यु अनशन के कारण हो जाए। बातचीत होती थी, मध्यस्थता होती थी और किसी न किसी समाधान की कोशिश की जाती थी।

इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण 1932 का पूना पैक्ट है। जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने ‘सांप्रदायिक पंचाट’ के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की घोषणा की, तब गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके स्वास्थ्य के बिगड़ने पर पूरे देश में चिंता फैल गई। मदन मोहन मालवीय, डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य नेताओं के बीच गहन वार्ता हुई। अंततः एक समझौता हुआ, जिसे इतिहास में पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। इसके बाद गांधीजी ने अपना अनशन समाप्त किया। यह उदाहरण बताता है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद और समाधान की परंपरा जीवित थी।

आज का प्रश्न यह है कि क्या वह परंपरा समाप्त हो चुकी है?

स्वतंत्र भारत में भी सरकारें आमरण अनशन को केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं मानती रही हैं। कई बार उन्होंने बातचीत और समझौते का रास्ता अपनाया है। 2011 में अन्ना हज़ारे के 13 दिन के अनशन के दौरान सरकार ने उनकी मांगों पर संसद में चर्चा कराई। अंततः बातचीत के बाद उन्होंने नारियल पानी और शहद पीकर अपना अनशन समाप्त किया। 2018 में भी सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने अपना अनशन तोड़ा।

दूसरी ओर, जब सरकारों ने आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया और उनके जीवन पर खतरा उत्पन्न हुआ, तब चिकित्सा हस्तक्षेप का रास्ता अपनाया गया। इसका सबसे लंबा उदाहरण इरोम शर्मिला हैं, जिन्होंने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के विरोध में 16 वर्षों तक अनशन किया। उन्हें अस्पताल में न्यायिक हिरासत में रखकर नाक के माध्यम से तरल आहार दिया जाता रहा ताकि उनकी जान बचाई जा सके। ब्रिटिश शासन के दौरान भी भगत सिंह और अन्य राजनीतिक बंदियों की भूख हड़ताल के दौरान जबरन भोजन कराए जाने के उदाहरण मिलते हैं।

यानी इतिहास बताता है कि सरकारें आमतौर पर दो रास्ते अपनाती रही हैं—या तो संवाद और समझौता, या फिर चिकित्सा हस्तक्षेप के माध्यम से आंदोलनकारी का जीवन बचाना। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति को अनशन पर मरने के लिए छोड़ देना सामान्य परंपरा नहीं रही है।

सोनम वांगचुक देश की बौद्धिक संपदा !

सोनम वांगचुक कोई साधारण आंदोलनकारी नहीं हैं। वे एक शिक्षाविद्, नवोन्मेषक और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित व्यक्तित्व हैं। दुनिया के कई देश उनके अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ लेना चाहते हैं। यदि वे चाहते, तो विदेशों में सम्मान और सुविधाओं के साथ जीवन बिता सकते थे। लेकिन उन्होंने अपने देश, विशेषकर लद्दाख, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के मुद्दों को उठाने का रास्ता चुना।

यही कारण है कि उनका जीवन केवल उनका निजी विषय नहीं रह जाता। जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक हित के प्रश्नों पर अपने प्राणों को दांव पर लगा देता है, तब समाज और राज्य—दोनों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि उससे संवाद करें, उसकी बात सुनें और कम से कम उसके जीवन की रक्षा सुनिश्चित करें।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सत्याग्रह अब लोकतंत्र का प्रभावी हथियार नहीं रहा, या फिर हम ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां लोकतांत्रिक आवाज़ों की नैतिक शक्ति लगातार कमजोर होती जा रही ।

क्या हमारी कोई सामूहिक जिम्मेदारी नहीं! सोनम वांगचुक को बचाना इस देश की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर हम में कोई सामूहिक चेतना बची है तो हमें इस जिम्मेदारी को उठाना होगा, क्योंकि यह संवेदन शून्य सरकार कुछ नहीं करेगी… बौद्धिक संपदा से इसका कोई लेना देना नहीं …आंदोलन और लोकतांत्रिक अधिकारों की कोई परवाह नहीं..