विपक्ष को राहुल गांधी को नेता मानना होगा
राहुल गांधी को नेता नहीं माने तो मोदी को हटाना नामुमकिन है
धनंजय कुमार

हक़ीक़त क्या है ये गांधी की हत्या के प्रसंग और दूसरे धर्मों और गैर सवर्ण जातियों के प्रति उनके नफ़रत भरे विचार और व्यवहार समझ सकते हैं. आप सामान्य समझ के व्यक्ति हैं तो मोदी के 12 साल के कार्यकाल से समझ सकते हैं. और अगर तब भी समझ में न आये तो आप संघी हैं मान लीजिये, थेथरई मत कीजिये.

ममता बनर्जी की पार्टी टूट गयी और टूट कर अलग हुए लोग भाजपा के साथ गलबहियां कर बैठे ! कई साथी इसके लिए राहुल गांधी को दोषी मान रहे हैं. कुछ ममता और अभिषेक के तानाशाही रवैये और हार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. कुछ भाजपा की राजनीति से अभिभूत हुए जा रहे हैं. कुछ उन सांसदों-विधायकों की भी तारीफ़ कर रहे हैं, जो हार से उपजे संकट को देखते ही पाला बदल लेने में समय नहीं लगाया.
सत्ता और व्यक्तिगत लाभ की लालसा आज की राजनीति की ज़रुरत बन गयी है. सिद्धांत और आम आदमी के लिए राजनीति अब बीते ज़माने की बात है. इतिहास में ही देखने पढ़ने को मिलती हैं. हालांकि, उस पर भी कीचड़ उछालने और उछालते रहने की बड़ा अभियान चला हुआ है. विडम्बना यह कि बड़े बड़े बुद्धिजीवी भी इस अभियान में लगे हैं.
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बीजेपी और उसके माता पिता हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक का तो जन्म ही कीचड़ उछालने के लिए हुआ है. भारतवर्ष और भारतीय धर्म संस्कृति के एकलौते रक्षक और पालक के तौर पर ख़ुद को देखते मानते और मनवाते हैं. हक़ीक़त क्या है ये गांधी की हत्या के प्रसंग और दूसरे धर्मों और गैर सवर्ण जातियों के प्रति उनके नफ़रत भरे विचार और व्यवहार समझ सकते हैं. आप सामान्य समझ के व्यक्ति हैं तो मोदी के 12 साल के कार्यकाल से समझ सकते हैं. और अगर तब भी समझ में न आये तो आप संघी हैं मान लीजिये, थेथरई मत कीजिये.
वो तमाम लोग जो बीजेपी से लड़ने के लिए कांग्रेस से अलग रास्ता तलाश रहे हैं, वे बड़ी भूल कर रहे हैं. लोहियावादियों का हश्र क्या हुआ है, आप देख चुके हैं, कांग्रेस से लड़ते-लड़ते बीजेपी और संघ यानी फासीवादियों को मज़बूत कर बैठे. अब कहाँ हैं लोहियावादी ? वामपंथी दलों का भी वही हाल हुआ दिख रहा है. पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और इस साल केरल. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सहारे वामपंथियों को निबटाया, तो त्रिपुरा में दिल्ली की सत्ता की वजह से. केरल में बचे इसलिए हैं अभी तक कि कांग्रेस दुबारा मज़बूती से खड़ी हो गयी है.
देश की आज़ादी को 75 साल से अधिक हो गए, इस बीच सारी विचारधारों को कहीं न कहीं सत्ता में आने का अवसर मिला, लेकिन इन 75 सालों पर अगर दृष्टि डालते हैं, तो पाते हैं कि तमाम मानवीय और राजनैतिक विसंगतियों के बावजूद कांग्रेस सबसे बेहतर है. हालांकि,अम्बेडरवादियों से लेकर समाजवादियों, वामपंथियों और दक्षिणपंथियों तक कांग्रेस को नुक़सान करने का किसी ने कोई अवसर नहीं छोड़ा. और हालत ये रही कि कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर में पहुँच गयी. मात्र 44 सीट पर आ गयी. मोदी ताकतवर नेता के तौर पर उभरे. इस बीच अरविन्द केजरीवाल लोगों को विकल्प के तौर पर दिखे. लेकिन आज केजरीवाल कहाँ हैं ?
2024 के चुनाव में मोदी कमजोर पड़े- बहुमत तक नहीं पहुँच पाए तो इसलिए कि कांग्रेस मज़बूत हुई. हालांकि, कई लोग अब भी मानते हैं कि सपा, TMC और DMK की वजह से मोदी बहुमत से दूर रहे. सच अब सामने है. DMK हार गयी, ममता हार गयीं. ममता तो अपनी पार्टी भी गँवा बैठी दिख रही हैं.
इंडिया गठबंधन की अचानक बैठक इसीलिए हुई कि ममता बनर्जी को टूटने से बचाना है और ये कांग्रेस की पहल पर हुआ. कलतक यही ममता इंडिया गठबंधन में होते हुए भी एक नहीं बनने दीं. इनके और केजरीवाल की वजह से नीतीश कुमार गठबंधन से बाहर चले गए और 2024 का चुनाव हार कर भी मोदी जीत गए. नीतीश ने किसको मज़बूत करने के लिए गठबंधन के लिए पहल की थी, नरेन्द्र मोदी को ? तब भी अखिलेश और तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव तीसरा मोर्चा बनाने में जुटे थे, नीतीश ने तब कहा था कि बीजेपी के ख़िलाफ़ कोई भी मोर्चा कांग्रेस के बिना नहीं बन सकता. लेकिन राहुल गांधी के माध्यम से कांग्रेस विरोधियों ने नीतीश को ही बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया. नीतीश न सिर्फ़ बाहर गए, मोदी की बाहों में समा गए. नतीजा क्या हुआ, कांग्रेस और उनके कथित साथी जीतकर भी हार गए. मोदी को हटा नहीं पाए.
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अब विपक्ष में अखिलेश यादव आख़िरी पोल के तौर खड़े हैं, लेकिन क्या वह कांग्रेस के बिना खड़े रह सकते हैं ? लेकिन विडम्बना ये है कि आज भी विपक्ष के लोग राहुल को नेता मानने को तैयार नहीं है. वे चाहते हैं राहुल की जगह कोई और कमान सभाले ? शरद पवार हों या ममता बनर्जी या कांग्रेसी भी आज भी राहुल को नेता मानने को तैयार नहीं हैं. अशोक गहलोत का हालिया बयान उसकी बानगी है. लेकिन सवाल ये है कि क्या गांधी के बिना कांग्रेस खड़ी रह पायेगी ?
राहुल गांधी तो बिना कांग्रेस भी खड़े रह गए. 44 से खींचकर पार्टी को 100 के करीब ला दिया. लेकिन कांग्रेसी क्या कर रहे हैं ? खासकर पुराने और सीनियर कांग्रेसी. राहुल को नेता मानकर पार्टी को धार और सही राह दिखाने की बजाय कांग्रेसी अब भी राहुल को नेता मानने को तैयार नहीं हैं और जब तब बीजेपी को मज़बूत कर दे रहे हैं.
अब सोचना राहुल गांधी और कांग्रेस को है. क्या राहुल के बिना कांग्रेस बची रह पायेगी और क्या इंडिया गठबंधन मोदी को पछाड़ पायेगा ?
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