June 13, 2026
#Opinion

मीडिया जान ले — आगे खतरा है!

क्या एक ईमानदार पत्रकार के लिए मुख्यधारा की मीडिया में यकीनन कोई जगह नहीं? क्या चापलूसी, झूठ और कुतर्क ही पत्रकारिता है अब? क्या मीडिया सत्ता का सुरक्षा कवच है? कुछ लोग जो सामाजिक सरोकार, नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की तिलांजलि नहीं दे पाए वो वैकल्पिक आयाम खोजने लगे. तकनीकी क्रांति ने संचार माध्यम की नई दुनियां रच दी. यूं -ट्यूब ने पत्रकारिता के जुनून को जगह दी. विचार और सूचना के नए घोसले बनने लगे. अलटरनेटिव मीडिया ने न सिर्फ अपना अस्तित्व गढ़ा, उसने मुख्यधारा की मीडिया को जबरदस्त चुनौती दी.

किसने सोचा था बहस इस बात पर होगी कि मीडिया के पतन के दास्तान पूरी शिद्दत से बयां करने के लिए कौन सा शब्द उपयुक्त है. कोई “गोदी मीडिया” कहता है कोई “डॉगी मीडिया”, कोई “दलाल मीडिया”. कोई मीडिया कहने को ही तैयार नहीं. सरकारी तंत्र का हिस्सा मानते हैं बहुत लोग. कोई विरोध भी नहीं करता. आत्म-स्वाभिमान, नैतिकता, दिव्य चेतना का दंभ… सब ख़त्म. जैसे खामोश स्वीकृति हो कि हाँ सब बरबाद हो गया. पाश कि वो पंक्तियाँ याद आती है, “आदमी का भी कोई जीना है/ अपनी उम्र कव्वे या सांप को बख्शीश में दे दो”.

क्या एक ईमानदार पत्रकार के लिए मुख्यधारा की मीडिया में यकीनन कोई जगह नहीं? क्या चापलूसी, झूठ और कुतर्क ही पत्रकारिता है अब? क्या मीडिया सत्ता का सुरक्षा कवच है? कुछ लोग जो सामाजिक सरोकार, नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की तिलांजलि नहीं दे पाए वो वैकल्पिक आयाम खोजने लगे. तकनीकी क्रांति ने संचार माध्यम की नई दुनिया रच दी. यू -ट्यूब ने पत्रकारिता के जुनून को जगह दी. विचार और सूचना के नए घोसले बनने लगे. अलटरनेटिव मीडिया ने न सिर्फ अपना अस्तित्व गढ़ा, उसने मुख्यधारा की मीडिया को जबरदस्त चुनौती दी.

लोग मुख्यधारा की मीडिया से दूर हटने लगे. “मैं न्यूज़ चैनल नहीं देखता” — यह एलान गर्व से किया जाने लगा. कुछ न्यूज़ पोर्टल, स्वतंत्र पत्रकार और यू-ट्यूब चैनल्स क्रेडिबिलिटी और ट्रस्ट के मामले में स्थापित संस्थानों से बहुत आगे निकल गए. ज़मीनी हकीकत क्या है, यथार्थ क्या है — इसकी खोज वैकल्पिक मीडिया में होने लगी. टीवी के समाचार सरकारी प्रचार माध्यम की  तरह देखे जाने लगे. सरकार की चापलूसी करना, विपक्ष को बदनाम करना और आलोचकों को डराना टीवी के मशहूर एंकरों का पेशा बन गया.

महज पत्रकारीय मूल्यों का छरण हुआ ऐसा नहीं, नई जिम्मेदारी ली गई न्यूज़ चैनल्स द्वारा — सरकारी संरक्षक की जिम्मेदारी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार और सहयोगी, भाजपा के प्रवक्ता और नेता, जितने प्रतिबद्धता से सरकार का बचाव नहीं कर पाते उससे ज्यादा चौकीदारी टीवी एंकरों ने शुरू कर दी. यह कोई राज़ नहीं. सब जानते हैं इस बात को. वो फ़िल्मी गाना था न — खुल्लम-खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों — वैसा माहौल बन गया. दुष्यंत कुमार ने लिखा है – “हाथों में अंगारे लिए सोच रहा था, कोई मुझे अंगारों कि तासीर बताये.” ये बेचैनी ख़त्म थी. सब जानते थे तासीर. पत्रकारों के बीच भी कोई दुविधा नहीं रही. सब वाकिफ थे इस सच्चाई से. किसी ने अपना अलग रास्ता बना लिया, किसी ने ख़ामोशी से हथियार डाल दिए.

सवाल सिर्फ मीडिया के पतन तक सीमित नहीं. मीडिया का टूट जाना भारत के लोकतंत्र को कमज़ोर कर रहा था. धीरे-धीरे राजनीति ऐसे मक़ाम पर आ गई कि लोकतंत्र को पहचाना न जा सके. चुनाव हो रहे थे पर सारे विपक्ष और मतदाताओं के एक बड़े तबके को यकीन था धोखाधड़ी हुई, फरेब से लूटा गया जनादेश. पर मीडिया ने चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं उठाया. न्यायपालिका ने अपना काम सही से नहीं किया पर मीडिया चुप रही.  भ्रस्टाचार के मुद्दे भी विरोधियों तक सीमित कर दिए गए. ईडी-सीबीआई रिमोट-कंट्रोल्ड मशीन कि तरह विरोधियों और आलोचकों पर आक्रमण करती रही. पर मीडिया ढोल बजाती रही. सरकार पर सवाल उठाना देशद्रोह बताया गया. जैसे तानाशाही लोकतंत्र के लिबास में घूम रही हो.

संवाद और विचार को बाजार की शक्तियां प्रभावित करती हैं, यह कोई नई बात नहीं. लेकिन पत्रकार सत्ता द्वारा बनाये गए प्रोडक्ट का हॉकर बन कर रह जाये, यह गंभीर संकट है. अब संवाद कि दिशा और कंटेंट तय करने में पत्रकार की कोई भूमिका नही. पत्रकार बस फेरीवाला है, ठेले लगा कर सरकारी माल बेच रहा है. विचार, सोच, प्रतिबद्धता, जिज्ञासा, समस्या, समाधान… सब कुछ एक फिनिश्ड प्रोडक्ट के रूप में सत्ता तैयार करती है और पत्रकार उसका डिलीवरी एजेंट है. पत्रकार कभी कठपुतली है कभी विपक्ष पर हमले करने वाला हथियार. पत्रकार सोच-मुक्त यंत्र है, विवेकवान मुनष्य नहीं. यह हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, मोदी ने एक साक्षात्कार में कहा था उनकी सबसे बड़ी नाकामी थी कि वो मीडिया पर कंट्रोल नहीं कर पाए. प्रधानमंत्री बन कर उन्होंने अपनी सबसे बड़ी नाकामी को सबसे बड़ी कामयाबी में बदल दिया. उन्होंने मीडिया पर ऐसा कब्ज़ा जमाया जैसे मदारी का बंदर पर होता है. दोनों एक दुसरे के पार्टनर बन बन गए.

दरअसल मीडिया पर कंट्रोल की चाहत समाज पर कंट्रोल की चाहत है. मोदी ने इसमें सफलता पाई. लेकिन समाज पर कंट्रोल आसान नहीं. समाज बहकावे में आ तो जाता है पर सच्चाई जानने के बाद नशा उतरता है. महंगाई और  बेरोज़गारी का दंश उसे सोचने पर मज़बूर करता है. साम्प्रदायिक तनाव की परेशानियां समाज को शांति और सौहाद्र के लिए बेचैन करती है. यह प्रक्रिया दस-बारह सालों में पूरी हो गई. अब जनता छुटकारा चाहती है. छल से छुटकारा, झुठ-फरेब से मुक्ति. उसने देख लिया अच्छे दिन की हकीकत. उसने झेल लिया “बहुत हुई महंगाई कि मार अबकी बार मोदी सरकार” का फरेब. अब उसे हिन्दू-मुस्लमान का अफीम मजा नहीं देता. अब वह नार्मल राजनीति चाहता है. अब उसे मोदी की बादशाहत नहीं, अपने भविष्य की फ़िक्र है. उसे यह भी मंज़ूर नहीं उसके वोट की कोई कीमत न रहे. उसे लोकतंत्र के कराहती आत्मा पर दर्द होता है।

पर मीडिया कहाँ है? वहीँ गोदी में. वहीँ चाटूकारता और बेशर्मी के नाले में. वो “अबकी बार चार सौ पार” का राग अलापता रहा. धम्म से ज़मीन पर गिरा. फिर हरियाणा और महाराष्ट्र में सांसे मिली. उठ गया. बंगाल में भाजपा की जीत नें उसे यकीन दिलाया सत्ता चलती रहेगी. समाज से क्या मिलेगा? लोकतंत्र से हमारा क्या? लेकिन एक जागृत जनता और मृत मीडिया वैसी हारमोनी नहीं बना सकता जो सरकार को खुश कर सके. संघर्ष बढ़ेगा. जनता को विपक्ष की ज़रुरत होगी. राजनीति बदलेगी. उस बदलाव के बाद यह मीडिया अपना स्पेस कहाँ ढूंढेगा?

यह एक खतरनाक सवाल है. सीधे, आसान सवाल को दबाओगे तो सवाल खतरनाक हो जाते हैं. मीडिया जान ले — आगे खतरा है. मीडिया के लिए खतरा. क्योंकि इलज़ाम इस बार ये नहीं कि सब चापलूस हो गए. इलज़ाम ये है कि लोकतंत्र के हत्या की साज़िश में शामिल हो गए. लोकतंत्र की हत्या? मीडिया जान ले — आगे खतरा है!

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