बुलडोजर नीति की राजनीति में झाल मुड़ी
प्रफुल्ल कोलख्यान

स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल के समसामयिक राजनीतिक घटनाक्रम और 2026 के विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद राज्य की राजनीति एक बेहद दिलचस्प और अभूतपूर्व मोड़ पर आ खड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के हालिया संकट और ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
2026 के चुनावों के बाद, पश्चिम बंगाल में भाजपा की कार्यशैली में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। यह बुलडोजर नीति का झाल मुड़ी दौर है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के पद पर जवाहरलाल नेहरू की पदासीनता का रिकॉर्ड तोड़ देने के जश्न में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ‘शुद्ध अंतःकरण’ से झाल मुड़ी अर्पित किया। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से जिस तरह झाल मुड़ी का राजनीतिक इस्तेमाल किया था — याद किया जाना चाहिए।
वीडियो देखें
बुलडोजर नीति के झाल मुड़ी दौर को आक्रामक राजनीतिक घेराबंदी कहा जा रहा है। यह दरअसल भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है जो उसने उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में अपनाई है— यानी प्रशासनिक सख्ती, वित्तीय नियंत्रण और भ्रष्टाचार के आरोपों पर कड़ी कार्रवाई। यानी भाजपा पश्चिम बंगाल से प्रेरणा लेते हुए पार्टी सोसाइटी को सत्ता सोसाइटी में बदलने और लोकतंत्र के लिए जरूरी सिविल सोसाइटी की जमीन खा जाने की राह पर बेरोक-टोक सरपट दौड़ रही है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में करारी हार के बाद ममता बनर्जी की राजनीति को भारतीय जनता पार्टी की तरह से राजनीतिक दुर्भावनाओं के बड़े झटके लग रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी की बुलडोजर नीति के झाल मुड़ी दौर में तृणमूल कांग्रेस के पांव उखड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी के पास दो ही विकल्प बचे हैं — अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में शामिल हो जाए या फिर भारतीय जनता पार्टी में समा जाए।
वीडियो देखें
स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल के समसामयिक राजनीतिक घटनाक्रम और 2026 के विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद राज्य की राजनीति एक बेहद दिलचस्प और अभूतपूर्व मोड़ पर आ खड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के हालिया संकट और ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से राजनीतिक ध्रुवीकरण की आक्रामक प्रवृत्ति रही है। सार्वजनिक जीवन में किसी अ-राजनीतिक व्यक्ति को अपने-पराये के रूप में चिह्नित करने का काम उसके वास्तविक या काल्पनिक रुझान से ही तय होता है। गैर-राजनीतिक लोगों के छोटे-बड़े कारोबार और रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार और आचरण भी राजनीतिक रुझान से अपने-आप बिगड़ने-बनने लगता है। यहां तक कि शादी-ब्याह जैसे मामलों में सार्वजनिक कार्यक्रमों के आमंत्रण-निमंत्रण, साध-अपराध के निर्धारण में भी राजनीतिक रुझान का ख्याल रखा जाता है। ऐतिहासिक कारणों से, पश्चिम बंगाल में सत्ता के वर्चस्व की छाप सभी स्तर पर दिखती रही है। प्रसंगवश, यह कहना जरूरी है कि पार्टी सोसाइटी लोकतांत्रिक सत्ता कब्जियाने के बाद सत्ता सोसाइटी में बदल जाती है और कुल मिलाकर यह कि सिविल सोसाइटी की जगह खा जाती है।
हालांकि, 2026 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को मिली करारी शिकस्त और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आक्रामक रुख ने राज्य में एक नए राजनीतिक युग और सत्ता सोसाइटी के वर्चस्व की शुरुआत कर दी है। जाहिर है कि नई सत्ता सोसाइटी के बनते हुए वर्चस्व के दौरान ममता बनर्जी के लिए अपनी पार्टी को राजनीतिक रूप से टिकाये रखना बहुत मुश्किल है। तृणमूल कांग्रेस की पार्टी सोसाइटी को टिकाने के लिए कोई सिविल सोसाइटी आज है ही नहीं। सत्ता पर वर्चस्व के अभाव से टीएमसी के सामने अस्तित्व का संकट है। और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा और समझ स्वाभाविक रूप से यह है कि ममता बनर्जी को राजनीतिक वर्चस्व नहीं, राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए कोई बड़ा कदम उठाना होगा — अस्वाभाविक राजनीतिक समय में अस्वाभाविक राजनीतिक कदम! कहना न होगा कि वह अस्वाभाविक और बड़ा कदम कांग्रेस के राजनीतिक फोल्ड में आकर राजनीतिक रक्षा कवच हासिल करना ही दिखता है।
वीडियो देखें
सीधे-सरल तरीके से कहा जाए तो यह कि क्षत्रपों को भी इस समय बड़े राजनीतिक छाता की तलाश है। यह बिल्कुल अस्वाभाविक राजनीतिक समय है इस समय जन-प्रतिनिधियों के भरोसे लोकतंत्र की सुरक्षा को नहीं छोड़ा जा सकता है और जनता का हस्तक्षेप जरूरी है। भारत के संविधान, लोकतंत्र और देश के राजनीतिक ढांचों के प्रति संवेदनशील लोगों को कांग्रेस के छाता के नीचे आ जाना चाहिए, राजनीतिक दलों को कांग्रेस के साथ खड़ा होना चाहिए।
रही बात ममता बनर्जी की तो उन्हें उसी तरह अपने घर लौट आना चाहिए जिस तरह से कोविड के दौर में लाखों लोग जीवन सुरक्षा के लिए अपने गांव-घर लौटे थे। बिना किसी देरी के, शुरुआत कांग्रेस के संसदीय दल में तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल को मिलकर दलबदल के दबाव का सटीक मुकाबला करना चाहिए। संपूर्ण संगठन के राजनीतिक विलय की प्रक्रिया भी ईमानदारी से करने की पहल हो यह जरूरी है। बुलडोजर नीति की राजनीति में झाल मुड़ी का जवाब यहां से निकल सकता है।
यह भी पढ़ें






