दहाड़ती हुई सत्ता की राजनीति और गिड़गिड़ाता हुआ जनता का लोकतंत्र
दहाड़ती राजनीति और गिड़गिड़ाता लोकतंत्र और बदहाल जनजीवन हमारे समय की खामोश सच्चाई है। कभी इस नाम पर, कभी उस नाम पर साधारण और असंगठित लोगों पर संगठित लोगों का निरंतर हमला हो रहा है। असंगठित, साधारण और शक्तिहीन लोगों की जिंदगी के हकीकत चाहे जो हों उन की सांस को सुलगाकर संगठित, सत्तावान और शक्तिशाली लोगों के लिए आशीर्वाद का दीया जलाया जाता है। दहाड़ती हुई राजनीति और गिड़गिड़ाता हुआ लोकतंत्र हमारे समय की सब से बड़ी ही नहीं सब से बुरी सच्चाई है।
गिड़गिड़ाते हुए लोकतंत्र की गुणवत्ता का सवाल
लोकतंत्र की बेहतर गुणवत्ता के लिए बेहतर जन-प्रतिनिधि का होना बहुत महत्वपूर्ण होता है। बेहतर जन-प्रतिनिधि के लिए चुनाव प्रक्रिया का बेहतर होना जरूरी है। बेहतर चुनाव प्रक्रिया का सब-कुछ तो नहीं, लेकिन बहुत-कुछ निष्पक्ष और ईमानदार चुनाव आयुक्त पर निर्भर करता है। निष्पक्ष और ईमानदार चयन प्रक्रिया के माध्यम से ही निष्पक्ष और ईमानदार चुनाव आयुक्त का चयन हो सकता है। यह सच है कि निष्पक्षता और ईमानदारी कानून का उत्पाद नहीं बल्कि व्यक्तित्व का गुण होता है। कानून व्यक्ति के चरित्र के इस गुण का सहारा देता है। निष्पक्ष और ईमानदार व्यक्तित्ववाले या व्यक्तित्ववाली की नियुक्ति हो इस के लिए बहुत सावधानी की खास जरूरत होती है। जीवन का लगभग सर्वमान्य सिद्धांत है — इस हाथ ले, उस हाथ दे। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चयन समिति के गठन की एक प्रक्रिया के लिए संसद से कोई कानून नहीं बना लिया जाता है तब तक के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित कर दी थी। इस चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के होने का प्रावधान था। सरकार ने तत्काल कानून बना लिया। होशियारी यह कि प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के नाम तो चयन समिति में रहने दिया लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री के द्वारा चिह्नित मंत्री का प्रावधान कर दिया। इस पूरी प्रक्रिया के बारे में बताओ साथ-ही-साथ यह भी कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया का चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ा है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(2) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, “संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन”। संविधान लागू होने के बाद लगभग 73 साल तक संसद ने इस विषय पर कोई विस्तृत कानून नहीं बनाया। इसलिए नियुक्ति व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका की सलाह पर होती रही।
सुप्रीम कोर्ट का 2 मार्च 2023 का फैसला (अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ) पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए जरूरी है। कानून के अभाव में अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत अंतरिम व्यवस्था दी — जब तक संसद कानून नहीं बनाती, नियुक्ति राष्ट्रपति उस चयन समिति की सलाह पर करेंगे जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों।
इसका उद्देश्य कार्यपालिका का एकतरफा नियंत्रण कम करना था। यह व्यवस्था स्थायी नहीं थी; संसद को कानून बनाने की छूट दी गई थी। सरकार ने होशियारी से काम लिया! दिसंबर 2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 पारित किया। राष्ट्रपति की सहमति 28 दिसंबर 2023 को मिली और यह 2 जनवरी 2024 से लागू हुआ। नए कानून में चयन समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के होने के प्रावधान हैं।
मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुना गया मंत्री आ गया। इससे समिति में सरकार के दो सदस्य और विपक्ष का एक सदस्य हो गया। चयन समिति के सदस्य के रूप में पक्ष और विपक्ष का प्रावधान तो है, लेकिन निष्पक्ष के लिए कोई जगह नहीं बची है। निष्पक्ष और ईमानदार होने की उम्मीद उस से जिस की नियुक्ति में सत्ता पक्ष की दोहरी ताकत और विपक्ष के लिए तो कोई जगह नहीं है, निष्पक्ष की कोई जगह नहीं।
इस के साथ ही ध्यान देने लायक है कि ध्यान देने लायक है कि एक सर्च कमेटी का भी प्रावधान है। इस सर्च कमेटी में विधि मंत्री की अध्यक्षता में सचिव स्तर के दो अधिकारी पांच नामों का पैनल तैयार करती है। हालांकि चयन समिति पैनल के बाहर के नाम भी विचार कर सकती है।
मार्च 2024 में इसी प्रक्रिया से ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए। उस समय चयन समिति में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी थे। विपक्षी सदस्य ने प्रक्रिया की जल्दबाजी और नाम पहले न दिए जाने पर असहमति नोट दिया था। इस कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लंबित हैं। अदालत ने कानून पर रोक नहीं लगाई। चुनावों पर पड़नेवाले प्रभाव पर सरकारी पक्ष का कहना है कि संविधान के अनुसार संसद को कानून बनाने का अधिकार है। पहले तो प्रधानमंत्री की सलाह पर ही नियुक्तियां होती थीं। सरकारी पक्ष की बात तथ्यात्मक होने के बावजूद स्वीकार्य नहीं लगती है क्योंकि पहले जो होता था, उस के आधार पर आगे भी उसी के होने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है — विगत के आधार पर सभ्य समाज अपने भविष्य के क्रियाकलाप निर्धारित नहीं करता है।
दहाड़ती हुई सत्ता की राजनीति और संविधान के सवाल
पर्याप्त कारणों के साथ इसे संवैधानिक रूप से से सही होने के बावजूद व्यावहारिक रूप से से सही नहीं कहा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में न्यायिक संतुलन (एक सरकारी, एक विपक्षी, एक न्यायिक) चाहा था, उस संतुलन को जानबूझकर तोड़ देना संवैधानिक प्रावधानों का स्पष्ट दुरुपयोग और लोकतंत्र का दुखद प्रसंग है। क्योंकि दो-एक बहुमत से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ गया। 2024 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जल्दबाजी में नियुक्तियां होने से भी आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठे। कुछ सर्वेक्षणों और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर भरोसे में गिरावट की बात बार-बार उठाई जाती रही है। ईवीएम, मतदाता सूची और मतगणना जैसे विवाद भी भरोसाहीनता के इसी वातावरण में निष्पक्ष और ईमानदार चुनाव प्रक्रिया संदिग्ध हो जाती है।
व्यावहारिक रूप से 2024 के आम चुनाव इसी आयोग के अधीन हुए और परिणाम घोषित हुए। लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया पर बहस जारी है क्योंकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतंत्र की गुणवत्ता से सीधे जुड़ी है। कानून व्यक्ति के चरित्र की जगह नहीं ले सकता, लेकिन चयन की संरचना उस चरित्र को सामने लाने या दबाने में भूमिका निभाती है। यही इस पूरे विवाद का मूल है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का मतलब यह है कि आयोग सरकार, सत्ताधारी दल या किसी राजनीतिक दबाव के बिना चुनावों का संचालन कर सके। संविधान इसे संस्थागत रूप से सुरक्षित करने की कोशिश करता है, लेकिन नियुक्ति, कार्यकाल और व्यावहारिक आचरण तीनों पर बहस चलती रहती है।
बहुत गंभीर सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर संविधान क्या कहता है! अनुच्छेद 324 कहता है कि चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण चुनाव आयोग में निहित करता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही हटाया जा सकता है — सिद्ध कदाचार और अक्षमता पर, संसद के दोनों सदनों के दो तिहाई बहुमत से। सब से बड़ी बात, नियुक्ति के बाद सेवा शर्तें उनके नुकसान में नहीं बदली जा सकतीं।
ये प्रावधान कार्यकाल की सुरक्षा देते हैं। लेकिन चुनाव आयुक्तों की निष्पक्ष और ईमानदार भूमिका सिर्फ पद मुक्ति की कठिनाई से सुनिश्चित हो जाती है। यह सब इस पर भी निर्भर करता है कि व्यक्ति कैसे चुना गया और वह पद पर कैसे व्यवहार करता है। लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं का लंबित रहना बताया के लोकतंत्र का एक अन्य दुफंसिया स्थिति है — लोकतंत्र की गुणवत्ता में गिरावट है क्योंकि चयन प्रक्रिया में गिरावट है: चयन प्रक्रिया में गिरावट क्यों है, क्योंकि लोकतंत्र की गुणवत्ता में गिरावट है।
उलटा लटका लोकतंत्र और फुसफुसाते हुए लोग
पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान विचाराधीन और तार्किक विसंगति श्रेणी में रखे गए लगभग 27.16 लाख मतदाताओं के नाम न्यायिक जांच के बाद सूची से हटाए गए थे। ये लोग चुनाव में वोट नहीं डाल सके।
चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित अपीलीय ट्रिब्यूनलों ने अपीलों पर फैसला शुरू किया। अगस्त 2026 तक निपटाई गई लगभग 82-83 हजार अपीलों में से 75,443 नाम वापस जोड़े गए (लगभग 91% मामलों में ट्रिब्यूनल ने हटाने का आदेश गलत पाया)। चुनाव के दौरान समय रहते केवल 1,607 नाम ही जोड़े जा सके थे। बाकी बहाली चुनाव के बाद हुई। लाखों अपीलें अभी भी लंबित हैं।
दूसरे सवाल का सीधा-सीधा सीट-वार आंकड़ा — हर सीट पर चुनाव के बाद बहाल किए गए मतदाताओं की संख्या बनाम जीत का अंतर — सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। बहाल किए गए कुल नाम अभी राज्यभर में 75 हजार के आसपास हैं, इसलिए बहुत कम सीटों पर यह संख्या जीत के अंतर से ज्यादा हो सकती है। अनुमान और उपलब्ध कच्चे विश्लेषण के अनुसार, हटाए गए 27 लाख विचाराधीन और तार्किक विसंगति मतदाताओं की संख्या और जीत के अंतर की तुलना करते हैं। उस आधार पर 49 विधानसभा सीटों पर हटाए गए ऐसे मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी (26 बीजेपी, 21 टीएमसी, 2 कांग्रेस)।
निशान गया, नाम गया और लोकतंत्र का नामोनिशान?
पश्चिम बंगाल के लोगों में कहने के अच्छे-बुरे तरीके हैं — फुसफुसाते हुए भी दहाड़ते हुए भी! फिलहाल लोगों का कहना है इस तरह से भाजपा-आरएसएस ने आयोग के ज्ञानपाश से ममता बनर्जी की राजनीति को लपेट लिया! कुल उम्र 28 साल थी तृणमूल कांग्रेस की और 15 साल का राज योग था! किस-किस के साथ क्या-क्या किया वह सब इतिहास बन गया है! वर्तमान क्या है? वर्तमान है —
नया नाम: ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस
चुनाव चिह्न: फुटबॉल खिलाड़ी (Football Player)
नया नाम ऋतब्रत बनर्जी गुट
नया नाम: डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस
चुनाव चिह्न: लिफाफा (Envelope)
लोकतंत्र के घर भूतों का महाभोज
ज्ञानपाश में बंधकर गिड़गिड़ाते हुए लोकतंत्र के घर में दहाड़ती हुई राजनीति के भूतों का महाभोज तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। ‘हम भारत के लोगों’ की कि गहन परीक्षा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 है। मतदाता सूची तो अपनी जगह चुनाव का पेपरलीक का खतरा अपनी जगह! पेपरलीक! नहीं समझे! अरे पेपरलीक 18 सितंबर 2026 को जिस के हुए शिकार नंदीग्राम के कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान! ज्ञानपाश बहुमुखी है — मारता भी है, बचाता भी है! देखें आगे क्या होता है।
(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)









