सावधान खतरनाक है टूट-फूट का संदेश
प्रफुल्ल कोलख्यान

भारत के संघात्मक ढांचा की अपनी खासियत है। किसी एक राज्य की अंदरूनी हलचल का असर स्वाभाविक रूप से अन्य राज्यों पर भी पड़ने लगता है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 मई के महीने में संपन्न हुआ। 04 जून 2026 को नतीजा सामने आया। नतीजा सामने आया तो सब के होश उड़ गये। लगभग चौंतीस साल के वाम फ्रंट के शासन का पटाक्षेप करनेवाली ममता बनर्जी के शासन का पटाक्षेप हो चुका था। भारतीय जनता पार्टी की चुनावी जीत से तमाम राजनीतिक विश्लेषक हक्का-बक्का रह गये। वे ‘उदार बुद्धिजीवी’ भी हक्का-बक्का रह गये जिन्हें राजनीतिक विश्लेषण के पौष्टिक तत्व आस्वाद मिलता रहा है। कई ने तो अंग्रेजी में बड़े-बड़े लेख लिखकर चुनाव जीतने और अर्थव्यवस्था के हारने के अंतर्संबंध की व्याख्या करनी शुरू कर दी। सच पूछा जाये तो लोगों को ममता बनर्जी की हार से अधिक भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत ने नेता ने हतप्रभ किया।
हालांकि, एसआईआर की प्रक्रिया के चलते लाखों मतदाताओं के नाम इस या उस बहाने मतदाता सूची से बाहर हो गये थे; मतदान के अधिकार से उन्हें भी वंचित होना पड़ा था जिन के मतदान के अधिकार पर ढंग से विचार भी न किया जा सका था। लोगों के मन में आशंका थी कि एसआईआर की प्रक्रिया का बुरा असर चुनावी नतीजा पर पड़ सकता है, लेकिन इतना बुरा असर कि ममता बनर्जी की राजनीति ही ध्वस्त हो जाये! ममता बनर्जी के शासन काल का ऐसा अंत किसी ने सोचा भी न था।
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चुनावी नतीजों के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के नख-दंत भयानक तरीके से सक्रिय हो गये। ममता बनर्जी की राजनीति ने शासकीय शक्ति के हाथ लगते ही वाम फ्रंट की लोकतांत्रिक राजनीति का बिस्तर गोल करने के लिए जिस तरह की पटाक्षेपी गतिविधियों की शुरुआत की थी उस से भी भयानक शुरुआत भारतीय जनता पार्टी ने कर दी। उस से भी भयानक इसलिए कि ममता बनर्जी ने वाम फ्रंट के शासन पर भ्रष्टाचार के जितने भी आरोप पहले लगाये थे, उस के सबूत या कहें परिदर्श (Optics) लोगों के सामने नहीं ला पाई थी।
लेकिन 9 मई 2026 को शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनते ही छापामारी शुरू हो गई। छापामारी के परिदर्श (Optics) भी सामने आ रहे हैं। सचझूठ का फैसला तो कोर्ट-कचहरी में होता है। मुश्किल यह है कि कोर्ट-कचहरी में अब कॉकरॉच और परजीवी का मुहावरा चलने लगा है। तृणमूल को निर्मूल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सारी हदें पार कर जाने पर आमादा है।
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पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही तृणमूल कांग्रेस के निर्वाचित विधायकों में भगदड़ मच गया। वन-निर्वाचित 80 विधायकों में से दोतिहाई बागी हो गये। सांसदों में भी भगदड़ है। लोकसभा के 28 वर्तमान सांसदों का दोतिहाई लोकसभा स्पीकर के द्वार लग गये हैं! मतदाताओं के अधिकांश को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के चुनाव नतीजों का निष्कर्ष हासिल हो चुका है। लोकसभा स्पीकर पानी नापने के लिए, परंपरा के अनुसार बागी विधायक ममता बनर्जी को अपना परामर्शदाता नेता तो बताते रहे और लगे हाथ ममता बनर्जी के राजनीतिक निर्देशों के खिलाफ अपनी राजनीतिक गतिविधियां चलाते भी लगे रहे हैं। क्या गजब का परिदृश्य है —— राम-नाम जपते रहो, राम चढ़ावा उड़ाते रहो!
पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन की तासीर पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं दिख रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों का गहरा देशव्यापी असर दिख रहा है। पश्चिम बंगाल हुए विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों का युगांतकारी प्रभाव भारत की लोकतांत्रिक राजनीति पर पड़ना शुरू हो गया है, प्रभाव नहीं, दुष्प्रभाव। चुनाव नतीजों के बाद राजनीति और प्रशासन की गतिविधियों में ऐसा भयानक बदलाव लोकतंत्र को निरर्थक बना देता है। बारह साल की शासन अवधि की एक दुष्ट-उपलब्धि है, लोकतांत्रिक संरचना का सत्ता की तरफ झुकते-झुकते ध्वस्त होते जाना। रेखांकित की जा सकती है कि आजाद, संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश के हितधारक नागरिकों को एकाधिकारवादी भारतीय जनता पार्टी की 12 साल की शासन अवधि में संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बदले उपवास-प्रार्थना-मंत्र-आह्वान-ध्यान की तरफ मोड़ दिया गया है। अपने और अपने बालबच्चों और यारदिलदारों के बास-लिबास और ऐश-ओ-आराम के इंतजाम के लिए बहुविध जायज-नाजायज करते हुए, देश को बहुविध क्रोनी क्राइसिस (Crony Crisis) में फंसा दिया। देश के युवा हितधारकों के रोजी-रोटी के अवसर उपलब्ध करवाने के बदले उपवास-प्रार्थना-मंत्र-आह्वान-ध्यान-योग की तरफ हांक रहे हैं।
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असंभव को संभव कर लेने के बाद सवालप्रूफ भारतीय/ जनता पार्टी का राजनीतिक उन्माद सुजलाम-सुफलाम के हर मकाम में तोड़-फोड़ मचाने पर आमादा दिख रहा है। असंभव को संभव कर लेने के बाद तृणमूल में तोड़-फोड़ के बाद महाराष्ट्र में शिवसेना (युटी), उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, डीएमके सभी राजनीतिक दलों में हाहाकार मचा हुआ है। कुल मिलाकर यह कि चाहे जिस किसी भी कीमत पर संसद में दोतिहाई बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लिया जाए। जाहिर है कि पश्चिम बंगाल के सियासी इतिहास में ही नहीं बल्कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2026 एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है।
पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी निश्चित रूप से गहरा राजनीतिक संकट और आंतरिक बिखराव की स्थिति-परिस्थिति बन गई है। लेकिन इस राजनीतिक संकट और आंतरिक बिखराव को ममता बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस तक सीमित करके देखना राजनीतिक भूल साबित होगी; एक तरह से इस समय भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था राजनीतिक खालीपन से जूझ रही है। राजनीतिक प्रक्रियाओं के रूप में जो परिदर्श (Optics) दिख रहा है, वह अपने चाल-चरित-चेहरा में राजनीतिक नहीं, उपद्रवी और आपराधिक है। सब से दुखद प्रसंग यह है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को उपद्रवी और आपराधिक सक्रियताओं से विस्थापित कर दिया गया है। धन-उपद्रवियों ने सभी राजनीतिक दलों को ऐतिहासिक फूट और फिर टूट के चुनौतियों के सामने कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने राजनीति में धनागम के बहुस्तरीय और बहुत सारा रास्ता तैयार कर लिया कि सत्ताधारी दल और दलों, नेताओं की शक्ति का अधिकांश धनरक्षा मुख्य रूप से रहा है। वह दौर कब का बीत गया जब नेताओं के मुंह से निकलता था कि खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ नहीं, पाने के लिए सारी दुनिया है।
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अत्युक्ति के जोखिम पर भी कहना जरूरी है कि आज भारत की राजनीति के आकाश में राहुल गांधी अकेले ऐसे राजनेता हैं जिन में यह दुहराने और भरोसा दिलाने का नैतिक और राजनीतिक साहस है कि खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ नहीं, पाने के लिए सारी दुनिया है। इस का मतलब यह नहीं कि लोकतांत्रिक राजनीति की जमीन बंजर हो चुकी है। यह ठीक है कि भारत की राजनीति के आकाश में राहुल गांधी अकेले हैं लेकिन जमीन और जमीन से जुड़े नेताओं और बहुजन हिताय बलिदानियों का बिल्कुल टोटा नहीं पड़ गया है।
राजनीति ही नहीं जीवन भी नदी-नाव संयोग है। कभी नाव पर गाड़ी तो कभी गाड़ी पर नाव। जिन राजनीतिक दलों में तोड़-फोड़ 2026 हो रहा है और जो धनरक्षा में ऐतिहासिक फूट और फिर टूट के दौर से गुजर रहे हैं उन्हें राजनीतिक दलों के ऐतिहासिक फूट और फिर टूट को देश के टूट-फूट में बदल जाने से रोकने के लिए सत्ता की राजनीति यानी पॉलिटिक्स ऑफ पावर से बाहर निकलकर प्रतिरोध की राजनीति यानी पॉलिटिक्स ऑफ रेसिस्टेंस की आवाज को चौकन्ना होकर सुनना चाहिए। लोकतांत्रिक राजनीति को चाय-चकल्लस में उलझाकर युवा सपनों के हत्यारों से सावधान रहने की जरूरत है।
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लाख टके का सवाल यह कि क्या धनागम पीड़ित राजनीतिक दलों और राजनेताओं पर कितना भरोसा किया जाये! भरोसा किया जा सकता है — राहुल गांधी हैं न!
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