June 15, 2026
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द आर्ट ऑफ पोलिटिकल इंजीनियरिंग: कैसे परदे के पीछे से बदल दी जाती है सत्ता की बिसात

राजनीति केवल चुनावों में वोट डालने या रैलियों में भाषण देने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत जटिल, चालाकी भरे और दूरगामी रणनीतियों (Political Engineering) का खेल है। 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले भारतीय राजनीति में खेला गया दांव इसका एक कालजयी उदाहरण है। दस साल के मनमोहन सिंह के शासनकाल के बाद जनता में उपजे असंतोष को भुनाने के लिए जब विपक्षी दल सीधे तौर पर टकराने की स्थिति में नहीं थे, तब परदे के पीछे से एक अभूतपूर्व बिसात बिछाई गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने खुद सामने आने के बजाय समाज के कुछ प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं और ‘कोरी स्लेट’ जैसी बेदाग छवि वाले चेहरों को आगे किया। गांधीवादी आदर्शों वाले अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा किया गया यह आंदोलन दरअसल एक ऐसी ‘एंटी-कांग्रेस’ लहर तैयार करने का माध्यम बना, जिसने सत्ताधारी दल की जड़ों को हिलाकर रख दिया। इसके बाद, सही समय पर नरेंद्र मोदी के प्रखर नेतृत्व, उनकी वाक्पटुता और ‘गुजरात मॉडल’ के विकासवादी नैरेटिव को पेश किया गया, जिसने पूरे देश का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल दिया।


यह रणनीति केवल केंद्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्यों के मजबूत किलों को ढहाने के लिए भी इसका बार-बार इस्तेमाल किया गया। दिल्ली में शीला दीक्षित के अभेद्य गढ़ को तोड़ने के लिए अरविंद केजरीवाल का उभार और बाद में पंजाब में किसान आंदोलन के बाद पैदा हुई विपरीत परिस्थितियों में आम आदमी पार्टी के जरिए कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करना, इसी ‘मोडस ऑपेरेंडी’ (कार्यप्रणाली) का हिस्सा था। इस प्रक्रिया में क्षेत्रीय दलों या तीसरे विकल्पों को अक्सर एक ‘मोहरे’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो मुख्य विपक्षी दल के वोट बैंक में सेंध लगाते हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण 2022 के गुजरात चुनावों में दिखा, जहाँ त्रिकोणीय मुकाबले के कारण विपक्ष पूरी तरह बिखर गया। इसी तरह, महाराष्ट्र के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ओवैसी की पार्टी का उभार भी स्थापित गठबंधनों को नुकसान पहुँचाने का काम करता है। सत्ता के इस खेल को समझने में पारंपरिक दल अक्सर पीछे रह जाते हैं, क्योंकि वे केवल सामने दिख रहे प्रतिद्वंद्वी से लड़ते हैं, जबकि असली पटकथा कहीं और लिखी जा रही होती है।


वर्तमान में, यही चाबी दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु में आजमाई जा रही है। जहाँ भाजपा के लिए पारंपरिक रूप से जमीन बनाना नामुमकिन था, वहाँ जयललिता के बाद द्रमुक (DMK) के वर्चस्व और वंशवादी राजनीति को चुनौती देने के लिए लोकप्रिय अभिनेता विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कज़गम’ (TVK) के उभार को एक सोची-समझी रणनीति के तहत देखा जा रहा है। विजय ने तमिल राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के ‘तीसरे विकल्प’ के रूप में युवाओं और महिला मतदाताओं को एकजुट कर स्टालिन के गढ़ में सेंध तो लगा दी है, लेकिन उनके सामने आगे की राह आसान नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब ऐसे चेहरे अपना काम पूरा कर लेते हैं, तब उन्हें केंद्रीय एजेंसियों के दबाव, फंड की कटौती और प्रशासनिक असहयोग के चक्रव्यूह में उलझाकर कमजोर करने का दौर शुरू होता है। आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी का उदाहरण इसका सबसे बड़ा सबक है, जो भारी लोकप्रियता के साथ सत्ता में आए थे, लेकिन विकास की अनदेखी और केंद्रीय समीकरणों के कारण कुछ ही वर्षों में अर्श से फर्श पर आ गए। लोकतंत्र का यह शाश्वत नियम है कि लोकप्रियता आपको सत्ता की दहलीज पार करा सकती है, लेकिन वहाँ बने रहने के लिए केवल और केवल सुशासन (Performance) और मजबूत राजनीतिक दूरदर्शिता ही एकमात्र कसौटी होती है।

द आर्ट ऑफ पोलिटिकल इंजीनियरिंग: कैसे परदे के पीछे से बदल दी जाती है सत्ता की बिसात

NETAJI, INA and RED FORT TRIALS

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