June 15, 2026
#Opinion

जून 1984 – देश संकट में – दोषी कौन?

आज 2 जून 2026 है, 1984 के इस दिन और इस तिथि को भूल जाना मुश्किल है। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने घोषणा की – “This is not a time for anger, too much blood has been shed, violence leads to counter violence and some misguided hindus think that this is the way to meet terrorism. There can be nothing more senseless and dangerous than such thought, let us join together and heal wounds to restore normalcy and harmony in Punjab. I appeal don’t shed blood shed hatred.” पर हुआ इसका ठीक उल्टा। क्यों हुआ ऐसा। अनेकों किताबें, अनेकों मैग्ज़ीन, काल्पनिक कथाओं के बाज़ार सजे, महामहिम राज्यपाल से लेकर सुरक्षा एजेंसियों के पदाधिकारी सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखक हो गये, परंतु जो शपथ ली थी सेवा रहते क्या उसका पालन वो कर सके, यह वे ही बता स्कते हैं।


लालकृष्ण आडवाणी ने भी My Country My Life किताब लिखी, जो स्वस्वीकृति है उनकी, क्योंकि उनका खुद का आकलन है, किन्तु-परंतु का कोई कारण भी नहीं। कइयों ने उस संदर्भ को बताया रूस की मदद से, किसी ने बताया सेना पहले से ही प्रयास कर रही थी उस पर। लगातार काम भी हो रहा था, आखिर ऐसा था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के उपर्युक्त वक्तव्य देने का कोई कारण नहीं था।


अब ज़रा आडवाणी की किताब से ही समझें तो आडवाणी भी मान रहे हैं कि इंदिरा गांधी ने, जिसे Blue Star Operation बताया गया, उसके लिए और ऐसा करने के लिये वह तैयार नहीं थी परंतु भाजपा के दबाव से यह हुआ जैसाकि उस किताब में उन्होंने लिखा ;
“one of the major mass agitation in the history of the BJP was launched in the first week of 1984 when we undertook a ten days satyagrah against what was termed as the government’s virtual surrender before Bhindrawala .” Then he further expressed “I raised the issue in the parliament charging abdication of the responsibility in the face of an unprecedent challenge to national unity and the rule of law ” he further expressed “in what was termed as ‘operation blue star ‘ the Indian army entered the Swarn temple complex on 5th June, 1984, what surprised everyone was the fierce resistance offered by the militants .” he further admitted “I can claim with all humility that my party played a substantial role in the struggle ” he categorically instigated the sikhs mentioning therein “Khalsa Panth was created three hundred years ago by Guru Gobind Singh to defend hindus and protect hinduism from the bigoted muslims rulers of the time “


अब ज़रा आडवाणी की स्वस्वीकृति को हम आधार बनाकर समझने का प्रयास करें तो पाएंगे कि ये सब संघ का करा-धरा था, ताकि सिखों को मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाए क्योंकि सिखों को मुस्लिम विरोधी और हिन्दू समर्पित बना दिया जाए क्योंकि यही दो शक्तियां हैं जो हिन्दू राष्ट्र के संकल्प की विरोधी हैं जैसाकि पूर्व लोकसभा अध्यक्ष एवं महामहिम राज्यपाल राजस्थान समझते थे “जब तक सिख और मुस्लिम भारत के नागरिक हैं भारत की धर्मनिरपेक्षता को कोई खतरा नहीं” संघ ने बड़े करीने से पहले सिखों पर तजुर्बा किया। यदि बिना पूर्वाग्रह से आकलन करना हो तो इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि इंदिरा गांधी की हत्या उपरांत सिखों का कत्लेआम उसी सोची-समझी चाल का हिस्सा थी। यही कारण था कि “जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है” मैं नहीं समझता कि राजीव गांधी के ये शब्द होंगे, परंतु किसी न किसी ने तो लिखकर दिये ही होंगे, यह तो कांग्रेस को बताना होगा कि जो Blue Star operation को उपलब्धि बताती है, इंदिरा गांधी की हत्या की सच्चाई के बजाए सिखों को दोषी बता रफा-दफा कर देती है।


जिस इंदिरा गांधी ने इस मुद्दे को सुलझाने का हरसंभव प्रयास किया। यह भी सच है कि अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी अपनी जिम्मेदारी निभाने में बहुरी तरह फेल हुई। पूरा सूचना तंत्र सिखों को बदनाम कर इस हद तक पहुंचाने में प्रचार तंत्र बन गया। जैसाकि अडवाणी की उपर्युक्त स्वस्वीकृति है इससे स्पष्ट हो जाता है उस दशा और दिशा को समझने में कि इंदिरा गांधी का 2 जून 1984 का वह दर्द, जिसका उपर जिक्र किया गया है, जिसमें वह some misguided hindus की बात करती हैं। परंतु उस मूलप्रश्न पर विचार करने की कोशिश ही नहीं की गयी। बस किताब से लेकर किताबें तो छपती चली गयीं। बस सिखों को खालिस्तानी, आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या बताया गया। आज भी वही दोषी “गलतियां तो हम करें, दोषी कहें शैतान को”।
सिखों को तो पता ही नहीं चला, उनको खारे सागर में डूबने के लिये फेंक दिया गया। वे उसी को ही आत्मसात कर गये। कबीर के शब्दों में “मछली जाल न जानिया, सर खारा असगाह। अति सियानी सोहणी क्यों कीता विसाह।” अर्थात् मछली ने जाना ही नहीं वह खारे समुद्र में है, मछुआरे ने बड़े करीने से जाल फेंका है, चाहे बहुत ही समझदार उसे गुरूओं की घुड़की मिली, परंतु सहजभाव से वह उसी जाल में फंस गयी” सवाल है कि उससे बाहर कैसे निकले यह यक्षप्रश्न अभी भी मौजूद है?


2004 में देश के प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह। कांग्रेस के केवल 145 सांसद थे और भाजपा के 138 सासंद थे। कोई बहुत अन्तर नहीं था, कांग्रेस ने दांव लगाया एक ऐसे व्यक्ति पर जो राजनीति से कोसों दूर रहा था, परंतु मेरे 50 वर्ष के सामाजिक कार्य के इतिहास में मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक ऐसा व्यक्ति इतनी हिम्मत दिखा सकता है कि वो 1984 के कुकृत्य की माफी मांग ले, यह जानते हुए कि कांग्रेस पर लाखों सवाल उठेंगे। और उसके बाद सच्चर कमेटी बनाई गई जिसने मुस्लिम की दशा को जानने के लिये काम किया। जब हालात ऐसे हों कि अल्पसंख्यकों के लिये कोई रियायत मिलनी मुश्किल थी, उनकी दशा को महसूस करते हुए कुछ ऐसी बातें कह दी कि उसी को लेकर मनमोहन सिंह को मुस्लिमपरस्त बता दिया गया।


फिर वही मनमोहन सिंह, जिनकी वजह से वामपंथ भी सत्ता से बाहर हो गया और 2009 का चुनाव सीधा मनमोहन सिंह बनाम आडवाणी हो गया। नतीजा कांग्रेस 206 और भाजपा 116 पर निपट गयी। वैश्विक मन्दी का असर भी भारतीय जनता पर उन्होंने नहीं पड़ने दिया, उन्हें बदनाम करने के लिए मुहिम की शुरूआत की गई। उनको इतना बदनाम किया जाए ताकि वे इस्तीफा दे दें, यहां तक कि विनोद राय CAG ने भी कोई कोर-कसर न छोड़ी। ये अलग बात है कि बाद में विनोद राय को अपने झूठे और तथ्यहीन आरोपों पर सिनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी। फिर भी बेदाग होकर मनमोहन सिंह निकले। कांग्रेस में भी संघ कार्यकर्ताओं की कोई कमी नहीं थी और उन्होंने राहुल पर दांव खेला और लगे उनको मन्दिर-मन्दिर घुमाने, जनेऊधारी ब्राह्मण बताने। इसका नतीजा ये निकला कि जैसेही सिख और मुस्लिम को लगा वही बाहर हो गया तो कांग्रेस 2014 में 44 पर निपट गयी। कांग्रेस को अहसास ही नहीं, उसके पास बिना किसी मदद के 24 फीसदी वोट है। आज जरुरत है उस वोट को सहजने की। अब यह तो उसी को सोचना है कि ऐसा कैसे किया जाए, मैंने तो उसके चेहरे से पर्दा भर उठाया है।

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